ओए न्यूज़

आज हम घूस को जस्टिफाई करेंगे

अक्टूबर 28, 2018 ओये बांगड़ू

भारत में घूस का इतिहास कितना पुराना है ठीक ठीक बता पाना थोड़ा मुश्किल है। लेकिन सर्विस से खुश होकर दी जाने वाली टिप सदियों पहले जहाजों से आना शुरू हुई। कुछ जानकार कहते हैं कि टिप जो है जहाज में सफर कर रहे उन रईसों ने शुरू की जो चाहते थे कि उनके महीनों के सफर के दौरान जहाज कर्मी उनकी जमकर ख़ातिरादारी करें। हालांकि जहाज कर्मियों का ये काम था कि वह अपने कस्टमर्स की खूब सेवा टहल करें और इसी का वह लोग वेतन भी पाते थे। मगर रईस व्यापारियों की चाह रहती थी कि उन्हें स्पेशल अटेंशन मिलती रहे , उनके काम को तवज्जो दी जाए, इसके लिए वह सेवाकर्मियों को टिप स्वरूप एक तरह की घूस दिया करते थे।

कालांतर में यह घूस होटलों और धर्मशालाओं तक पहुंच गई। जहां टेंपरेरी निवास करने वाले व्यापारी अपनी सेवाओं के एवज में अलग से विशेष टिप देने लगे।

टिप का सीधा साधा मतलब होता था कि भाई जो तू काम कर रहा है वह कर, बस जब मैं बुलाऊँ तो दौड़ा चला आ।

अब आते हैं भारतीय सरकारी बाबूओं की टिप पर। आजादी के बाद ठेके वेके खूब जाते थे। अंग्रेज भारतीय क्लर्कों, इंस्पेक्टरों वगेरह को टिप देने की आदत तो लगा ही चुके थे। तो हर बार वह टिप के बाद उसी का काम करते जिसकी टिप ज्यादा रहती।

आजादी के बाद भी परम्परा बनी रही।

टिप की डिमांड जबरदस्त तरीके से बढ़ने लगी। जिसका जो काम होता, वह उस काम के बदले वेतन तो लेता ही साथ ही इस उम्मीद में रहता कि कोई आकर उसे उस काम का अतिरिक्त पैसा भी दे जाए।

धीरे धीरे यह आदत बदलने लगी, कम्पीटीशन बढ़ गया। तो पहले जो जितनी ज्यादा टिप देगा सिर्फ उसी का काम होगा बाकी जन चुपचाप टिप का इंतजाम करें।

सीधा सीधा मेसेज सभी तक पहुंच चुका था

खैर समय के साथ साथ यह टिप विकराल रूप ले चुकी थी। अब टिप सिर्फ कुछ रुपयों की न होकर वेतन की दुगनी या तिगुनी होने लगी थी । बाबू खाली बैठा रहेगा मगर काम तब तक न करेगा जब तक सही टिप न मिले। धीरे धीरे यह आदत बाबू से होते हुए अधिकारी और अधिकारी से होते हुए मंत्रियों में भी जा पहुंची। उनका भी साफ सिंपल रूल, जिसकी टिप उसका काम।

कम्पीटीशन वाले क्षेत्रों में , जिसकी ज्यादा टिप उसे कांट्रेक्ट।

अब जैसे हम वेटर को 10 रूपया टिप देते हैं, हालांकि वह अपना काम कर रहा है। मगर सर्विस के नाम पर हम उसे अलग से पैसे पकड़ा आते हैं। कम्पलसरी कुछ नही होता, बस वेटर आपके अगली बार आने पर आपके ऊपर विशेष ध्यान दे दे । इस मानसिकता को ध्यान रखते हुए। ढाबे में हम छोटू को 20 रूपया अलग से टिप स्वरूप पकड़ा देते हैं।

न देने वाला कुछ कहता है न लेने वाला। बस एक हिडन मेसेज होता है कि अगली बार आऊं तो थोड़ा विशेष ध्यान दे देना।

10 और 10 करोड़ में फर्क है। मगर आदत एक ही है । दोनो के हिडन मेसेज बस ये हैं कि मेरा काम हो जाना चाहिए तभी पैसे दे रहा हूँ।

अब जब हम खुद ही घूस को प्रमोट कर रहे हैं तो क्यों भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हैं।

राफेल के नाम पर सरकार 1000 करोड़ खुद खाये या अनिल अम्बानी को खिलाए हमें क्या। हम क्यों परेशान होते हैं। आदत भी तो हमारी बनायब है। अनिल अंबानी के होटल्स वगेरह में हम टिप देकर निचले स्तर से घूसखोरी खुद ही शुरू कर चुके हैं।

आप देखिए, अनिल अकेले नही खायेगा साथ मे 70 और कम्पिनियों को खिलायेगा। और पार्टी फण्ड में पैसा देगा वह अलग। और ये सब वह कर रहा है सिर्फ हवाई जहाज लाने के लिए । सरकार का काम तो है ही लाना। अनिल बीच मे नही होता तब भी वह लाती राफेल। अब अनिल है तो मतलब टिप तो मिलेगी ही । बस सरकार खुश टिप देखकर।

बाकी सरकार कौनसा अपनी जेब से पैसे दे रही । स्वच्छता सेस, एजुकेशन सेस ये सेस वो सेस के नाम पर फिर से लगा देगी टेक्स और बस फिर हो गई भरपाई

हमारी सरकार कौनसा खुद कमाती है। कमाकर टेक्स स्वरूप देते तो हम ही हैं

खैर छोड़िये। कुल मिलाकर घूस गलत नही है। सदियों से चली आ रही है एक् परम्परा है। जिसे बरकरार रखना हमारी जिम्मेदारी है।

ओएबांगडू को भी टिप चाहिए। जिसे देने की इच्छा हो। कमेंट कर देना

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *