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सुझाव- पलायन रोकने के

जून 12, 2017 Girish Lohni

इन दिनों उत्तराखंड सरकार का एक विज्ञापन खूब वायरल हो रहा है. बजट में जब पलयान समस्या का प वर्ण भी ना डालने पर सरकार की चौतरफा किरकिरी हुई तो विज्ञापन द्वारा सरकार ने राज्य के लोगों से पलायन रोकने के लिये सुझाव माँगे है. पहले सोचा दिये गये निजी ई-मेल पर सीधा सुझाव भेजूँ लेकिन जब ई-मेल आईडी देखी तो समझ आया सरकार कितनी गम्भीरता से प्रयास करना चाहती है. पलायन रोकने के प्रयास में आप एक सरकारी ई-मेल आईडी का खर्चा तो उठा ना सके पलायन रोकने के लिये क्या खाक धन देंगे? इसलिये मंत्री जी के नाम सुझावों वाला एक खुला पत्र लिखने की सोची है.

मान्यनीय मंत्री जी

सत्ता,शक्ति और प्रचंड बहुमत होने के बावजूद जनता से पलायन रोकने हेतु सुझाव मांगने का तरीका बहुत बढिया है. आपको पहला सुझाव तो यही की सबसे पहले ये विज्ञापन वाली मूर्खतापूर्ण हरकत बंद करें. यह अत्यंत हास्यासपद है़ कि 17 साल के बाद आप जनता से पलायन रोकने का सुझाव मांग रहें है. 17 सालों में कम से कम विचार की जमा-पूंजी तो आपके अधिकारियों के पास होनी ही चाहिये. यदि नहीं है तो सबसे पहले उन्हें निकाल फेंकिए. 70 विधायक की विधानसभा में प्रत्येक विधानसभा सदस्य से ही सुझाव मांगा जाता काफी था. ना विज्ञापन का खर्च ना जग-हँसाई.

महोदय यदि आप वास्तव में हमसे सुझाव चाहते हैं तो हैलीकाप्टर से नहीं बसों से हमारे जिलों की यात्रा कर देखें. आपको हमारे सुझावों की आवश्यकता तक नहीं पड़ेगी. आप डोली-पालकी की बजाय एक बार पैदल हमारे गॉव की यात्रा कर देखें आप निश्चित ही न केवल पलायन समाधान समिति के पास सुझाव ले जायेंगे बल्कि सरकार के अन्य मंत्रालयों के लिये भी झोला भरकर सुझाव ले जायेंगे. आप हैलीकाप्टर से उतरें तो सही.

नोटिफिकेशन जारी कीजिये सभी विधानसभा सदस्यों को प्रतिमाह दो बार उत्तराखंड परिवहन से दुर्गम क्षेत्रों की यात्रा करनी होगी. प्रत्येक विधानसभा सदस्य को अपने विधान-सभा क्षेत्र में एक पर्यटन स्थल के विकास का जिम्मा दिजिये. हरेला व मकरसंक्रांति के अवसर पर प्रत्येक विधानसभा सदस्य को अपने विधान-सभा क्षेत्र में उत्सव के रुप में मनाने का आह्वान कीजिये. अन्य राज्यों के विधानसभा सदस्यों को उत्तराखंड परिवहन में  यात्रा के लिये आमंत्रित कीजिये.

माल्टा, चूक, काफल, हिसालू, आडू, किरमोडे, पूलम, नासपाती, खूमानी, मसूर, राजमा, गौहत, मडूवा आदि स्थानीय फल और अनाज का न केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य तय कीजिये बल्कि खराब मौसम और जानवरों के आक्रमण के कारण इनके नष्ट होने पर पर्याप्त मुआवजा भी दिजिये. पहाड़ी किसानों से जाकर बातचीत किजिये. चेकबंदी के फायदे गिनाइये. बातचीत में केवल अधिकारियों को शामिल ना करें जनप्रतिनिधियों को भी शामिल करें.

किसी मैदानी क्षेत्र में बड़े फूड–प्रोसेसिंग पार्क के बजाय जिला स्तर पर मुख्यालयों में छोटी फूड-प्रोसेसिंग यूनिट का निर्माण करे. फूड-प्रोसेसिंग यूनिट का निर्माण जिले की स्थानीय विशेषताओं के आधार पर किया जाये.

पशु-पालन को सहकारी स्तर पर शुरु किया जाय. लोगों को सम्मान के साथ पशुपालन से जोड़ा जाय. उच्च तकनीक व स्थानीय तकनीक का मेल कर एक राष्ट्रीय स्तर का उदाहरण प्रस्तुत किया जाय.

सिडकुल में काम करने वाली कंपनियों को उत्तराखंड के युवाओं को इन्टर्न के बजाय कंपनी के कर्मचारी के रुप में नियुक्ति दी जाय. श्रम कानून का पालन कराया जाय. एक समिति गठित कर ऐसी सभी कंपनियों के खिलाफ करवाही की जाय जिन्होंने राज्य से कर आदि में छूट प्राप्त करने के बावजूद नियमों का पालन नहीं किया.

