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उपवास के प्रकार

अप्रैल 10, 2018 ओये बांगड़ू

दरअसल जो लोग उपवास पर हल्ला मचा रहे हैं उन्हें उपवास की जानकारी ही नहीं है . उपवास दो तरह के होते हैं एक धार्मिक उपवास एक राजनैतिक उपवास . धार्मिक उपवास भी दो प्रकार का होता है – दिन भर खाऊ पीऊ उपवास और निर्जल उपवास .खाऊ पीऊ उपवास आधुनिक एवं उच्च वर्ग एवं उच्च शिक्षित लोगों द्वारा किया जाने वाला उपवास है और निर्जल उपवास गरीब अशिक्षितों पुरातनपंथिंयों द्वारा किया जाने वाला उपवास है . इसे आप आडम्बर भी कह सकते हैं .
अब आते हैं राजनैतिक उपवास पर . कभी यह अपनी बात मनवाने का सशक्त माध्यम होता था . आजकल अपनी छवि चमकाने का सशक्त माध्यम है . अनशन , क्रमिक अनशन , आमरण अनशन इसके सहोदर भाई हैं . मैं तो नेताओं से आग्रह करता हूं कि इसके सहोदर भाईयों में एक और भाई को जोडकर अभीमरण अनशन भी किया करो ताकि इसकी सफलता आपकी पार्टी को तत्काल फलदाई हो और जनता के लिए सुखदाई .
धार्मिक उपवास भगवान को प्रसन्न करने के लिए होता है और यह भी धारणा है कि निराहार रहकर शरीर के विषैले अवयओं को बाहर किया जाय .
राजनैतिक उपवास जनता को प्रसन्न करने के लिए होता है . लेकिन किया जाता है गाँधीजी की मूर्ति के सामने . यहां भी मान्यताओं का पूरा खयाल रखा जाता है . पहले समाचार पत्रों के पत्रकार बुलाये जाते थे अब न्यूजचैनलों के पत्रकार . चूंकि गाँधीजी आडम्बरों के घोर विरोधी थे इसलिए उनके आदर्शों को ध्यान में रखकर छोले भटूरे पूरी सब्जी टाइप कुछ भरपूर तैलीय और पौष्टिक चीजें ठूंसकर ही उपवास किया जाता है . अगर भूखे पेट उपवास किया तो वो तो आडम्बर ही कहलाएगा .
वैसे छोले भटूरे खाकर उपवास करने को शास्त्र सम्मत ही कहा जाएगा .  क्योकि शास्त्रों में कहा है कि पहले आत्मा फिर परमात्मा . आत्मा को कष्ट देकर कोई भी किया गया कार्य कभी फलदाई हो ही नहीं सकता .
राजनैतिक उपवास में पुरानी बातों मान्यताओं का खयाल भी रखा जाता है . उपवास से पहले पुष्टाहार ही लिया जाता है . एक पुरानी कहावत है – भात कहै न आऊ न जाऊं , खिचडी कहे मजल पहुचाऊं रोटी कहे आऊं जाऊं .मतलब भात तुरन्त पच जाता है . खिचडी थोडा चलने फिरने तक पच जाता है और रोटी देर से पचती है भूख देर से ही लगेगी . अब इसमें छोले भटूरे खा लिये जाय तो इसे दूरदर्शिता से जोडा जाना चाहिये . क्या पता उपवास कितनी देर चले . कहीं बीच में भूख लग गयी तो जनता से छल हो जाएगा . परोपकार का कोई कार्य बीच में नहीं छूटना चाहिये . अब आप कहेंगे फोटो खिचवाने की जरूरत क्यों आन पडी . भाई डिजिटल युग है . चैनलों पर चलेगा . चैनल की भी टी आर पी आएगी . विरोधियों को बोलने का मौका मिलेगा , हमारे जैसे फरजी के लेखक को कलम चलाने का मौका मिलेगा . एक साथ इतने परोपकार करने का मौका कौन छोडना चाहेगा .
आज तुलसी जिन्दा होते तो वो भी लिखते –
कर उपवास तू उल्लू बनाई ..
परहित सरिस धरम नही भाई ..

 

 लेखक परिचय 

व्यंगकार विनोद पन्त

 

विनोद पन्त ‘खन्तोली ‘ उत्तराखंड के प्रसिद्ध    व्यंग्यकार हैं और हिन्दी में भी अपने बाण यदा कदा छोड़ते रहते हैं,कांग्रेसी उपवास पर उन्होंने उपवास के प्रकार बताये हैं ताकि नेताओं को खुद को जस्टिफाई करने में मदद मिले

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