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जीएसटी मुक्त सैनेटरी नैपकीन

जुलाई 25, 2018 Girish Lohni

जीएसटी काउंसिल ने महिलाओं द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली सैनेटरी नैपकीन को जीएसटी से बाहर रखने का फैसला किया है. राहुल गांधी की अंखियों की गोली से और कोई धराशायी हुआ हो या ना हो लेकिन देश की महिलाओं के हित में कही जाने वाली यह खबर जरुर धराशायी हो गयी.

दरसल जब जीएसटी लागू हुआ और सैनेटरी नैपकीन को 12% जीएसटी की श्रेणी में रखा गया तो एक बड़े तबके ने इसका विरोध यह कह कर चालू कर दिया की सरकार महिलाओं के खून पर टैक्स लगा रही है. हालांकि वास्तविकता यह थी की जीएसटी इससे पहले लगने वाले टैक्स से कम था.

साभार गूगल

खैर अपने फायदे के लिये ही सही पर देश भर में सैनेटरी नैपकीन पर जीएसटी लगाने का विरोध किया गया. देर से ही सही लेकिन आज जब यह फैसला उनके पक्ष में आया तो कोई उत्सव नहीं है.इस पूरे घटनाक्रम को भारतीय महिलाओं की यह बड़ी जीत के रुप में देखा जाना चाहिए पर खेद है कि राहुल और प्रधानमंत्री की आंख-मिचौली इस बड़े फैसले पर भारी पड़ गयी.

खैर एक सवाल जो अब भी बांकि है कि क्या जीएसटी हटने से सच में महिलाओ को फायदा होगा?  दुसरा यह कि  क्या सैनेटरी नैपकीन महिलाओं पर एक आर्थिक बोझ के रुप में थोपा जा रहा है?

पहले सवाल का जवाब है में ही प्रश्न है. क्या सैनेटरी पैड से जीएसटी हटना वाकई भारत में सैनेटरी पैड का उपयोग करने वाली महिलाओ की संख्या में वृध्दि करेगा? एक 10 पीस अल्ट्रा नैपकीन की कीमत बाजार में 70 से 90 रुपये के बीच में है (दाग छुपाने के घंटों के आधार पर). टैक्स कम होने पर इसकी कीमत में भी 8 से 10 रुपये का फर्क आयेगा. सवाल है कितनी भारतीय महिलाये महिने का 70 से 80 रुपया उस चीज पर खर्च करने में सक्षम है जो परिवार के अन्य सदस्यो के लिये मायने ही नहीं रखती?

भारतीय महिलाओ का एक बड़ा वर्ग वर्तमान में 20 से 30 रुपये वाले साधारण सैनेटरी नैपकीन प्रयोग में लाता है जिसकी कीमत में 1 से 2 रुपये की कमी होगी. कैसे यह कमी सैनेटरी नैपकीन प्रयोग में लाने वाली महिलाओं की संख्या में कोई वृध्दि ला सकती है? 

अब आते हैं दुसरे सवाल पर निश्चित रुप से बाजार एक रणनीति के तहत महिलाओं पर एक आर्थिक बोझ के रुप सैनेटरी नैपकीन को थोप रहा है. जैसा की आप आये दिन इन सैनेटरी नैपकीन के विज्ञापन में देख सकते हैं इसका प्रयोग पीरियड के दौरान केवल गीलापन सोखने में ही नहीं बल्कि लड़कियों को इससे लगने वाले दाग से आने वाली शर्म से भी बचाता है. महिला सशक्तिकरण के नाम पर बकैती करनी वाली कंपनियों को इस बात का जवाब भी देना चाहिये कि किस शर्म से वे महिला को बचाना चाहती हैं?

साभार गूगल

2015 में अमेरिकी मूल की किरण गांधी ने फ्री ब्लिडिंग नाम से एक मुहिम चलाई थी. उन्होंने पीरियडस के दौरान किसी भी मेस्ट्र्यल प्रोडक्टस के इस्तेमाल न किये जाने की वकालत की. (जो कि कई वैज्ञानिक शोध अनुसार महिलाओं के स्वास्थ के लिये बेहतर है ) उन्होने अपने पीरियड के दिनों में एक मैराथन में भाग लिया. मैराथन के दौरान उनके द्वारा किसी मेन्स्ट्रूयल प्रोडक्ट का इस्तेमाल नहीं किया गया . मैराथन के बाद उनके कपड़ों पर दाग लगे थे. जिसके बावजूद वो उसी आत्मविश्वास के साथ फोटो खिंचाती दिखी जैसे की अन्य कोई महिला.

नवीन शोधों के अनुसार जिन सैनेटरी नैपकीन को आज बाजार में धडल्ले से कभी महिला सशक्तिकरण तो कभी मां-बेटी-बहन के इमोशनल ड्रामे के साथ बेचा जा रहा है दरअसल इसके लम्बे प्रयोग से कैंसर जैसी भयानक बीमारी हो सकती है. सैनेटरी नैपकीन की कम्पनियाँ बिना जानकारी और चेतावनी के भारत में लगातार धंधा बढ़ाते जा रही हैं. दिल्ली मुम्बई जैसे महानगरों में उपयोग किये गये सैनेटरी नैपकीन ड्रेनेज ब्लाक करने में अपनी महत्तवपूर्ण भूमिका निभा रहे है.

क्या कंपनियों की जिम्मेदारी नहीं बनती कि लड़कियों को शर्म से बचाने से बेहतर उन्हें कैंसर जैसे रोगों से बचाने के उपाय बताये जाये? कीचड़ तक के दाग को अच्छा सिध्द कर देने वाली कंपनी  क्या पीरियड के दाग को अच्छा भले न बता सके पर सामान्य तो बता ही सकती है. क्या एक समस्या का निदान नयी समस्या को खड़ा करना होता है?

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