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ठग्स ऑफ आनंद विहार बस अड्डा पार्ट 3

नवंबर 6, 2018 ओये बांगड़ू

ठग्स ऑफ आनंद विहार बस अड्डा सीरीज उन ठगों की दास्तां है जिन से कभी न कभी सभी की मुक्का लात हुई ही होती है. तो आज दिवाली पर हम बात कर रहे है उन ठगों की जो पेट के रास्ते आपको लूट लेते हैं और अगले कई दिनों तक आपके मुंह का जायका और पेट का हाजमा बिगाड़ देते है.

वैसे आनन्द विहार बस अड्डा एक ऐसी जगह है जहां कभी भी खाना बासी नही हो सकता, कारण ये कि यहां भीड़ इतनी रहती है कि ईमानदारी से काम किया जाए तो खाना बना और खत्म। मगर क्या करें जब नियत में ही खोट हो(यहां हम उन ईमानदार लोगों को दूर रख रहे हैं जो ईमानदारी से काम करते हैं, वैसे वह आटे में नमक बराबर हैं)

आनन्द विहार में दूर दराज को आने जाने वाले लोगों का 24 घंटे आना जाना लगा रहता है, इसलिए चाय नाश्ता जैसी चीजों का पड़े पड़े खराब हो जाना लगभग बहुत मुश्किल है। क्योंकि बस अड्डे में खाना शौक हो न हो मजबूरी हमेशा रहती है। और मजबूरी में आदमी खा ही लेता है, चाहे बढ़िया बढ़िया ताजा बना कुछ खिला दो, चाहे बाहर की दुकानों से कौड़ियों के भाव खरीदा हुआ बासी खिला दो।

कई महाठग लोग ये बात जानते हैं कि बस अड्डे में सब बिकता है तो वह बस अड्डे से बाहर की दुनिया से पराठे, छोले चावल वगेरह वगेरह ले आते हैं। बाहर की दुनिया का रिजेक्टेड माल कौड़ी के भाव मिल जाता है क्योंकि उन्होंने भी फेंकना ही है। तो ये ज्यादा लालच में वह खरीद लेते हैं और नुकसान करते हैं अपनी गुडविल का, अगर ये वहीं पर ताजा बनाएं तो इनके पास लोग जाएंगे भी इनकी तारीफ भी करेंगे और हो सकता है कहीं सफर न करने वाले लोग भी इनके पास जाकर खाना खाने लगें। मगर इनकी हरकतों के कारण इनके पास जाने वाले सिर्फ और सिर्फ मजबूर पैसेंजर ही होते हैं।

ऐसे ही रजत जी ने बस अड्डे में चुपके से सिगरेट पीने का प्लान बनाया (चूंकि बस अड्डे में पुलिस वाले सादी वर्दी में घूमते है और पब्लिक में धूम्रपान करने वाला कानून लगाकर 5000 के चालान की धमकी देकर 500 से लेकर 100 रूपये तक मे कॉम्प्रमाइज कर लेते हैं) । अब सिगरेट मिले कहाँ। तो पता चाय बेचने वाला सिगरेट भी बेचता है, 10 की सिगरेट 15 में। लेना है लो नही तो आगे बड़ो। जाहिर है मजबूर पैसेंजर जिसे तलब लगी हो सिगरेट की वह लेगा ही(हालांकि अच्छी बात नही है डाक्टर कहते हैं कैंसर होता है)।

तो उन्हें सिगरेट मिलती है 15 में। अब खुद सोचिये जनाब, 10 की बेचने पर आम दुकानदार कमा ही रहा शेष मार्केट में, तो ये 24 घण्टे चालू दुकानदार थोड़ा ज्यादा के लालच में अपनी दुकानदारी मार रहे हैं। हालांकि इससे बड़ा नुकसान पुलिस को हो रहा है। बेचारों की वसूली में घाटा, एक तो लोग रिस्क लेकर पियें ऊपर से महंगी पियें।

खैर अब सिगरेट (जो नहीं पीनी चाइए-ज्ञान की बात) से वापिस खाने पर आते हैं.आनंद विहार बस अड्डे के खाने को खाने के बाद कई बार आदमी को रास्ते मे पेंट में ही शुरू हो जाता है और कई बार घर पहुँचते पहुंचते पेट पकड़ कर बैठ जाता है।

बड़ी मुश्किल से तो प्राइवेट कंपनी में जॉब कर रहे बन्दे को घर जाने के लिए छूट्टी मिलती है ऊपर से ये नमूने अपना महान खाना खिलाकर उसे छुट्टियां डाक्टर के यहां बिताने पर मजबूर कर देते हैं।

एक दुकानदार से बात करने पर पता चला कि यहां के लाइसेंस दिए जाते हैं, अब भारत है जाहिर है फ्री तो नही दिए जाते होंगे। तो जो रकम घूस में गई है शायद उसकी भरपाई के लिए बिचारे दुकानदार अपने नौकरों से इतनी मेहनत करवाते हैं। कि अगली बारी के लाइसेंस की घूस का इंतजाम भी यहीं से हो जाये साथ मे सभी काम करने वालों की तनखा, मालिक का नई गाड़ी का सपना वगेरह वगेरह सब पूरा करने की जिम्मेदारी इस एक लाइसेंसी दुकान पर।

मगर हम मालिकों से सिमपेथी नही रखते, क्योंकि वह अपने काम से ईमानदारी नही रखते। अगर वह ईमानदारी रखें तो भी कमा सकते हैं। बाकी सरकारी घूसखोर तो खैर हमारे क्या किसी के बस में नही। इसलिए इन्हें कुछ नही कहते

तो ये जो ठग्स होते हैं ये थोड़े अलग टाइप के होते हैं, ये पेट के रास्ते आपको लूट लेते हैं,

चाय से लेकर बिस्कुट तक यहां पर ठगी बिल्कुल आम तरीके से होती है । वैसे कई जगह एक नियम है कि एमआरपी से ज्यादा रेट पर कुछ न खरीदें और दुकानदार ऐसा करे तो उसकी शिकायत कर दें।

मगर जय हो आनन्द विहार यहां आपको शिकायती कक्ष मिलना थोड़ा असम्भव है, फोन नम्बर नजर नही आएंगे, कहीं कोनों पर हो सकते हैं मगर सामान्य रूप से नही मिलेंगे। और रेट लिस्ट के अकार्डिंग ही सामान बेचते हैं, ज्यादा पैसे नही लेते। पराठा चावल वगेरह सबका रेट फिक्स है। बस खाना कुछ ऐसा होता है जिसे खाने के बाद आदमी शौचालय में बैठ ‘क्या खा लिया यार,क्यूँ खा लिया’ जैसा कुछ सोचने को मजबूर हो जाता है.

 

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