गंभीर अड्डा

कैसे बनी दुनिया की पहली फिल्म

जून 23, 2021 कमल पंत

लिमियर बन्धु, या लिमियर ब्रदर कह लीजिए, फादर ऑफ फ़िल्म भी कहा जाता है इन्हें, लेकिन आजकल इंस्टाग्राम की रील देखते हुए मैंने इन्हें नाम दिया फादर ऑफ इंस्टा रील।
खैर मजाक एक तरफ लिमियर ब्रदर्स वह लोग थे जिन्होंने एक ऐसी चीज को कर दिखाया था जिसके बारे में कल्पना करने वाले लोग तक बहुत कम थे, लिमियर ब्रदर्स जब दुनिया की पहली फ़िल्म को पेरिस कैफे के पर्दे पर दिखा रहे थे तो फ़िल्म देखने वाले उत्साहित होने से ज्यादा डरे हुए थे, फ़िल्म के इकलौते सीन को जैसे ही पर्दे पर चलाया गया दर्शक कैफे छोड़कर बाहर भाग गए। फ़िल्म थी “अराइवल आफ ए ट्रेन” एक ट्रेन के स्टेशन पर पहुंचने के दृश्य को पर्दे पर हूबहू उतारा गया था, पहली बार इस तरह की चीज से दुनिया रूबरू हो रही थी साल था 1895 तारीख थी 28 दिसम्बर।
तब ऐसे ही दृश्यों को सिनेमा कहा जाता था, चलती हुई ट्रेन, फेक्ट्री से बाहर आते मजदूर, चलते हुए लोग, चलती हुई गाड़ियां।
लेकिन कहानी पहली बार सिनेमा के साथ जुड़ी 1905 में, एडविन एस पोर्टर ने पहली बार एक काल्पनिक कहानी को शूट किया और उसे पर्दे पर लोगों को दिखाया, सीन था ट्रेन में रॉबरी का, कहानी थी ट्रेन में रॉबरी की, और फ़िल्म का नाम था “द ग्रेट ट्रेन रॉबरी”।
वैसे भारत की पहली फ़िल्म दादा साहब फाल्के लेकर आये, राजा हरिश्चंद्र। लेकिन उनकी प्रेरणा बनी ” द लाइफ आफ क्राइस्ट” इस फ़िल्म को देखकर फाल्के साहब के मन में फ़िल्म बनाने की इच्छा जागी और उन्होंने भारतीय पौराणिक कथाओं पर सिनेमा का निर्माण कर डाला।
सिनेमा को समाज से जोड़कर देखने वाले फिल्मकार थे जार्ज मेलिस, जिन्होंने पहली बार इस बात को गम्भीरता से सोचा समझा कि एक सिनेमा अपने दर्शकों के दिमाग से किस कदर खेल सकता है।
अब फादर ऑफ वर्ल्ड सिनेमा डी डब्लू ग्रिफिथ। एक ऐसा आदमी जिसने लिमियर ब्रदर्स की फ़िल्म को सिनेमा में बदला, जिसने दुनिया को फ़िल्म के माध्यम से कहानी कहना सिखाया, जिसने कैमरा मूवमेंट, क्लोजअप,लांग शार्ट, मिड शार्ट जैसी चीजों को जोड़कर फ़िल्म कहने का अंदाज बदल डाला। 1915 में ग्रिफिथ ने फ़िल्म बनाई “बर्थ ऑफ ए नेशन” एक ऐसी फिल्म जिसमें कहानी कैमरा कहता है, जिसमें सब्जेक्ट एक जगह खड़ा नहीं रहता, जिसमें कैमरा सब्जेक्ट का पीछा करता है, जिसमें कैमरा क्लोजअप लेकर किरदार के चेहरे और हाव भाव दर्शकों को दिखाता है।
सिनेमा के माध्यम से दुनिया को सच्ची कहानियां कहना सिखाया Sergei Eisenstein ने 1925 में बेटलशिप पोटेम्पकिन”बनाकर, एक जहाज “बेटलशिप पोटेम्पकिन” में सेलरों द्वारा किये जा रहे अत्याचार की सच्ची दास्तान सुनाकर। इस फ़िल्म ने दुनिया के लोगों को रियल सिनेमा से रूबरू करवाया।
हालांकि इससे 4 साल पहले 1921 में रॉबर्ट फ्लेहर्टी ने दुनिया को एक और चीज से रूबरू करवाया था “डॉक्यूमेंट्री” से। दुनिया की पहली डॉक्यूमेंट्री “नूनक ऑफ द नॉर्थ”। वह मूवी कैमरा लेकर पहुंच गए थे एक एस्किमो के पास, नार्थ पोल में, और उसकी जिंदगी के सच्चे पलों को रिकार्ड कर ले आये अपने साथ। कागजों में डॉक्यूमेंट तो होती थी चीजें, उन्होंने कैमरे में डॉक्यूमेंट करी। और दुनिया को दी उसकी पहली डाक्यूमेंट्री।
