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दिल्ली पहुंचे हज़ारों अन्नदाताओं के किसान मुक्ति मार्च का कारण

नवंबर 29, 2018 ओये बांगड़ू

दिल्ली में किसानों का जमावड़ा लग चुका है और अपने 2 दिनी प्रदर्शन में किसान जगह जगह से पहुंचने लगे हैं। वैसे लगता है इस बार सरकार ने 2 अक्टूबर के बाद से सबक लिया है और प्रदर्शन को शांतिपूर्वक सम्पन्न कराने की जिम्मेदारी ली है। हालांकि 30 नवम्बर को ज्यादा हंगामा होगा इसकी उम्मीद है। क्योंकि उस दिन सभी जगह से जुटे किसान संसद तक पैदल मार्च करने का प्लान बना चुके हैं।

वैसे क्या होगा क्या नही ये बस कयास लगाने वाली बात है।मगर किसानों की सिर्फ दो मांगें हैं जिनके पूरा न होने की स्थिती में वह आंदोलन जारी रखेंगे।

उनकी पहली मांग है किसानों पर सभी कर्जे माफ किये जायें। वैसे पहले इतने बड़े लेवल पर किसान इस तरह की माँग नही करते थे , सिर्फ वही लोग कर्जे माफी के लिए निवेदन करते थे,जो पूरी तरह डूब गये हो परेशान हो। बैंक वाले उनका घर जमीन कब्जा कर रहे हो। लेकिन आज इतनी बड़ी मात्रा में किसान कर्ज माफी के लिए आ रहे हैं इसके पीछे क्या कारण है इस पर सोचा जाना बहुत ज्यादा जरूरी है।

हरियाणा से आये एक किसान महिंदर सिंह से बातचीत काफी हद तक इस बात को समझाती है, वह कहते हैं कि किसान के पास जब फसल का अच्छा पैसा होता है वह बैंक का लोन चुका देते हैं मगर जब फसल ही बर्बाद हो जाये तो सरकार हमारी मदद को आगे क्यों नही आती, बड़े बड़े बिजनेसमैन को लोन के ऊपर लोन उसके ऊपर लोन बेझिझक दे दिया जाता है वह भी हजारों करोड़ का और हमारे लाखों के लोन पर बैंक हमारे घर खेत पर कब्जा करने पहुँच जाता है। अगर बिजनेसमैन देश के युवा को रोजगार दे रहा है तो हम भी तो देश के हर वर्ग को अन्न दे रहे हैं, वह महत्वपूर्ण है तो हम भी महत्वूर्ण हैं। और हमने ये कभी नही कहा कि हम देश छोड़ देंगे ,हैं तो इसी मिट्टी में सुसाइड करने वाले लोग हैं ।

इसी तरह दो तीन किसानों से बातचीत करके ये बात समझ आई कि पिछले दिनों लोन डिफाल्टर की बढती तादात और खबरों में लगातार उनके बने रहने से पूरी तरह से किसानों को एक बात तो समझ आ गयी कि बैंक का पैसा डुबाने वाले वो अकेले नही हैं और उनके साथ जैसा व्यवहार बैंक करता है वो ज्यादती है क्योंकि बाकी लोन डिफाल्टर तो आसानी से देश छोड़कर जा चुके हैं वह भी हजारों करोड़ लेकर।

उनकी दूसरी मांग है फसलों की लागत का डेढ़ गुना दिया जाए। सरकारी रेट सच मे किसानों के मुफीद नही हैं। हम जो सामान खरीद रहे हैं उसके लिए हम भरपूर कीमत चुका रहे हैं लेकिन हमारी दी हुई कीमत किसान को न मिलकर बीच के दलालों को पहुँच जाती है जो बीच मे पैसे खा जाते हैं.इसका एक अहम उदाहरण गन्ना है.

रिलायंस और अन्य माल में गन्ने की कीमत पैकिंग के साथ ही कई गुना बढ़ जाती है. ऐसा ही एक प्रोडक्ट है रिलायंस पर मिलने वाले गन्ने के चुनिन्दा टुकड़े 185 ग्राम उस पैकेट की कीमत 39 रुपए होती है. वही किसानो को सरकार की ओर से कीमत बढ़ाने के बावजूद गन्ने की फसल के 275 रुपये प्रति क्विंटल तक ही दाम मिल पा रहे है. अब आप खुद ही हिसाब लगाइये किसान जिस गन्ने की फासल से  प्रति क्विंटल  275 तक ही  कमा पाता है वही मॉल कितना कमा रहे हैं।

 

 

 

 

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