गंभीर अड्डा

कब तक कहोगे चिंकी ?

अक्टूबर 4, 2016 ओये बांगड़ू

दिल्ली के प्रकाश शर्मा दिल्ली में घुमते घुमते जो चीजें फील करते हैं उन्हें अपनी कलम से कापी में घिस देते हैं. फिलहाल वह यह शक्ल सूरत पर होने वाले भेदभाव पर कुछ बता रहे हैं .

मेरे दिमाग से तो अभी तक सर्जिकल स्ट्राइक्स की ख़ुशी का नशा ही ख़त्म नहीं हुआ है। मोदी जी ने हमला किया, आतंकवादी ठिकानों पर हमला, वाकई तारीफ की बात है।
लेकिन अभी हमले करने बाकी हैं। एक भेदभाव पर बहुत बड़ा हमला होना ज़रूरी है।

मंगोलों की तरह दिखने वाले लगभग हर व्यक्ति को चिंकी कह कर अपमानित किया जाता है। यहाँ तक कि अनेक ऑफिसों में नेपाली या नेपाली मूल के गोरखालियों से, जो भारत में ही जन्मे, पले, बढे, उनसे जमकर भेदभाव किया जाता है। अनेक बार ये भेदभाव चोरी छिपे होता है और असंख्य बार खुलेआम।

“फोरेनर है।……”!

चोरी छिपे लोग ग्रुपों में इस तरह से भेदभाव पैदा कर इन भारतीयों को जाने-अनजाने में ही पराया बना देते हैं। ज़िन्दगी भर जय हिंद बोलकर गर्व महसूस करने वाला, तिरंगे को देखकर फख्र से गर्दन ऊंची करने वाला एक देशभक्त, ऐसे व्यवहार को जब तक समझता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

ये देशभक्तों का ग्रुप, जो भारत के प्रति समर्पित गोरखों के साथ अन्याय करते हैं, अनजाने ही अपने देश के साथ भी अन्याय कर रहे होते हैं।

भला कैसे?

जय माँ काली आयो आयो गोरखाली
के नारे के साथ दुश्मन पर कहर बनकर टूट पड़ने वाले गोरखालियों के साथ ये व्यवहार कितना उचित है, आप अंदाजा लगाएं। यही वो गोरखे हैं, जिनकी भर्ती भारत और नेपाल में बड़े पैमाने पर होती है और एक बार भारतीय सेना में शामिल होने के बाद ये भूमि को दुश्मन के चंगुल से बचाने के लिए जान की बाज़ी लगा देते हैं। दुर्गम पहाड़ियों और तेज़ तर्रार खुकुरी पर इनकी महारत का लोहा सारा संसार मानता है। पाकिस्तानी सैनिकों के दांत अनेक बार खट्टे किये हैं इन गोरखा सैनिकों ने। कई गोरखा सैनिक भारत भूमि की रक्षा करते हुए शहीद हुए हैं। पिछले दिनों एक गोरखा सैनिक रेग्मी की लाश को भारतीय सेना ने बहुत सम्मान दिया। सोचें, वो मूलतः नेपाल का था, और उसने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए, भारत भूमि के लिए। अरे अपने देश के लिए तो हर कोई जान दे देता है, लेकिन परधर्म, परमुल्क के लिए जान देने का गोरखा सैनिक शायद इकलौते उदाहरण हैं।

हम हिन्दू सिखों का आज इसलिए सम्मान करते हैं कि परधर्मी होने के बावजूद महान सिख योद्धा गुरुओं ने हिन्दू धर्म की बर्बर मुसलमान आक्रांताओं से रक्षा की थी। अनेक हिन्दू माँ और बहनों की अस्मिता को बचाया था। तब के आक्रांताओ ने 12 बजे के उनके आक्रमण को मज़ाक रूप में 12 बज गए, कहने का एक मज़ाक भर बना दिया। आज जो हिंदुस्तानी एक बार, सरदारों के 12 बजने का अर्थ समझ जाए, तो उसका सिर अपने मज़ाक के लिए शर्म से झुक जाएगा और सिख गुरुओं के लिए सम्मान की भावना बहुत बढ़ जायेगी। अपनी रक्षा करने वाले प्रत्येक परधर्मी और परमुल्की का तो और भी ज़्यादा सम्मान होना चाहिए देश में, लेकिन उन्हें, ‘बहादुर’, ‘चौकीदार’, और भी न जाने क्या क्या कहकर लज्जित किया जाता है। लज्जित करने वालों को ये पता नहीं होता कि अनजाने ही वे एक मित्र देश के ईमानदार लोगों के मन में वैमनस्य के बीज बो रहे हैं।

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