गंभीर अड्डा

आज़ाद भारत में बटुकेश्वर दत्त को लड़नी पड़ी गरीबी से लडाई

जुलाई 20, 2018 ओये बांगड़ू

आज बटुकेश्वर दत्त की  पुण्यतिथि है, वही बटुकेश्वर दत्त जिन्होंने 1929 में अपने साथी भगत सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजी सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेम्बली में बम फेंक कर इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारों के साथ ज़िंदगी भर को काला-पानी तस्लीम किया था.  वहीं बटुकेश्वर दत्त जिन्होनें भगत सिंह के साथ मिलकर बहरों को धमाके के साथ सुनाया था कि भारत की जनता साम्राज्यवादी औपनिवेशिक गुलामी से आज़ादी चाहती है और वह इसे लेकर रहेगी. लेकिन आजाद भारत ने इस महान स्वतन्त्रता सेनानी को भूला दिया.

आज़ाद भारत में बटुकेश्वर दत्त को गरीबी से लडाई लड़नी पड़ी. वो कभी सिगरेट कम्पनी का एजेंट तो कभी टूरिस्ट गाइड बने लेकिन एक सफल क्रांतिकारी काम धंधे में सफल नहीं हुआ. ट्रांसपोर्ट का काम शुरू करने के लिए वह अपने जिले के डिप्टी कमिश्नर के पास लाइसेंस मांगने गए तो डीसी साहब ने उनसे पूछा कि साबित करो कि तुम स्वतंत्रता सेनानी हो.

आज़ाद भारत में जिन्दा रहते हुए दत्त अनदेखी और गरीबी में जीते रहें. 1964 में वह गम्भीर रूप से बीमार हो गए.पटना के सरकारी अस्पताल में उन्हें कोई नहीं पूछ रहा था. इस पर उनके मित्र चमनलाल आजाद ने एक लेख में लिखा, ‘क्या दत्त जैसे क्रांतिकारी को भारत में जन्म लेना चाहिए? परमात्मा ने इतने महान शूरवीर को हमारे देश में जन्म देकर भारी भूल की है. खेद की बात है कि जिस व्यक्ति ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए प्राणों की बाजी लगा दी और जो फांसी से बाल-बाल बच गया, वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एड़ियां रगड़ रहा है और उसे कोई पूछने वाला नहीं है.’

इस लेख के बाद सत्ता के गलियारों में थोड़ी हलचल हुई. पंजाब सरकार ने बिहार सरकार को एक हजार रुपए का चेक भेजकर वहां के मुख्यमंत्री केबी सहाय को लिखा कि यदि पटना में बटुकेश्वर दत्त का इलाज नहीं हो सकता तो पंजाब सरकार दिल्ली या चंडीगढ़ में उनके इलाज का खर्च उठाने को तैयार है.

अब बिहार सरकार भी हरकत में आयी. मगर तब तक उनकी हालत बिगड़ चुकी थी. 22 नवंबर 1964 को उन्हें दिल्ली लाया गया.यहां पहुंचने पर उन्होंने पत्रकारों से कहा था कि उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था जिस दिल्ली में उन्होंने बम फोड़ा था वहीं वे एक अपाहिज की तरह स्ट्रेचर पर लाए जाएंगे. बटुकेश्वर दत्त को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती किया गया. बाद में पता चला कि उनको कैंसर है और उनकी जिंदगी के कुछ ही दिन बाकी हैं.

बटुकेश्वर दत्त ने अपनी अंतिम इच्छा यह बताई कि उनका दाह संस्कार उनके साथी भगत सिंह की समाधि के पास किया जाए. इसके बाद तो उनकी हालत लगातार ही खराब होती चली गई. 17 जुलाई को वे कोमा में चले गये और 20 जुलाई 1965 की रात एक बजकर 50 मिनट पर उनका देहांत हो गया. बटुकेश्वर दत्त की अंतिम इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार भारत-पाक सीमा के करीब हुसैनीवाला में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की समाधि के पास किया गया.

एक पुरानी कहावत है. जीते को मांड नहीं और मरे को खांड. लेकिन बटुकेश्वर दत्त के साथ तो इससे भी बुरा हुआ. आजाद भारत में  न जीते जी उनकी कोई पूछ रही और न ही उनकी स्मृति का कोई मोल दिखता है.

यह है एक शूरवीर की कहानी जिसने अंग्रेज सरकार को उसके किले में चुनौती दी थी और आज़ाद भारत की सरकारों ने उसे दर दर भटकने पर मजबूर कर दिया.

 

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