गंभीर अड्डा

ये खत कुछ कहते हैं

अक्टूबर 22, 2018 ओये बांगड़ू

हिमालय के दो विभन्न घरों के दो साधारण पुरुषों की दिनचर्यायों में तुलना की गयी है, पुराने ज़माने में और आज के समय में. अभिजीत कालाकोटी मीडिया के छात्र हैं और अपने कालेज के लिए उन्होंने यह काम किया है,इन दो परिवारों के अलग अलग समय की तुलना पत्रों के माध्यम से की गयी है.आप पत्र पढ़कर खुद ही अंदाजा लगा लेंगे वख्त के फेर का

यह ये भी ज्ञात कराता है कि कैसे पूर्व समय में उत्तराखण्ड कुमाऊँ में राज करने वाले ठोकदार अब मात्र एक प्राइवेट नौकरी के लिए अपना घर-बार-राज्य छोड़, बाकी पूरे देश में दर-दर भटकने पर मजबूर है और कैसे किसी ज़माने में बीहड़ में बसे, बुग्यालों में पले घुमंतू चरवाहे आज उच्च  सरकारी पदों में तैनात है.

बिखरी जोतों के कारण मध्य हिमालय क्षेत्रों की कृषि अब अनउदपादक बन चुकी थी.सवाल केवल पेशा बदलने का नहीं था और ना ही नाम बदलने का,सवाल का एक समूची कौम के बदल जाने का,सवाल बदस्तूर जारी पलायन का है,खंडहर होते मकानों का है.

पहला खत 

12 अक्टूबर, 1974 ,शनिवार

नमस्कार हो,

ढ़ोग देता हूँ, ईजा- बौज्यू को ,बड़े ठुल दा-दीदी को, स्नेह देता हूँ मेरे से छोटे भुला-भूली को.

आज मेरे नौकर ने मेरे बूट पोलिश देर से किये इसिलए इधर बागेश्वर से थल चलने वाली हर दा की एकमात्र हरीकभाड बस छूट चूकी है. बागेश्वर से थल की दूरी 75 किमी है जिसको पूरा करने  में बस को 6 घंटा लग ही जायेगा. मुझे थल नहीं जाना है लेकिन उसी रस्ते में 30 किमी पहले पड़ने वाले उडियारी बैंड में उतर जाना था ताकि सोमवार को बेरीनाग तहसील में एसडीएम साब से मीटिंग में सजग हो सकूं. मैं एक नायक तहसीलदार हूँ और अब में अपना सूट केस जैकी से पकड़ा कर बागेश्वर से बेरीनाग पैदल चलूँगा,कुत्ता हमेशा से आदमी से ज्यदा वफादार होता आया है,साला हरदा ज्यादा उछल गया है  जबसे K.M.O.U की बस चलाने लगा है.दस मिनट भी नहीं रुक देता साला,खैर कुछ उसकी मजबूरी है और कुछ मेरी लापरवाही भी,घर में 9 लोगों का पेट पालना है.

सुबह के 6 बजे हैं,पैदल रस्ते से उडियारी बैंड पहुचने में भी मुझे 4 घंटे लग ही जायेंगे अभी. दोपहर में पहुँच के नरवा की दुकान में उस्तरा बुबू से कुछ देर फसक मार लूँगा स्टील की गिलास में चाय पीते हुए. हमेशा नाराज़ होते हेई उस्तरा बुबू कि बैठता नहीं हूँ करके साथ में बीडी पीने के लिए, फिर बुबू के दुःखडे शुरू होंगे.बोलेंगे नरवा साला तो कपूत है,दिन भर अत्तर पीता है कार्की डूडे के आवारा लौंडो के साथ और फौज में भी भर्ती नी हो पाया साला करके.मेरे 7 संतानों में 5 तो फर्स्ट क्लास हैं.बाकीं,२ छोटे ही है बावू लोग.पुष्कर और इन्दर अग्रज हैं.लग हीं जायेंगे सरकारी नौकरी में फिर बेरीनाग में ही जमीन ले के घर बना देंगे.गाँव में क्या ही चल पाती है ना 300-400 रूपये की तनख्वाह सरकार देरी है तो ठीक ही है. हो ही जाता है.बाकी गाँव में जमीन तो है ही.

-शेर सिंह

नायक तहसीलदार, बेरीनाग

बागेश्वर, उत्तराखण्ड

दूसरा ख़त 

13 अक्टूबर, 1974 ,रविवार

ढोग देता हूँ,

दाज्यू आखिरी सूखी धुप २ महीने पहले देखी थी,तब से तो बस हिउ(बर्फ) ही है. दर्मा घाटी में कहाँ ही सब्जी है अर्जय और दूसरा सूखा मीट ही खा रहा रहा है पूरा परिवार. जब से चीनियों से व्यापर खतम हुआ है कुछ नहीं बचा है हो. सारा कीड़ा जड़ी थोक के भाव बिक रहा है इधर ही पट्टू भी कोई नहीं खरीद रहा है, बलुवाकोट के पर तरफ जो है उसकी ही चांदी है हो.बोल रहे हैं धारचूला में नेपाल के साथ अब बढ़िया व्यापार चल रहा है. ये बारी दर के लोग तो बोल रहे हैं कि वहीँ जायेगे रहने भल ऊपर ऊपर से भी आ गये है दर्मा से.सरकार ने कुछ छूट भी दी है नौकरी में..

