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 क्रिसमस बनाम तुलसी दिवस

दिसंबर 26, 2017 Girish Lohni

पिछले कुछ सालों में क्रिसमस, न्यू ईयर, वेइलेन्टान डे आदि पर तीन तरह के मैसेज आते हैं एक होते हैं जो अति-उत्साही तरीके से मैरी क्रिसमस के लम्बे लम्बे मैसेज ( आज के दौर में विडियो) भरे होते हैं. दुसरे मैरी क्रिसमस लिखकर याद दिलाते हैं कि क्रिसमस इसाई का त्यौहार है इसलिए इसे नहीं मनाया जाना चाहिए फिर आते हैं क्रिसमस को तुलसी फुंसी फौड़ा घोड़ा जैसे दिवस पर परिवर्तित कर देने वाले.

हर किसी शहर के गली मौहल्ले में ऐसे लड़के मिल जाते हैं जो पहले एक लड़की के पीछे “डर” का शाहरुख खान बन कर घुमते हैं और जब लड़की उसे मना कर दे तो देवदास का शाहरुख खान बन लड़की को बदनाम करना शुरू कर देते हैं. फुंसी-फोडा दिवस वाले इसी कैटेगिरी के स्व-मैच्योर स्व-सांस्कृतिक खिलाड़ी हैं.

जबरन दुसरे धर्म के नाम पर डराकर अपने धर्म का स्वयंभू- संरक्षक बनना भारत में नया पेशा है. ऐसा नहीं है कि ये लोग केवल हिंदू सम्प्रदाय में है अन्य धर्मों में ये पहले से मौजूद हैं और वर्तमान में खासे रसूख वाले भी हैं. इनकी देखा-देखी में हिंदू सम्प्रदाय में भी कुछ लोग संरक्षक के पेशे में अपना स्कोप खोज रहे हैं.

मसलन अचानक से आपको क्रिसमस के दिन तुलसी दिवस की ढेरों शुभकामनाऐं आ जायेंगी. जबकि तुलसी पूजन के लिये एक अलग दिन तय है. जिसे सामान्य शब्दो में तुलसी उद्यापन कहा जाता है. क्रिसमस और तुलसी के कॉकटेल में स्वंभू सरंक्षक अपनी रोटी सेक रहा है

इसीप्रकार अचानक से आपको हर राज्य में गौ संरक्षक दल देखने को मिल रहे हैं. इनकी संख्या उन राज्यों में अधिक है जो मीट का निर्यात पहले से ही अधिक करते हैं. वैदिक साहित्य में गाय के लिये “अघन्या” शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ है न मारे जाने योग्य. वैदिक काल के अंत तक गौ हत्या करने पर मृत्यु दंड और देश निकाल जैसे प्रावधानो का उल्लेख भी देखने को मिलता है.

वर्तमान में स्वयंभू गौ-रक्षक इन सभी तथ्यों के साथ खेलता है और एक कहानी गढ़ता है और उक्त तथ्यों में अरब आक्रमण को जोड़ देता है. यदि वैदिक काल में गौ हत्या प्रतिबंधित थी इसका अर्थ ये भी है कि उस समय गौ हत्या होती थी. वर्तमान में कथित संरक्षकों ने इस गौ-हत्या को राष्ट्रीय समस्या के रुप में रेखांकित कर दिया है.

धर्म आस्था का विषय है. यदि आस्था के विषय पर तर्क किये जाये तो आस्था हमेशा ही कठघरे में रहेगी. सोचने वाला विषय यह है कि क्या हमें ऐसे संरक्षकों की आवश्यकता है? क्या हम बिना क्रिसमस के महत्तव को घटाये तुलसी का महत्त्व नहीं बता सकते? ये संरक्षक और अतिवादिता सोच हमें किस ओर ले जा रहे हैं ?

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