ओए न्यूज़

उत्तराखंड की पहली लोकगायिका कबूतरी देवी

जुलाई 7, 2018 Girish Lohni

कबूतरी देवी उत्तराखंड लोकगीत का वो नाम है जो कैसेट, सीडी, यूटूयूब के दौर से भी पुराने रेडियो के दौर से लोकसंगीत प्रेमियों के दिलों में राज करता है. कबूतरी देवी की मृत्यु सीमांत जिले पिथौरागढ़ के जिला अस्पताल में होने की खबर अपने आप में यह बताने को काफी है कबूतरी देवी किस जमीन से ताल्लुकात रखती हैं.

गायन तो सभी गायक करते हैं लेकिन गायन को जीते कुछ ही लोग हैं. कबूतरी देवी वो नाम है जिसने गायन को ज़िया है. काली कुमाऊं चम्पावत में जन्मी कबूतरी देवी का विवाह पिथौरागढ़ के दीवानी राम से हुआ. पति के प्रयासों के चलते कबूतरी देवी को कई मंच मिले. 70-80 के दशक में रामपुर,लखनऊ,नजीबाबाद के रेडियो केंद्रों से कबूतरी देवी की मधुर तान सुनी जाती थी. इस दौरान रेडियो में प्रसारित गीतों में कबूतरी देवी की खनकती आवाज में पहाड़ों का ठण्डो पाणि, कि भलि मीठी बाणी खासा लोकप्रिय था.

कबूतरी देवी वो गायिका हैं जिन्होंने पहाड़ की महिलाओं द्वारा घास काटते, जंगल जाते, मायके की याद में, जीवन के संघर्ष के गीतों को राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय मंच में लोकप्रिय किया. कबूतरी देवी के आकाशावाणी से प्रसारित ऋतुरैण आज भी लोकप्रिय हैं. उत्तराखंड की तीजनबाई नाम से लोकप्रिय कबूतरी देवी का जीवन संघर्षो से भरा रहा.

पति की मृत्यु के बाद कबूतरी देवी ने आकाशवाणी और मंच दोनों के लिये गाना बंद कर दिया. 2002 के बाद कुछ लोक मंचों पर उनकी उपस्थिति देखी गयी. पहाड की नियति बन चुके पलायन से उनके एकमात्र पुत्र ने तो हार मान ली लेकिन कबूतरी देवी अपने जीवन की अंतिम सांस भी पहाड़ में ही ली.

यह 18 वर्षों में हमारी नाकामी ही है कि हम कबूतरी देवी जैसी संघर्षशील महिला को उसके पहाड़ में एक ऐसा अस्पताल ना दे पाये जो उसके जीवन में पांच छ: बरस और जोड़ देता. बेहद सामान्य जीवन जीने वाली आम जन की लोकप्रिय गायिका के लिये उत्तराखंड सरकार एक हैलीकाप्टर तक की व्यवस्था 12 घंटे में नहीं कर पाई. उत्तराखंड की पहली लोकगायिका को ओए बांगडू का नमन.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *