गंभीर अड्डा

पैसे से पैसा बनता है, जैसे प्राईवेट कॉलेज में कंपनी प्लेसमेंट होती है

अगस्त 8, 2022 ओये बांगड़ू

सीबीएसई का रिजल्ट आ गया। बधाई संदेश ,पर्सेंटेज और बाकी सभी चीजों के अलावा एक चीज और भी है, “अंधी रेस”  वह भी शुरू हो गई। थ्री इडियट में इस रेस को समझाया गया है इसलिए इस पर बात करने का कोई फायदा नहीं ।

जब हम इस उम्र में थे तो इस अंधी दौड़ में ढूंढा जाता था बढ़िया कॉलेज, बढ़िया कॉलेज की परिभाषा होती थी ऐसा कॉलेज जहां पढ़ाई पूरी होते होते बड़ी बड़ी कंपनियां आएं और बच्चों को बढ़िया पैकेज वाली नौकरी ऑफर करें। सिर्फ इंजीनियरिंग ही नहीं, बाकी प्रोफेशनल कॉलेज भी बढ़िया तभी माने जाते थे जब उनमें बढ़िया प्लेसमेंट हो।

यह कम्पनियां सरकारी कॉलेज का रुख क्यों नहीं करती थी? पता नहीं। यह मॉडल भाजपा का बनाया तो कतई नहीं है, यह कांग्रेस के दौर से शुरू हुआ एक ऐसा मॉडल है जो पैसे से पैसा बनाने वाली नीति पर काम करता था।

बढ़िया कॉलेज(जिसकी परिभाषा ऊपर बताई है) कम्पनियां उधर ही क्यों जाती थी? उधर एडमिशन के लिए बाप के पास होने चाहिए मोटे पैसे, या लोन उठाने की ताकत। बच्चा वहां से पढ़ेगा तो नौकरी लगेगी। कथित बढ़िया नौकरी। सरकारी कॉलेज में क्या होगा, सरकारी नौकरी के पेपर देने लायक बच्चे बनाये जाएंगे। कोई एक्स्ट्रा ऑर्डनरी निकल गया तो अलग बात है।

यह सरकारी नौकरी देने लायक बच्चे , सरकारी नौकरी निकाल पाए तो ठीक वरना इन प्राइवेट कंपनियों में जूते घिसेंगे और क्लर्क वाला काम पाएंगे। सर्वाइव कर पाए तो ठीक वरना अगली खेप आने में एक ही साल तो लगना है। इनका क्लर्की का काम तो चलता रहेगा।

बढ़िया पैकेज में कौन जाएगा, जो बढ़िया कॉलेज से पढ़ेगा, बढ़िया कॉलेज से कौन पढ़ेगा जिसके घरवाले उसे बढ़िया कॉलेज से पढ़ाने लायक होंगे। पैसे से पैसा बनेगा।

सरकारी कॉलेज से भी एक्स्ट्रा ऑर्डनरी बच्चे निकले हैं ऐसा नहीं है। लेकिन उन बच्चों के लिए कोई कम्पनी कॉलेज में नहीं आई, किसी कम्पनी ने उनके थर्ड ईयर या फोर्थ ईयर में उनका इंटरव्यू नहीं लिया।

अलबत्ता प्राइवेट कंपनियों के क्लर्कों को बार बार फील कराया गया कि आप छोटे हैं, एमबीए करो बड़े बन जाओगे, बेचारे नौकरी करते करते डिस्टेंस से मणिपाल टाइप यूनिवर्सिटी से एमबीए कर गए, इस उम्मीद में कि प्राइवेट कम्पनियों के इस नीचा दिखाने वाले खेल से ऊपर उठ जाएं, अलग अलग कम्पनियों में फिर वह डिस्टेंस वाला एमबीए लगाते रह गए। लेकिन रिजल्ट सिर्फ 2%।

क्योंकि यह कम्पनियां बड़ी हरामी हैं, यह जाती हैं बढ़िया कॉलेज के पास, जो एमबीए में न जाने कौनसी घुट्टी मिलाते हैं कि अपने ऑफिस का सालों पुराना क्लर्क जो डिस्टेंस से एमबीए कर चुका है वह इन्हें नकारा लगता है उसे बस कुछ हजार की रुपल्ली और सालाना कुछ परसेंट के इंक्रीमेंट में रखती रहती हैं लेकिन “बढ़िया कॉलेज” से लाखों की सैलरी में प्लेसमेंट कर ले आती हैं।

इन प्राइवेट कम्पनियों द्वारा पोषित यह बढ़िया कॉलेज एजुकेशन में भले ही जीरो हो, मगर प्लेसमेंट में 100% होने के कारण, फीस में दिन दुगनी रात चौगुनी वृद्धि करते रहते हैं।
हमें अच्छा पैसा दो, फिर कम्पनियां आपके लाल को अच्छा पैसा देंगी।
सरकारें अपने कॉलेज में इन कम्पनियों को बुला पाने में नाकाम रही हैं, अभी मध्य प्रदेश ने ट्राय किया था, रोजगार मेला लगाया, जहां कुछ कम्पनियों ने हजार रुपये के क्लर्क सीधे कॉलेज से उठाए। नौकरियां कम बांटी गई लेकिन विज्ञापन दबाकर दिए गए।।

कांग्रेस के शासन काल में तैयार हुआ यह पैसे से पैसा बनाओ मॉडल, दिन दोगुनी रात चौगुनी वृद्धि कर रहा है। क्योंकि सरकारी कॉलेज के बच्चों की एकमात्र बड़ी उम्मीद सरकारी नौकरियां इन सरकारों ने खा दी, प्राइवेट कम्पनियां इन कॉलेजों के पास आती नहीं। तो माँ बाप एजुकेशन लोन लेकर बच्चों का भबिष्य बनाने के पीछे लगे हुए हैं।।

 

नोट : लेखक के निजी विचार हैं

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