गंभीर अड्डा

यही है राईट लाईफ बेबे

जून 1, 2017 कमल पंत

एक कालेज हुआ करता था, वो गुमनाम से शहर के अनजान से कसबे में, उस कालेज की बड़ी सी उपलब्धी बस इतनी सी थी,कि उस पूरे इलाके में जिसने भी कुछ हासिल किया उसमे उस कालेज का योगदान रहा. आईएएस अधिकारी से लेकर चपरासी तक जो भी सरकारी नौकरी पाया उसने मजबूरन या गैरमजबूरी में उसी कालेज से शिक्षा पायी(कोइ दूसरा आसरा था नहीं, बैचलर इन समथिंग समथिंग वाली डिग्री अगर लेनी थी तो उसी कालेज में एडमिशन लेना था) वो कहते हैं ना उच्च शिक्षा का एकमात्र केंद्र वही था. जिसमे साल के छ महीने चुनाव चलते थे, (कालेज इलेक्शन), उसके बाद के छ महीने हड़ताल . इस बीच में कुछ समय अगर बच जाता था तो छात्र संघ अध्यक्ष की आज्ञा से कालेज का प्रिंसिपल उसमे पेपर निपटा देता था.

कालेज का बहुत नाम था, सभी पुराने रिटायर फ़ौजी,नेवी सिपाही,एयरफोर्स सिपाही,बैंक के बाबू, मैनेजर , फेक्ट्री वर्कर सब वापस आ आकर बताते थे कि उन्होंने भी इसी कालेज से पढ़ा है. हालांकि ‘पढ़ा है’ ये दो शब्द अपनी गरीमा के अनुरूप कार्यरत नहीं थे यहाँ. क्योंकि यहाँ एडमिशन लिया जाता था उसके बाद परिक्षा फ़ार्म भरा जाता था फिर पेपर दिए जाते थे. हाँ 100 में एक बच्चा टीचरों के पास कापी किताब लेकर आ जाता था लेकिन वो करता क्या था ये देखने जाने की जेहमत आजादी के बाद से लेकर इन 67 सालों में किसी ने नहीं उठाई.

कस्बे में कुछ नियम हर पीढी के बच्चों के लिए एकसमान रूप से लागू थे. हाईस्कूल तक की शिक्षा में चौथे पीरीयड तक अधिकतम स्कूल में रहना, इंटर में स्कूल जाकर हाजिरी जरूर लगाना और कालेज में एडमिशन फ़ार्म जरूर भरना और कालेज इलेक्शन में वोट देने जरूर जाना क्योंकि वह संवैधानिक अधिकार होता है. बाकी एक्साम से ठीक पहले नजदीकी दुकानदार एक एसी पत्रिका उपलब्ध करा देते थे जिसमे दिए दस सवाल पढने पर कालेज की परिक्षा पास करने की गारंटी रहती थी.

जिस तरह पिछली पीढी ने पढ़ा उसी तरह अगली पीढी भी अपना ‘पढना धरम’ निभा लेती थी. जो सरकारी नौकरी में लग गया उसकी किस्मत में वही लिखा था, और जो नहीं लग पाया उसकी किस्मत खराब थी. कुछ एक फर्स्ट आने वाले लड़कों के लिए इस नियम में कुछ छूट दी जाती थी.

एसे ही एक बार एक इसी कालेज के छात्र ने दूर शहर के वो भी दिल्ली शहर के कालेज को देख लिया, पहले तो उसे यकीन ही नहीं हुआ कि कालेज में स्कूल के बच्चों की तरह पढ़ा भी जाता है. जब तक वह इस बात पर विशवास करता कि कालेज में स्कूल के बच्चों की तरह पढ़ते हैं तब तक उसके सामने कुछ एसे लोग आ गए जो पढाये गए विषय में चर्चा कर रहे थे, टीचर के पढाये हुए को गलत और सही बता रहे थे. ऊपर से ये डायलोग और मार रहे थे कि ‘मैंने फलाना डाक्टर एल्प्पीजी की किताब में पढ़ा या ढीमकाना डाक्टर सेपील की किताब में पढ़ा.’ उस कालेज के बच्चों की चर्चाएँ देखकर उसे चक्कर आ गया. उसने पूछा ‘ये क्या कर रहे हो कालेज में,कालेज की गरिमा का सत्यानाश क्यों कर रहे हो. इस तरह कौन कालेज को बर्बाद करता है.’ तो दिल्ली वाले सब तैश में आ गए. वो बेचारा घबरा गया और भाग गया. वापस आकर उसने सबको बताया कि दिल्ली में उसने चिड़ियाघर के अलावा एक एसा अनोखा कालेज भी देखा जहाँ पहले तो टीचर के पढाये को पढ़ रहे थे दूसरा आपस में बहस भी कर रहे थे. किताब में लिखी चीज को इतना सीरियसली ले रहे थे जैसे इन्ही किताबों से उनका भला होना हो.

उसकी बात सुनकर सब अनजान कालेज वाले बच्चे खूब ठहाका मारकर हँसे, एसे कालेज को अस्तित्व में जानकर उनको पेट पकड़ कर हंसने का मन किया, उन्होंने अपने सीनियर पीढी वालों को बताया कि दिल्ली में एसे कालेज अस्तित्व में हैं जहाँ पढ़ाया जाता है, किताब की बात को सीरियसली लिया जाता है. उनकी सीनियर पीढी भी खूब खिलखिलाकर हंसी एक बुजुर्ग बोले ‘ हाँ यार मैंने भी सूना है कि दूर शहरों में एसे कालेज भी हैं जहाँ किताब की बातों को सच मान जाते हैं,खैर तुम उनकी बातों में मत आना,अपनी पढाई करो(जो इस कालेज में होती आयी है और जो हमने करी है ) इस कालेज से एमए करो,किस्मत में होगा तो सरकारी लग ही जायेगी, नहीं होगा तो किस्मत से कौन लड़ सकता है. शादी हम तुम्हारी करा ही देंगे क्योंकि लड़की भी यहीं की होगी इसलिए हमेशा तुम्हारी हां में हां मिलाएगी किताबों की बातों में ध्यान नहीं धरेगी कभी, हाँ लड़की लायेंगे बिलकुल एमए बीएड .

तुम्हारा घर बसायेंगे तुम्हारे जो बच्चे होंगे उन्हें भी यही सिखाना जो हमने तुम्हे सिखाया. ठीक है. बस उस छात्र ने खुशी खुशी अपने सीनियर पीढीदार को मुस्कुरा कर मौन स्वीकृती दी , और वो दोनों उस कालेज में दिखे नए नए माहौल को बिलकुल वैसे भूल गए जैसे चिड़ियाघर में भालू देखकर भूल गए थे.

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