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ये ट्विट पत्रकारिता है

जनवरी 20, 2017 ओये बांगड़ू

चंकी महाराज कभी कभी सीरियस भी हो जाते हैं. आज हैं पढो

कल रवीश कुमार का प्राईम टाईम देखा , उसमे बता रहे थे कि किस तरह डोनाल्ड ट्रम्प ने पत्रकारों के खिलाफ अनकहा युद्ध घोषित कर दिया है. उन्होंने एक चिट्ठी भी पढी जिसमे आगे से पत्रकारों की जिम्मेदारी के ऊपर कुछ लिखा था पूरा देखने के लिए एनडीटीवी के चक्कर लगा लेना. हम जो बात बता रहे हैं वह इससे जुडी जरूर है पर ये नहीं है. आजकल हो क्या रहा है ? ट्विट पत्रकारिता , फेसबुक पत्रकारिता .

ट्विट से खबर बन रही है , ट्रोल से खबर के महत्ता तय होती है , फेसबुक लाईक कमेन्ट शेयर से ये तय किया जाता है कि समाज के लिए कितनी महत्वपूर्ण है कितनी नहीं . फेसबुक में मिलने वाले शेयर कमेन्ट और लाईक की गिनती सर्वे तय करती है. डोनाल्ड ट्रम्प तो बस बहाना है हकीकत में देखो तो हम इस देश में क्या कर रहे हैं.

एक पोस्ट डाल दी जाती है ‘क्या आप फलाने नेता को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं? हां के लिए लाईक करें ना के लिए कमेन्ट करें और फिफ्टी फिफ्टी के लिए शेयर करें ”

उसके बाद उसके आंकड़ों को इकट्ठा करके एक खबर लिखी जाती है कि फलाने साहब को देश में इतने प्रतीशत लोग मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं. अगले दिन एक अखबार से दुसरे दुसरे से तीसरे फिर वेबपोर्टल और उसके बाद कभी कभी न्यूज चैनल में भी वही सर्वे पहुँच जाता है. हैं ना आसान . मेहनत कहाँ गयी ? अच्छा उसे आगे बडाने के लिए चैनल मालिक या अखबार मालिक इस पर जोर दे रहे हैं. आज संस्थान में पत्रकारों की भर्ती के दौरान एक मानक ये भी होता है कि ट्विटर फोलोवर कितने हैं और फेसबुक में कितने हैं. आप अपनी एक अच्छी पहचान बना चुके हैं तभी आपको चैनल या अखबार भर्ती करता है. जहाँ आपसे बैठे बैठाए एसे सर्वे कराये जाते हैं.

जमीन में उतरने की जरुरुत ही नहीं इसलिए सारा खर्चा बच गया. जिस सर्वे को पूरा करने में हजारों का खर्चा और 10 12 लोग लगते उसे मात्र एक आदमी की फेसबुक पोस्ट कर देते है . डोनाल्ड ट्रम्प ने कहाँ गलत कहा कि ‘ट्विटर से खबर बननी है तो प्रेस क्रांफ्रेंस की क्या जरुरुत ‘ सही तो है , हम केजरीवाल ,मोदी ,राहुल इन सबकी खबरों के लिए प्रेस कान्फ्रेसं में कहाँ निर्भर हैं. हम तो ट्विट से खबर बनाते हैं. मोदी ने ट्विट किया खबर राहुल ने नहीं किया खबर केजरीवाल ने किया खबर. अब तो रिफरेन्स ट्विट का देते हैं. कि फलाने सेलेब्रेटी ने ये कहा. पहले जो काम करने में पत्रकारों के पसीने छूट जाते थे अब वो ट्विट पर हो जाता है.

मुद्दा ये नहीं कि विश्वनीयता खत्म हो रही है, मुद्दा ये है कि हम खुद खत्म कर रहे हैं, आज हर तीसरा फेस्बुकिया पत्रकार है, मोहल्ले की फोटो लगाकर खबर बना देता है, ना उसे 5w 1h पता है ना उसका कोइ विश्वसनीय सोर्स है, उसके पास बस एक साधन है अपनी खबर पब्लिश करने के लिए फेसबुक, ट्विटर . बस बन गया पत्रकार , कई बार ये फेस्बुकिये पत्रकार वास्तविक पत्रकारों से अच्छा काम भी कर जाते हैं. हमारी कामचोरी हमारी विश्वनीयता खत्म कर रही है, हम प्रेस कांफ्रेंस को ट्विटर से ज्यादा अहमियत देंगे तो जनता के बीच हमारी विश्वनीयता बनी रहेगी , वरना ट्विटर तो जनता भी पढ़ती ही है. ट्विट से खबर बनाना कम करना होगा .

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