बांगड़ूनामा

विकास-विकास का नारा देता मैं

अप्रैल 28, 2018 ओये बांगड़ू
लेखक -सुंदरम

सुन्दरम्, कच्ची उम्र में समाज से जुड़ने की कोशिश करता एक युवक है जिसको देखकर आप कहेंगे कि बच्चा ही है.लेकिन लेखनी में दम है

नहीं देखने मुझे ये धरने प्रदर्शन,
नहीं देखने ये आन्दोलन!

विकास विकास का नारा देता मैं,
उसको ही दोहराओ तुम!
घर में बैठे मनोरंजन लो,
सड़कों पे ना आओ तुम!

70 साल के नाम पर 15 साल मुझे भी दोगे तुम,
अब तो साल दर साल ‘बनोगे’ तुम!

मैं अपराजित, अविश्वसनीय, अतुल्य अजय हूँ,
किसान, युवा, पत्रकार, liberals का भय हूँ!
जो मुझे नापसंद होगा,
वो जरूर बंद होगा!

नहीं मैं freedom of speech के खिलाफ नहीं,
बस मैं मेरी खिलाफत के खिलाफ हूँ..
देश को कुछ दे पाऊं या ना,
काम करता 20 घंटे और मन से तो साफ हूँ!

विश्वास तो है मेरा संविधान में,
बस थोड़ी सी अपने धर्म की परवाह ज्यादा है!
सबका साथ सबका विकास तो बस नारा है,
और 5 करोड़ नौकरियाँ तो महज वादा है!
मुझको झूठा कहना तो विरोधियों का हमला है,
दरअसल 15 लाख हर खाते में तो केवल जुमला है!

देश में बोलने से डरता हूँ, पर बोलता मैं अच्छा हूँ!
काम कुछ होता नहीं मुझसे, पर दिल का मैं सच्चा हूँ!

आ रहा हूँ अगले बरस फिर से लेकर राम नाम,
तोड़ने के, बाँटने के, भिड़ाने के कर लिए हैं इंतजाम,
मेरी प्यारी वाणी का इतना तो दोगे ना इनाम
कि खून से लिख सकूँ मैं 2019 का परिणाम 

1 thought on “विकास-विकास का नारा देता मैं”

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