यंगिस्तान

‘वैकेशन होमवर्क’

मार्च 29, 2017 ओये बांगड़ू

रमीज रजा अंसारी ने बनारस से एक याद भेजी है. यंगीस्तान को अपना बचपन याद दिलाने के लिए

गर्मियों ने दस्तक दे दी है। लोगों ने अपने कूलर और पंखे साफ़ करने शुरू कर दिए हैं। घर के एक कोने में अब तक तिरस्कृत पड़ा फ़्रिज़ एक बार फिर से महत्वपूर्ण हो गया है।
बचपन की यादों में झांके तो लगता है गर्मियो से बेहतर मौसम होता ही नहीं था। गर्मियों का मतलब लंबी छुट्टी। कोई स्कूल नही, कोई बस्ते का बोझ नहीं, होमवर्क न करने पर कोई डाँट नहीं गर्मियां मतलब ददिहाल- ननिहाल घूमने का सुनहरा मौका। साल भर अपने नाती- पोतों की बाट जोहती बुज़ुर्ग आँखों की मन्नत इन गर्मियों में ही तो पूरी होती थी।
गर्मियों में दोपहर का खाना खाने के बाद ही घर के बड़ों को नींद के घेर लेती थी। लेकिन हम बच्चों की आँखों में नींद कहाँ होती थी? वो वक्त तो खुली आँखों से सपने देखने का था। घर के बड़े सोये नहीं की दबे पाँव घर से फ़रार। खेत खलिहान और बगीचों में दोस्त पहले से ही जमे रहते थे।
आज बच्चे घरवालों से नज़र बचा के अगर भागे भी तो कहाँ जाएं? खेत-खलिहान, बाग़-बगीचे सब तो ‘विकास’ नाम के एक राक्षस ने निगल लिया। गर्मी की छुट्टियां भी ‘वैकेशन होमवर्क’ के बोझ तले दब गयी। अब तो गर्मी भी महज एक मौसम भर रह गया है बच्चों के लिए।

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