गंभीर अड्डा

उत्तराखंड बजट और कृषि

जनवरी 23, 2018 Girish Lohni

प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी उत्तराखंड का बजट बनाने की तैयारी जोरों पर है. देखना है कि इस बार भी राज्य के लोगों को बनाया जाता है कि राज्य के लोगों के लिए बजट बनाया जाता है. क्या उत्तराखंड राज्य का बजट सामान्य आर्थिक मानक के आधार पर बनाया जा सकता है या इसके लिए कुछ विशेष मानको की आवश्यकता है ये एक गंभीर सवाल है ? 

उदाहरण के लिए वर्ष 2004-05 में राज्य की जीडीपी में कृषि में योगदान 22 प्रतिशत था जबकि 2016 में घटकर यह 9 प्रतिशत हो गया. किसी भी अर्थव्यवस्था के लिये उसकी प्रारंभिक क्षेत्र में निर्भता कम होना विकास का सूचक है क्या उत्तराखंड के लिये भी ये मानक सही है?

उत्तराखंड एक राज्य जिसका लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा पहाड़ी क्षेत्र है जिसमे की जाने वाली कृषि का मुख्य रुप से केवल जीविकोपार्जन के लिये की जाती है. एक ऐसे राज्य में उक्त आँकड़ा कितना सही चित्र बना सकता है सवालिया प्रश्न है.

जैविक कृषि विचार के रुप में श्रेष्ठ है. राज्य सरकार का जैविक कृषि के प्रयास के संबंध में देश में पहला स्थान उससे भी अधिक उत्साहवर्धक है.  लेकिन 80 प्रतिशत पहाड़ी क्षेत्र वाला राज्य जिसका केवल 11 प्रतिशत हिस्सा सिंचित है, सरकार एक सार्वभौमिक फार्मूले पर जैविक खेती लागू करने का सपना दिखा रही है राज्य की कुल कृषि भूमि में 56 प्रतिशत सीधे वर्षा पर निर्भर है. एक ऐसे क्षेत्र जहां खेती को कभी व्यावसायिक रुप से किया ही नहीं वहां इस सार्वभौमिक तरी़के से जैविक कृषि करना कितना सही है?

क्या सरकार इस बात से अवगत है कि वर्तमान में उत्तराखंड में कृषि के लिये सबसे प्रमुख समस्या बंदर, जंगली सुअर और भालू है. सरकार ने कितने जंगली सुअर पकड़े क्या सरकार के पास इसके आँकड़े हैं क्या सरकार ने बंदरों से खेतों को बचाने के लिये कोई प्रयास किया. एक क्षेत्र जो केवल अपने जीविकापार्जन के लिये खेती करता है उसके लिये क्या आवश्यक है किसान मृदा कार्ड या इन जानवरों से बचाव के प्रयास.

बिना किसी सरकारी आकडे के राज्य कई वर्षों से नाशपाती अखरोट आड़ू खुमानी दाडीम माल्टा चूक ( बड़ा नीबू)  आदि कुछ फलो के उत्पादन के देश में प्रथम स्थान पर है. क्या राज्य सरकार के पास ऐसा कोई आँकड़ा है जो बताता हो कि राज्य में कितने अखरोट के बाग हैं कितने माल्टे के पेड हैं?

भारत में कितने राज्य हैं जहां माल्टे का उत्पादन होता है हमारी सरकारें अपनी शक्ति के बजाय सेव के पीछे भाग गयी और उसके माल्टे व संतरे का बाजार किन्नू ने खा लिया. दिल्ली एनसीआर में बब्बूघोसा नाम से 60 से 90 प्रति किलो बिकने वाला नाशपाती उत्तराखंड में पशुओं का आहार है. यदि सरकार ने अ‍ब भी इन फलो के सरंक्षण में कोई प्रयास नहीं किया तो या ये ऐसे ही बर्बाद होते रहेंगे या फिर जल्द उत्तराखंड के ये फल केवल संग्रहालयों में पाये जायेंगे.

ये हमारा दुर्भाग्य है कि मडूआ झंगोरा भट्ट गहत कभी हमारे बजट में जगह ही नहीं प्राप्त कर सके है आधुनिक कृषि के भूत के बजाय आवश्यकता है पारंपरिक खेती को भी बढ़ावा दिये जाने की. आवश्यकता है कि राज्य सरकार राज्य के प्रमुख फसल एवं फलो के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी करे क्या सरकार जिन फलो के उत्पादन पर देश भर में पहले नम्बर में होने का दावा कर रही है उसके बागों की गणना कर सही जानकारी उपलब्ध कराये.

कृषि उत्तराखंड के लिये विकास की नीव साबित हो सकती है जिसे सरकारी बल की आवश्यकता है. सरकार को कृषि पर न केवल खर्च बढ़ाने की आवश्यकता है बल्कि राज्य को ध्यान में रखकर कुछ कानूनो को समाप्त करने की भी आवश्यकता है.

2 thoughts on “उत्तराखंड बजट और कृषि”

  1. बहुत गंभीर मुद्दा उठाया है, बेसे सरकार का काम है हर क्षेत्र में विकास करना बस कभी कभी भूल जाते हैं,और नई सरकार बनी है हो सकता है आपकी पोस्ट में जो जिन जिन मुद्दों को उठाया गया है , हो सकता है ये कने सीएम ध्यान दें, वैसे राजनेता राजसुख में व्यस्त हो जाते हैं।

  2. बहुत गंभीर मुद्दा उठाया है, बेसे सरकार का काम है हर क्षेत्र में विकास करना बस कभी कभी भूल जाते हैं,और नई सरकार बनी है हो सकता है आपकी पोस्ट में जो जिन जिन मुद्दों को उठाया गया है , हो सकता है ये कने सीएम ध्यान दें, वैसे राजनेता राजसुख में व्यस्त हो जाते हैं ।

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