गंभीर अड्डा

एक राजा जिसने शंकराचार्य, मोहमद्द और गुरुनानक से भी हज़ारों साल पहले की ‘एकेश्वर वाद’ की शुरुआत

अक्टूबर 8, 2016 सुचित्रा दलाल

खोजबीन के उस्ताद चन्दन  मनपंथी है. इनका दिमाग हमेशा दुनिया को खंगालने में लगा रहता है. यह कभी गुरु गूगल तो कभी किताबो की दुनिया में जा कर गजब बाते खोज लाते है. कई बार तो गूगल भी इन से हाथ जोड़ कर बोल पड़ता है कि चंदन गुरु बस करो अब तो मेरे पास भी कुछ नही बचा. आज यह ओएबांगड़ू के लिए मिस्र के एक ऐसे राजा की कहानी खोज लाये है जिसने सिर्फ 15 साल की उम्र में ‘एकेश्वरवाद’ की अलख जगाना शुरू कर दिया आप भी पढ़िए उस राजा की कहानी

एक ऐसा राजा जिसने कोई जंग नहीं लड़ी, युद्ध नहीं जीता , और ना ही  क़बीलाई ज़माने से लेकर अभी तक चली आने वाली  साम्राज्यवादी हवस का पुजारी रहा । फिर भी इसका नाम अशोक, हारुअल्-रशीद ,शार्लमान और सुलेमान जैसे बुद्धिमान राजाओं के साथ शुमार किया जाता है । जिसने अपने देश की घरेलू स्थितियों को सुधारने पर ज़ोर दिया ना की विदेश नीति पर । जिसने शंकराचार्य के अद्वैत ब्रह्म, नबियों के एकेश्वरवाद, मुहम्मद के ‘ ला एलाह इल्लल्लाह’ और गुरुनानक के एक ओंकार से सदियों पहले एकेश्वरवाद (monism ) का आंदोलन चलाया । महत्वपूर्ण बात ये है कि उसने ये सब तब किया जब उसकी उम्र सिर्फ़ पन्द्रह साल थी ।
जी, हम बात कर रहे हैं इख़नातन की । आज से 33 सौ साल पहले  यानी ईसा से 1300 सौ साल पहले मिस्र के राजा आमेनहोतेप त्रृतीय का एक बेटा हुआ जिसका नाम आमेनहोतेप चतुर्थ था। ये  आगे चलकर इख़नातन के नाम से प्रसिद्ध हुआ । इसके  माँ का नाम तीई था।
इख़नातन महज़ 13 साल की उम्र में मिस्र  (अब इजिप्ट) का राजा बन गया । हालांकि इतिहासकार आज तक इस बात से  पर्दा नहीं उठा पाये हैं कि अपने पिता से इख़नातन को राजगद्दी कैसे मिली । पर इखनातन का एक बड़ा भाई भी था और नियमानुसार वही राजसत्ता का उत्तराधिकारी था। परन्तु बीमारी की वजह से 12,13 साल की उम्र में उसकी की मृत्यु हो गयी तो छोटा भाई इख़नातन उसका उत्तराधिकारी हो गया ।

इख़नातन राजपरिवार का बेटा था और काफ़ी कम उम्र में ही कुशाग्र बुद्धि के होने के कारण वो राजकाज़ के बारे में विचार किया करता था । देवी-देवताओं की  अनगिनत संख्या और इसकी वजह से पुजारियों की बढ़ती शक्ति के बारे में वो हमेशा सोचा करता । देवी देवताओं की भीड़ और उस भीड़ से फैली हुई गड़बड़ी उसे परेशान और हताश करती । उसका मानना था की पुजारियों की मनमानी और अंधविश्वासों की जगह पूरे देश में कोई एक तार्किक धर्म हो जो ईमानदारी से फैले.

वो एक देवता कौन हो जो सबके लिए मान्य और पूज्य हो । इसपर विचार करते करते  आकाश में चमकते सूर्य के  गोले पर उसकी नज़र गयी । वैसे भी हर काल, हर सम्प्रदाय में सूर्य एक विशेष स्थान रखता है । इख़नातन को महसूस हुआ कि सूर्य के उस गोले के पीछे ज़रूर कोई दैविक शक्ति छिपी है और उसने प्रकृति की सबसे बड़ी सच्चाई सूर्य के गोले के पीछे छिपी शक्ति को माना और उसने अपने इस विश्वास,इस  शक्ति को ” अतन ” नाम दिया ।
लेकिन, इख़नातन ने जब इस धर्म का प्रचार-प्रसार आरंभ किया तो समाज में हड़कम्प मच गया । विभिन्न धार्मिक रीति रिवाज़ों , संस्कारों , विश्वासों और अन्धविश्वासों को मानने और पूजने वाला समाज किसी एक देवता को मानने के लिए कैसे तैयार हो ? किसी ने इख़नातन को पागल कहा तो किसी ने नास्तिक । लेकिन वो पीछे नहीं हटा और  अपने नये धर्म के प्रचार के लिए उसने साम,दाम,दंड हर तरीक़े को अपनाया । पुराने देवताओं की पूजा बन्द करा दी, विभिन्न मंदिरों को तोड़वा दिया और उसे नास्तिक कहने वाले पुजारियों से उनकी सारी सुविधाएं छीन ली । इसके बदले में वो अपने नए देवता अतन के कई मंदिर बनवायें। इख़नातन के ऐसा करने के पीछे कारण ये नहीं था की वो अतन (सूर्य) को सभी देवताओं से बड़ा मानता था बल्कि  वो अतन को ही एक मात्र देवता मानता था । सिर्फ़ पन्द्रह साल की उम्र में इख़नातन ने अतन के अद्वैतवाद (MONISM ) नाम से आंदोलन चलाया था । मानव सभ्यता में वो पहला इंसान था जिसने एक शक्ति को सभी जड़ और चेतन चीज़ों के जन्म-मरण का कारण माना.
न सिर्फ़ धर्म चलाने के मामले में बल्कि एक शासक के तौर पर भी इख़नातन अन्य शासकों से अलग था ।अपने दूसरे राज्यों पर कड़ी नज़र रखने और अन्य शासकों पर आक्रमण कर उनके राज्य को अपने अधिकार में कर लेने की बात पर वो कहता कि – ज़बरदस्ती किसी पर राज्य नहीं करना चाहिये,  हमें दूसरे प्रदेश के लोगों की इच्छा के विरूद्ध राज करने का कोई अधिकार नहीं है । उस ज़माने में और आज भी शासक अपने पूरे लाव लश्कर के साथ ही बाहर निकलना पसन्द करते है लेकिन इख़नातन अकेले और पैदल ही बिलकुल आम लोगों की तरह मिश्र की गलियों में निकला करता था । जब लोग ऐसा करने के पीछे का कारण पूछते तो वो कहता मैं भी आप की तरह ही एक इंसान हूँ ।

इख़नातन  27 साल की कम उम्र में ही मर गया । इसके मरते ही उसके ‘एकेश्वर  वाद ‘ को मानने वाले धर्म को मिटा दिया गया । इख़नातन द्वारा बनवाये गए कलाकृतियों और भवनों को तोड़ विकृत कर दिया गया और धीरे-धीरे वो सारी पुरानी प्रथाएं क़ायम हो गयीं जो पहले थीं  । लेकिन अपनी अद्भुत पहल की वजह से इख़नातन का नाम इतिहास में दर्ज हो गया ।

 

1 thought on “एक राजा जिसने शंकराचार्य, मोहमद्द और गुरुनानक से भी हज़ारों साल पहले की ‘एकेश्वर वाद’ की शुरुआत”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *