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Valentine Week 2019: बाज़ार में फीके पड़े प्यार के रंग

फरवरी 13, 2019 ओये बांगड़ू

इश्क मोहब्बत प्यार के दिन चल रहे है यानी वैलेंटाइन वीक . कल इस प्यार के सप्ताह का समापन्न होगा, इसके बाद सेंट वेलेंटाइन को याद करे बिना वेलेंटाइन डे मना लिया जाएगा और ये सप्ताह अगले साल तक स्थगित हो जाएगा। ये सब याद दिलाने की वजह यह है कि इस वर्ष पूर्व के वर्षों की भांति वेलेंटाइन सप्ताह में कुछ खास उत्साह देखा नही गया। मार्केट विशेषज्ञ बता रहे हैं कि इस बार बाजार सूनी रही, जबकि 2017 में जब नोटबन्दी ने सता रखा था तब भी मार्केट में ठीक ठाक खरीदारी हुई थी। अब कैडबरी और अन्य चॉकलेट ब्रांड के आंकड़ें आना बाकी है और एक दिन बचा हुआ है। मगर क्या सच मे वेलेंटाइन को लेकर होने वाला उत्साह खत्म हो गया है, या देश का युवावर्ग इससे आगे बढ़ गया है, या यूथ कम होता जा रहा है या कोई और कारण है?

वैसे ये पूरा लेख इन्ही सब चीजों पर आधारित नही है, ये बस एक त्वरित टिप्पणी है .12 फरवरी को की गई एक मार्केट रिसर्च की। किस तरह की मार्किट रिसर्च?

हमने पूर्व की भांति चाईनीज सामग्री बिक्री केंद्र अर्थात, अपने दिल्ली के सिग्नल, और छोटे मोटे दुकानदारों से जब बातचीत की तो पाया कि वह पहले की भांति सामान तो ले आये हैं मगर बिकने का नाम नही ले रहा।

जैसे पीतमपुरा में सबसे भीड़भाड़ वाले एकलौते सिग्नल पर, चाईनीज गुलाब अर्थात वह लाइट वाला गुलाब और दिल बेचने वाले बच्चों ने बताया कि इस बार अभी तक सिर्फ 1/4 माल बिका है, ध्यान रहे, पिछले कई सालों में यहां माल रोजाना के हिसाब से बिका करता था, रोजाना इन सिग्नल वेंडर्स को अपने ठेकेदारों के पास दिन में दो से तीन बार जाना पड़ता था क्योंकि जापानी पार्क रोहिणी, एम2के, जी3एस आदि जगहों में वेलेंटाइन सप्ताह मनाने जाने वाले युवा अपने प्रियतमों को यहीं से दिल, गुलाब टेडी जैसी चीजें दिला दिया करते थे।

मगर इस बार क्या हुआ? यह सवाल जब सिग्नल पर पूछा तो बच्चे का मासूम जवाब आया कि “हाथ मे दिल, गुलाब देखकर वह पीट देते हैं,इसलिए लोग खरीदने से डर रहे हैं”।

खैर हमने सीपी की तरफ रुख किया, दिल्ली की धड़कन यहीं है, चहल पहल तो हमेशा की तरह शानदार थी मगर सामान बेचने वाले भागते नजर आ रहे थे, गौर से देखा तो उनके पीछे एमसीडी वाले लगे थे, उनका सामान छीनने के लिए, अब एमसीडी वाले उस समान को वापस तो नही करते होंगे, जाहिर है अपनी अपनी गरलफ्रेंड को दे देते होंगे, उनका भी वेलेंटाइन मन जाता है।

सीपी के आउटर सर्कल में बच्चे सिग्नल पर बड़े बड़े गुलाब के असली वाले बुके बेच रहे थे, चार छह सिग्नल हो जाने के बाद एक बुके बिक जा रहा था जिसकी कीमत 200 से 2000 तक थी, मल्लब कि आप भाव तोल कितना कर लेते हो, कुछ गाड़ी वाले सज्जन बच्चा समझकर 2000 भी पकड़ा देते हैं और कुछ भाव तोल करके 200 में भी ले जाते हैं।

सबका अपना अपना हिसाब है, खैर यहां के पूर्व नशेड़ी, गजानन्द कहते हैं कि पहले दिन में दो चार गुलाब (प्लास्टिक वाले) बिक जाने पर,एक पव्वे लायक पैसे आ जाते थे, ज्यादा समय सिग्नल पर नही गुजारना पड़ता था, मगर अब ये लड़का लड़की, नशेड़ी समझकर खरीदते ही नही कुछ। उसने अपने बदले एक बच्चे को ड्यूटी पर लगा रखा है जो कुछ न कुछ बेच ही देता है। दोनो की सही चल रही है

आईटीओ पर भी काफी लोग मौजूद थे, और ये भी व्यस्ततम चौराहों में एक है मगर दिल्ली पुलिस वाले बार बार अनाउंसमेंट करते हैं कि सिग्नल पर वेंडर से कोई सामान न खरीदें, शायद इस अनाउंसमेंट का असर हो रहा है। वैसे हमने एक वेंडर से पूछा कि इस अनाउंसमेंट का तुम्हारे जीवन मे कोई असर पड़ा है क्या? वह बोला जब ये अनाउंसमेंट 100 बार सुनकर भी लोग सीट बेल्ट नही बांधते तो हमसे सामान खरीदना क्यों छोड़ेंगे। भैंस के आगे बीन बजाए भैंस खड़ी पगुराय, वैसे भी ये इंडिया है जिस काम के लिए मना करो वह काम लोग ज्यादा करते हैं।

इतनी जगह घूमने के बाद यह आभास तो हुआ कि हां वेलेंटाइन वाला सामान पहले के मुकाबले कम बिक रहा है। लगता है भारत धीरे बूढ़ों का देश होने वाला है।(संस्कृति से जोड़ने वाले लोगों को गिनती में न गिनते हुए यह बात कह रहा हूँ)।

हां बजरंग दल का खौफ जरूर था मगर अब वह मजाक बन कर रह गया है, कि सिंगल हो तो बजरंग दल में चले जाओ। बाद बाकी वेलेंटाइन का एक दिन बचा है। कल भी चक्कर लगाकर देखेंगे कि कहां कहां क्या क्या फर्क पड़ा है।

 

 

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