इसी के बाद शुरुआत हुई थी, सच्ची चीजों को रिकार्ड करने की, एक इतिहास को रिकार्ड करने की, आज का टीवी न्यूज ऐसे ही शुरू हुआ समझिए।
1940 में इटली के कुछ फिल्मकारों को ख्याल आया कि हम सिनेमा में स्टोरी तो कह देते हैं लेकिन उसमें जिंदगी नहीं जोड़ पाते, “बाईसिकल थीप” एक ऐसी फिल्म थी जिसमें जिंदगी के सभी रंग भरने की कोशिश की गई, असली जिंदगी को करीब से पर्दे पर दिखाने की कोशिश। एक परिवार की कहानी जो जिंदगी को आगे अच्छे से बढाने के लिए एक साइकिल खरीदता है, बाप साइकिल लेकर पहले दिन काम में जाता है, वह खुशी पर्दे पर दिखाने के लिए फिल्मकार ने कई शाट्स खर्च कर दिए, साइकिल के चोरी होने के बाद बाप बेटे दोनों साइकिल ढूंढने लगते हैं। इस पूरी कहानी में खुशी थी, गम था, गुस्सा था, हताशा थी, निराशा थी जीवन के हर रंग को इस सिनेमा से जोड़ने की कोशिश की गई। फिल्मकारों ने ऐसी कई फिल्मे बनाई और उस दौर का नामकरण हुआ न्यू रियलिज्म।
भारत में भी न्यू रियलिज्म की हवा आई और सत्यजीत रे ने फ़िल्म बनाई पाथेर पंचाली। 1955 में सत्यजीत रे ने एक कहानी को सिनेमा के माध्यम से कहा, एक भाई बहन ने अपनी जिंदगी में ट्रेन नहीं देखी थी तो वह ट्रेन देखने निकल पड़े। घर से भागकर। इस दौरान जीवन के हर रंग को सत्यजीत रे ने उन भाई बहन के माध्यम से दिखाने की कोशिश करी।
वैसे सिनेमा में जबसे साउंड जुड़ी, तबसे सिनेमा और ज्यादा सशक्त हो गई। राजा हरिश्चंद्र तो मूक फ़िल्म थी, लेकिन आलमआरा बनी पहली बोलती फ़िल्म, जहां से सिनेमा के साथ संगीत जुड़ा, साउंड जुड़ा।
विश्व सिनेमा में भी जबसे साउंड जुड़ा फिल्में और ज्यादा सशक्त होकर निकली।
सिनेमा ने लोगों को अवसाद से बाहर निकालने का काम किया। द ग्रेट चार्ली चैप्लिन को कौन नहीं जानता, विश्वयुद्ध से परेशान दुनिया को हंसाने के लिए चार्ली चैपलिन ने जो प्रयास किये वह सच में महान थे। मेकिंग ए लिविंग” शुरुवात करके, चार्ली ने फ़िल्म की दुनिया में तब कदम रखा जब फ़िल्म खुद अपने शिशुकाल में थी, एक साइलेंट फ़िल्म से शुरू करते हुए बोलती फिल्मों तक का सफर अगर तय करना हो तो चार्ली चैपलिन की हर फिल्म को फॉलो कर सकते हो।
भारत में भी बहुत सारा काम फिल्मों पर हुआ, लेकिन फिल्मों के ऊपर किसी ने बहुत अच्छा सिनेमा नहीं बनाया, बहुत साल पहले भारतीय बाल चित्र फ़िल्म परिषद ने एक फ़िल्म बनवाई थी, नसीरुद्दीन शाह, टॉम ऑल्टर जैसे दिग्गजों को केंद में रखकर, नाम था “फ़ोटो”। उत्तराखण्ड के कुमाऊं के पहाड़ों में शूट की गई इस फ़िल्म में फ़िल्म की ही कहानी है।
एक बच्चा जिसका पढ़ाई में मन नहीं लगता, उसके सफर की कहानी,कैसे वह द वर्ल्ड सिनेमा पढ़ते हुए कब सिनेमा से जुड़ जाता है उसे ही पता नहीं चलता।
अब वह फ़िल्म कहाँ मिलेगी पता नहीं, सालों पहले एक बार दूरदर्शन में आई थी।
कमल पन्त।
(नोट- उपरोक्त जानकारी मेरी एक पुरानी डायरी से ली गई है,गलती हो सकती है)

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