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धर्मो रक्षति रक्षतः का यह है मतलब, जो समझ नहीं पाते आज के धर्म रक्षक

नवंबर 20, 2023 ओये बांगड़ू

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे संतु निरामयः
सर्वे भद्राणी पश्यंतु, मा कश्चित दुःखभाग भवेत।

वृहदारण्यक उपनिषद का यह श्लोक हिन्दू धर्म दर्शन का एक छोटा सा उदाहरण मात्र है। जो कहता है कि सभी सुखी हो, सभी निरोगी हो, सभी का जीवन मंगलमय बने और कोई भी दुःख न झेले।
इसमें समस्त जग के मंगल की कामना की गई है।

अयम निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम
उदारचरितानाम तू वसुधैव कुटुंबकम

महा उपनिषद का यह श्लोक हिन्दू धर्म दर्शन है, छोटी सोच वाले कहते हैं ये मेरा वो तेरा, ये मेरा भाई वह तेरा भाई, उदार चरित्र वालों के लिए तो विश्व ही परिवार है।
महाभारत के यक्ष युधिष्टर संवाद में, जब यक्ष प्रश्न करते हैं युधिष्ठर से कि धर्म की रक्षा हेतु क्या करना चाहिए। तब युधिष्ठर उत्तर देते हैं कि

धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षतः
तस्माधर्मो न हन्तव्यों मा नो धर्मो हतो अवधीत।

धर्मराज युधिष्टर का कहने का अर्थ था जो मनुष्य धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। धर्म की रक्षा करने वाला मनुष्य कभी पराजित नहीं होता, क्योंकि उनकी रक्षा स्वयं धर्म करता है।
धर्मराज ने महाभारत के बाद हिमायल से स्वर्ग गमन के रास्ते में यह सँवाद यक्ष के साथ किया था। जहां धर्म और अधर्म का मतलब हिन्दू मुस्लिम नहीं था। बल्कि न्याय और अन्याय था। दुर्योधन के अन्याय को अधर्म माना गया। युधिष्ठर न्याय की तरफ थे वह उनका धर्म था, इसलिए वह धर्मराज कहलाये।
मगर आज काफी सारे कथित हिन्दू पंथी, सिर्फ इस श्लोक का सहारा लेकर खुद को सही साबित करने में तुले हैं कि वह धर्म की रक्षा कर रहे हैं। जबकि यह तो सिर्फ महाभारत में यक्ष युधिष्ठर संवाद भर है।
उपनिषद जो कहते हैं वह तो वह भूल गए। सभी के सुखी रहने की कामना, सभी को परिवार मानने की नसीहत। इनको भूलकर उन्हें याद रहता है कि वह धर्म के रक्षक हैं और मुस्लिम या अन्य धर्म अन्यायी इसलिए उनसे हिन्दू धर्म की रक्षा करनी है।
गीता में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं अठारहवाँ अध्याय श्लोक 66 वां

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥

सभी धर्मों को त्याग कर, मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त करके मोक्ष की तरफ ले चलूंगा, शोक मत करो।
अब इसमें धर्म त्यागने की बात कही है तो क्या हिन्दू धर्म त्यागने की बात कही है? नहीं, सभी इच्छाएं, सभी अपेक्षाएं, सभी आश्रय, नाते रिश्तेदारी समस्त चल अचल जीवन को त्यागने की बात कही है।
लेकिन इतनी गंभीर बातों को छोड़कर इतनी दार्शिनिक बातों को छोड़कर हमारा ध्यान जाता है उन श्लोकों पर जो व्हाटसप या फेसबुक के जरिये आईटी सेल या कथित हिन्दू हम तक पहुंचा रहे हैं।
कि फलानी जगह फलाना धर्म गायब हो गया क्योंकि वह अपने लिए लड़ा नहीं, फलानी जगह उनको निकाल फेंका क्योंकि वह लड़े नही। अरे बेवकूफों, श्रीकृष्ण की जिस गीता का उदाहरण दे देकर तुम नहीं थकते उसी में कर्म करते जा फल की चिंता मत कर कहा गया है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि

लेकिन तुम भूल जाते हो। तुम्हें लगने लगता है कि यह वोट लोभी आदमी तुम्हें जिस उद्देश्य से भड़का रहा है असल मे वह उद्देश्य धार्मिक किताबों में दर्ज है।
जबकि कृष्ण स्वयं कह गए हैं। कि

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

तो तुम्हें भय किस बात का कि तुम्हारे धर्म का नाश होगा। या यह किसी की वजह से बर्बाद होगा। अरे गीता को मानते हो न, ईश्वर खुद बताकर गए हैं कि वह धर्म के उत्थान के लिए तब तब धरती पर आएंगे और धर्म का नाश नहीं होने देंगे। लेकिन उनके कथन पर तुम्हें भरोसा ही नहीं। तुम आईटी सेल के बहकावे में आकर निकल पड़ते हो खुद को धर्म रक्षक ईश्वर समझकर निकल पड़ते हो ऊट पटांग हरकतें करने।
और अंत मे हिन्दू दर्शन पर विश्वास करो, सबके सुख की कामना करो, विश्व को परिवार मानो और ईश्वर पर भरोसा करो। क्योंकि ईश्वर स्वयं कहकर गए हैं कि

परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥

दुष्टों के विनाश के लिए वह स्वयं हर युग में धरती पर आएंगे, विभिन्न स्वरूपों में आएंगे और दुष्टों का नाश करेंगे।

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