6 साल का हो गया है बीरू. स्कूल नहीं गया है अभी तक.अब अगली गर्मी में ही कीड़ा खोदने के बाद पिघलेगी बरफ.फिर ही ले जा पाउँगा हो धारचूला तो.बाकी तो परमेश्वर ही जानता है,फिलहाल 18 खच्चर लगे है ही आदि कैलाश यात्रा में और 250 भेड हैं बची इस मौसम में.बुनाई तो कर ही रही है घरवाली और आमा भी.इंतज़ार कर रहा हूँ कि कब पिथोरागढ़ शहर देखने का मौका मिलेगा.सुना है मालदार की कोठी काफी बड़ी है और वो व्यापारियों का स्वागत भी करता है.

-गणेशदर्याल

खच्चर व्यापारी ,दारमा घाटी

तीसरा खत 

6 अक्टूबर, 2018,शनिवार

सभी को जय देव,

हमारी हिमालभूमि में कड़क ठण्ड शुरू हो चुकी है.अब सुबह लेहाफ़ से बाहर निकलने का जी नहीं करता लेकिन जिमी को सुबह की सैर पर ले जाना काफी ज़रूरी है,उसके लिए भी और मेरे लिए भी शरीर के पुर्जे सुचारू ढंग से काम करते है.55 की उम्र में डायबिटीज से लड़ना और रोज़-मर्रा की ज़िन्दगी के साथ सम्झौता करना ही एकमात्र विकल्प समझ आता है.

आधी उम्र भाई-बहनों को पढ़ाने, शादी कराने में बीत गयी और आधी यहाँ शहर में मकान खड़ा करने में.मै कॉलेज में बच्चों को शिक्षा देता हूँ और उस काम के सरकार मुझे कुछ  70-75 हज़ार देती है.यूँ ही सुबह सैर पर निकल जाता हूँ 4-5 किलो मीटर और घर वापस पहुँच के अपने लड़को को उनकी गहरी नींद से उठाता हूँ..उठ ही जाते हैं 10 बजे तक वे दोनों जब मेरी स्टाफ की जीप आ जाती है.

इस बात का खेद ज़रूर है कि मेरे बेटे अपने लिए शायद ही कभी कुछ कर पाएंगे.बड़ा वाला शहर से वापस आ गया था कुछ सालों पहले यह कहके कि “प्लेन्स सूट नहीं करता.”तब से बस बिज़नस प्लान्स बना रहा है.अब ये वो जमाना तो है नहीं जब नौकरी केवल एक सरकारी कॉलेज  की डिग्री से मिल जाती थी.इसकी उम्र में मेरी नौकरी को 4 साल हो चुके थे.हाँ छोटे वाले ने कुछ तैयारी की थी मेडिकल की लेकिन कहाँ उसका नंबर आ पाता इतनी भीड़ में.इसलिए  मैंने उसे उसकी मर्ज़ी की पढाई चुनने दी.अभी है बाहर शहर में ऐसे ही किसी प्राइवेट कॉलेज में.विथ नो जॉब गारंटी आफ्टर इन्वेस्टमेंट.8 मास बाद पहाड़ आया है.

बस अब कुछ साल की नौकरी बची है और लग ही जायेंगे बच्चे तब तक कहीं न कहीं..

-पुष्कर सिंह

शिक्षक, कॉलेज पिथोरागढ़

चौथा खत 

7 अक्टूबर, 2018

जय मुन्सार सभी को,

फिलहाल  नैनीताल में मौसम खुला है,कुछ दिन पूर्व काफी बारिश के चलते नयी मॉल रोड देख गयी थी झील में.पहली बार नैनीताल मैं सन 80 में आया था वन विभाग की परीक्षा देने.

आज मुझे वन विभाग के विरिष्टअधिकारी के पद से निवृत्त हुए २ साल हो चुके है.जल्दी निवृत्त होने का निर्णय मेरा अपना था.उतने ही साल जितने मेरी बड़ी बेटी को विदेश गये हो चुके है,अपने MBA की डिग्री जो लेनी थी. हमारे साथ यह कोठारी साहब मौजूद है जो की हाई कोर्ट के जज हैं, इनसे भी यही बात ज्यादा सुनने को मिलती है कि कैसे शौका और रंग जाती के लोग भारी मात्र में पलायन कर यहाँ बस गये है. मेरा बेटा 1 साल में सरकारी कॉलेज से डॉक्टर बनने को है और छोटी बेटी को यहाँ नैनीताल में बोर्डिंग में डाला हुआ है.वापसी में चलते हुए उन दोनों को भी गाँव ले जाना है.

जीवन में काफी कुछ हासिल कर लिया है और अब कुछ नज़र नहीं आता सिवाय परिवार के.मेरा बचपन कुकुरों के बीच बुग्यालों में भेड़ों को चराने और बरफ में कीड़ा जड़ी खोदने में बीत गया.मुझे फक्र है कि मैं अपने बच्चो को इससे कहीं अच्छा बचपन दे पाया हूँ.मथुरिया साल भर पहले दार्मा घाटी गया था. उसने बताया की बाबू का बनाया हुआ हमारा पुश्तैनी मकान अब खंडहर हो चूका है. मुझे एक अरसा हो गया है गाँव गए हुए.क्या ज़िन्दगी की इसी कशमकश के चलते मै अपने यार हिमाल को कहींदूर पीछे छोड़ आया हूँ?

चिंतित करने वाला विषय है कि, क्या मेरा पुश्तैनी मकान खंडहर हुआ है या मेरी परंपरा एवं सभ्यता?

-बिरेन्द्र दर्याल

निवृत्त वन विभाग अधिकारी

हल्द्वानी

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