गंभीर अड्डा

उत्तराखंड बजट और शिशु लिंगानुपात

जनवरी 24, 2018 Girish Lohni

शिशु लिंगानुपात 0 से 6 वर्ष की आयु के मध्य प्रति हजार लड़कों में लड़कियों की संख्या दर्शाने वाला एक आकड़ा है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की सभी 36 प्रशासनिक इकाइयों में उत्तराखंड सबसे कम शिशु लिगांनुपात की सूची में सातवें स्थान पर है। 2011 जनगणना के अनुसार उत्तराखंड में शिशु लिंगानुपात 890 रहा है। मने प्रति 1000 शिशु लड़कों पर 890 लड़कियां।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वे की वार्षिक रिपोर्ट के आकडे अधिक भयावह हैं। 2011-12 में जन्म के समय लिंगानुपात 861 और 2012-13 में 867 है यदि इसे शिशु मृत्यु दर के आकड़े के साथ प्रस्तुत किया जाय तो यह क्रमशः 813 व 819 हो जाता है। यदि स्थिति यही रही तो 2021 की जनसंख्या में शिशु लिंगानुपात 800 के करीब रह जायेगा।
सरकारें कैसे अपरिपक्व आधारों पर योजनाए बनाती है इसका उदाहरण है राज्य में 2009 से चल रही नंदा देवी कन्या योजना जिसे 2014 में हमारी बेटी हमारा अभिमान के रुप में चलाया गया। यह योजना केवल बीपीएल परिवारों के लिये है। समस्या कन्या भ्रूण हत्या की है और भ्रूणहत्या के लिये एक बार में पांच से सात हजार बाजार में ऐंठे जाते हैं। क्या एक व्यक्ति जो बीपीएल हो उसके लिये यह धनराशि इकट्ठा करना इतना आसान है। निश्चित ही यह मध्य वर्ग व उच्च वर्ग का खेल है जिसमें बदनाम गरीब है।
आते हैं योजना के क्रियान्वयन पर। इस योजना के तहत 2014 से लड़की के जन्म पर 15 हजार की राशि दी जाती है जिसमें दस हजार रुपये की एफडी कर लड़की व परिवार के संयुक्त खाते  से 18 वर्ष पूरे होने पर दी जाती है। 2011 की जनसंख्या के अनुसार राज्य में कुल 6,19,718 बीपीएल परिवार हैं 2009 से 2015 के बीच केवल 30,830 लड़कियां ही लाभान्वित हुई हैं। मतलब लगभग केवल 4 प्रतिशत परिवार की लड़कियां या एक वर्ष में लगभग केवल 6000 लड़कियां ही लाभान्वित हुयी है।
राज्य के दो प्रमुख जिले ही लें तो अल्मोड़ा मे 2014-15 में लगभग 2900 आवेदन हुये जो अगले वर्ष 3000 हो गये लेकिन केवल 800 लड़कियों को ही लाभ मिल सका। 2016-17 में नैनीताल जिले में 2696 पात्र वंचित हैं। योजना के लिये बजट के अभाव के चलते योजना का क्रियान्वयन खस्ता हाल है।
यह योजना प्रशासकों की मानसिकता पर भी सवाल खड़ी करती है क्या कन्या भ्रूण हत्या केवल निम्न वर्ग की समस्या है? क्या सरकार को उच्च व मध्यम वर्ग में भी कोई सामाजिक जागरूकता अभियान नहीं चलाना चाहिए? क्या सरकार को उक्त योजना में परिवर्तन नहीं करने चाहिए जैसे कि एफडी की राशि का प्रयोग उच्च शिक्षा हेतु किये जाने पर इसकी परिपक्वता अवधि कम कर दी जाय या स्वरोजगार व शिक्षा हेतु ही एफडी की राशि का प्रयोग हो।
70 प्रतिशत साक्षरता का दंभ भरने वाली उत्तराखंड के अनपढ़ समाज को भी जागरुक होना होगा। बेटे की चाह में तीन-चार बेटीयां पैदा कर चुके मां बाप द्वारा निजी स्वार्थ से चलाये जा रहे फर्जी अभियान से भी सजग रहना होगा। फेसबुक प्रोफाइल परिवर्तन से नहीं मानसिक परिवर्तन से एक स्व-आन्दोलन की आवश्यकता है राज्य को।

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