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ठग्स ऑफ़ आनंद विहार बस अड्डा पार्ट -2

नवंबर 4, 2018 ओये बांगड़ू

आनन्द विहार बड़ी दिलचस्प जगह है यहां मजबूर और मजबूत दोनो तरह के लोग काम करते हैं। पहली कड़ी में हमने यहां घूमने वाले उन ठगों की चर्चा की थी जो रामभरोसे ढाबे में खड़ी बस के नाम पर पैसेंजर का बेवकूफ काट देते हैं। आज दूसरी कड़ी में हम बात करेंगे उन मासूम घड़ी,पर्स,पावर बैंक वगेरह वगेरह बेचने वाले बेचवा लोगों की जो चलती बसों में लोगों को सामान बेचा करते हैं।

इन्हें मजबूर कहने के पीछे कारण यह है कि इनमें से बहुत सारे लोग दूर दूर से काम की तलाश में दिल्ली पहुंचते हैं लेकिन दिल्ली में काम की तलाश करते करते ऐसे मज़बूत लोगों के पास पहुंच जाते हैं जो मजबूरों का फ़ायदा उठाना अच्छी तरह जानते हैं।

खैर आज हम मजबूर लोगों की मजबूरी की गाथा नही गाएंगे, हम बस इतना बताएंगे कि कैसे ये मजबूर(सब नही, बल्कि कोई नही) बसों में सफर करने वाले लोगों को बड़ी ही बेदर्दी से लूटते है। बेदर्दी इसलिए कहा क्योंकि दिल्ली के काम के बोझ में दबे लोग जब अपने अपने घरों के लिए कुछ पैसे बचाकर, घर के सदस्यों के लिए इनसे सामान लेते हैं तो ये ऐसा सामान चिपका देते हैं जो बस बस चलने तक चलता है.

जैसे बेहडी को जा रहे राजेन्द्र जी एटीएम में गार्ड की नौकरी करते है, 12 घण्टे की नौकरी के कारण उन्हें दिल्ली के बाजारों में शॉपिंग करने का समय नही मिल पाया, अभी 5 दिन की छुट्टी मिली दिवाली की तो आनन फानन में आनन्द विहार आ गए, प्लान ये था कि बच्चों के लिए चीजें बेहडी बाजार से ही ले लेंगे। अब हुआ ये कि आनन्द विहार बस अड्डे में बड़ी मुश्किल से बस मिली, पीछे की सीट, इतने में एक मजबूर इंसान पहुँच गए घड़ियां लेकर, तो राजेन्द्र जी ने घड़ियां लेने के लिए हाथ आगे बढा दिया। मतलब सेल्समैन बोला भाईसाहब बड़ों की घड़ी 300 बच्चों की 100, मोलभाव हुआ और तय हुआ कि 50 रूपये की बच्चों की घड़ी, सेल्समैन चल दिया और उधर बस चलते चलते घड़ी भी बंद। राजेन्द्र जी तुरन्त बस से निकले और सेल्समैन को ढूंढने लगे, हमें इत्तेफाकन मिल गए और व्रतांत सुना दिया, हालांकि उन्हें वो सेल्समेन नही मिला मगर बस जरूर छूट गयी। गुस्सा आंखों में छलक रहा था मगर फिर भी कुछ कर नही सकते थे।निराश होकर चले गए।

ऐसे ही अल्मोड़ा जा रहे पूरन जी के साथ हुआ, एमआई का पावर बैंक लिया बस में, बड़ी मुश्किल से मिली बस में अचानक से एक पावर बैंक वाला प्रकट हुआ। मोबाइल की बैटरी खत्म हो रही थी, और उन्हें चार्जर की जरूरत भी महसूस हुई, सोचा चलो एक दो बार चार्ज कर लेगा। बेचने वाले ने भी बकायदा चेक कराकर माल बेचा। मगर वस चलते चलते पावर बैंक ने काम करना बंद कर दिया।

न न पावर बैंक डिस्चार्ज नही हुआ बल्कि लीड ने चार्ज करते हुए सिर्फ दिखाया बैटरी 10 % से 5 और उसके बाद खत्म। मगर पावर बैंक फिर भी चार्ज करता हुआ दिखा रहा था।

ये लोग असल मे बहुत कमाल होते है, टारगेट मिला होता है कि 10 पीस बेचने हैं 300 रूपये तुम्हारे। माल बेचना इनकी जिम्मेदारी और माल लाने वाला बन्दा कोई और। इनको खुद नही पता होता कि इनका माल आता कहाँ से है और है कैसा।

मगर बेचते ऐसे हैं जैसे खुद माल बनाया हो।

इनकी गलती बस इतनी है कि ये जानते हुए गलत माल बेचते हैं और ठगे जाते हैं वह भोले भाले लोग जो समय न मिल पाने के कारण अपने घर के लिए अपने बच्चों के लिए कुछ नही ले पाते

लास्ट में बेवकूफ बनते हैं इनके हाथों ।

ये हर वो सामान उपलब्ध कराते हैं जो आदमी की जरूरत का है, मगर हर सामान डिफेक्टिव है । डिफेक्टिव भी ऐसा कि खतरनाक. खैर ये ठग हर जगह हैं, लेकिन हम सिर्फ आनन्द विहार वालों से मिल पाए हैं। बचकर रहिये। दिवाली आ रही है।

हो सकता है कुछ लोग अच्छा माल बेचते हो। मगर वो कहते हैं न गेंहू के साथ घुन को पीसना होता है।

वैसे ठग्स ऑफ़ आनंद विहार की पिछली स्टोरी जैसा काफी लोगों ने एक्सपीरियंस किया और oyebangdu के फेसबुक पेज पर अपने एक्सपीरियंस शेयर भी किए .पिछली स्टोरी पढने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें

ठग्स ऑफ आन्नद विहार बस अड्डा

 

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