देव-संस्कृति के नाम पर संस्कृत का दंभ अब छोड़िये. जितना पैसा सरकार संस्कृत के विकास के नाम पर खर्च कर रही है यदि उसका आधा भी सरकार गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी आदि स्थानीय लिपियों को भाषा के रुप विकसित करने के लिये करे तो 2021 की जनगणना में अधिकांश को भाषा का दर्जा मिल जायेगा. भाषा का दर्जा न भी मिले आपके पास अ‍पना इतना क्षेत्रीय इतिहास जुट जायेगा जो विश्व के किसी भी पर्यटक को सीधा आकर्षित करेगा. स्थानीय इतिहास व साहित्य का अन्य भाषाओं में अनुवाद किजिये उसे प्रचारित-प्रसारित कीजिये.

मान्यवर सरकारी गेस्ट हाउस जो निजी ठेकेदारों और अधिकारियों के भाई-भतीजों के कब्जे में हैं उन्हें मुक्त कीजिये. 10 रुपये की चाय 30 में और 25 का पराठा 50 में बेचते रहे तो बन गये आप भारत की पर्यटन राजधानी. लोगों से निवेश की भीख माँगने से पूर्व अपनी संपत्ति का संरक्षण तो कीजिये. सरकारी गेस्ट हाउस में भोजन के विकल्प के रुप तक में कुछ मौजूद नहीं रहता, स्थानीय भोजन का विकल्प तो दूर की कौडी है.

एकबार आप प्रतिवर्ष दिल्ली-गाजियाबाद  में होने वाले उत्तराखंड के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भीड़ का उत्साह देखिये. आप जान जायेंगे की हम उत्तराखंड वासियों को अपनी संस्कृति से कितना प्यार है कितना लगाव है. प्रति वर्ष प्रवासी उत्तराखंड दिवस का आयोजन करें. आयोजन एकदिवसीय न हो और ना ही किसी मैदानी हिस्से में हो. देश-विदेश में उत्तराखंड का नाम करने वाले लोगों के सामने राज्य के उन लोगों का सम्मान करें जिन्होंने राज्य में रहते हुये राज्य का नाम किया है. भविष्य में राज्य की वित्तीय स्थिति में एक अलग प्रवासी विभाग तक बनाया जा सकता है.

स्वास्थ्य के लिये आप ज्यादा नहीं कम से कम प्राथमिक जॉच करने में सक्षम एक टीम प्रत्येक ब्लाक में तैयार रखें. सभी जिला-मुख्यालयों पर आधुनिक सुविधाओं से युक्त एक अस्पताल हो फिर चाहे वो पहाड़ी जिले हों या मैदानी. पहले से बने अस्पतालों के भूतिया-खंडर बनने से पहले डाक्टरों की नियुक्ति तात्कालिक कदम हो सकता है.

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना को राज्य के अनुरुप लागू कराएं . साहसिक खेलों और शीतकालीन खेलों के प्रशिक्षण को योजना से जोड़े. दोनों ही क्षेत्रो में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं. राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों को हवाई योजना से जुड़ जाने पर पलायन पर पूर्ण विराम लगने की पूरी संभावना है. छोटे-छोटे हवाई अड्डों को केंद्र की उड़ान योजना के तहत महानगरों से जोड़ा जा सकता है. बैंगलोर-पुणे की आई-टी कंपनियाँ जहां वर्तमान में उत्तराखंड मूल के लोगों का प्रतिशत रिकार्ड अधिकतम है. इन कंपनियों को राज्य से जोड़ा जा सकता है.

प्राइवेट स्कूलों की उँगलियों पर नाचना छोड़िये. सभी विधानसभा सदस्य अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में डाल देश के सामने एक उदाहरण पेश कीजिये. सरकार, जिस दिन आपको अपनी इस शिक्षा-प्रणाली पर यकीन हो जायेगा यकीन मान लिजिये सभी को हो जायेगा. स्थानीय भूगोल,स्थानीय इतिहास,स्थानीय संस्कृति, स्थानीय भाषा को आधार बनाकर एक विषय के रुप में सभी स्कूलों में इसे पढ़ाया जाय. शिक्षा पद्धति में सुधार आपके पलायन को रोकने के लिये बनाये गये ताबूत पर अंतिम कील होगी. जिन बायोमैट्रिक उपस्थिति की मशीनों को आप सचिवालय में घुमा रहे हैं उन्हें पहले स्कूलों में लगा दिजिये.

महोदय ये उत्तराखंड में पलायन को रोकने के लिये एक आम नागरिक द्वारा बीस मिनट में लिखे वो सुझाव हैं जिसके लिये आपको किसी फंड के मौहताज रहने की आवश्यकता नहीं है. खैर अगली बार सुझाव के विज्ञापन पर खर्चा करने से बेहतर एक बार उत्तराखंड का भ्रमण कर लें बस हैलीकॉप्टर मार्ग के बजाय रोड से करें.

ओए बांगड़ू द्वारा पलायन की समस्या संबंधी प्रकाशित लेख-

बिन पहाड़ का पहाड़ी बजट

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