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एस.एस.सी (SSC) घोटाला

मार्च 11, 2018 Girish Lohni

सरकारी नौकरी का महत्त्व उस भारतीय मॉ से पूछो जिसका बेटा अम्रेरिका में डॉलर में पैसा छाप रहा है पर उसे तो उसकी सरकारी नौकरी का इंतजार है. उस बाप से पूछो जिसकी खुद की बेटी किसी बड़ी एमएनसी में लाखों का पैकेज कमाती है पर बाप को इंतजार है एक सरकारी दामाद का. हमारे समाज में सरकारी नौकरी मोक्ष से कम नहीं है.

भारत में केंद्र सरकार में इस मोक्ष का टिकट दिलाता है एस.एस.सी (SSC) मने स्टाफ सलेक्शन कमीशन. पहले प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से टिकट मिलती थी सुना है अब सेटींग से मिलती है. खबरों के बाजार के अनुसार आज कल यह किसी गुप्त मण्डी में सरकारी नौकरियों की बोलियां लगाता है. अब जैसे ही खबर आम हुई तो आ गया युवा सड़कों पर.

सरकार के विरोध में आये दिन कोई ना कोई विरोध प्रदर्शन करता है पर इस बार सरकार ने पंगा ले लिया है छः बाई छः के कमरे में पाँच बाई तीन के दो इंच मोटे गद्दे में जी तोड़ मेहनत करने वाले युवा से. सरकार ने अपनी तरफ से सीबीआई नाम के एक पक्षी से एक परीक्षा की जांच का आश्वासन दे चुकी है. लेकिन युवाओ की मांग भी यह है कि एस.एस.सी द्वारा आयोजित सभी परीक्षाओ की सीबीआई नामक पक्षी से जांच कराई जाये.

जानकारी के लिये बता दूं की एस.एस.सी की परीक्षा पास करके कोई अफसर नहीं बना दिया जाता है सबसे अच्छी पोस्ट टैक्स इंस्पैकटर की है. हर साल एस,एस,सी पंद्रह से बीस हजार तक के सरकारी पदों की उम्मीद लेकर आती है. जो लाखों युवाओं के दिलों में नौकरी के अरमान जगा देती है. अकेले दिल्ली शहर में प्रति बर्ष 60 हजार नये युवा एस.एस.सी की तैयारी में जुट जाते हैं. कभी कोचिंग इंस्टूयुट में कभी रीडिंग सेन्टर में कभी टायलेट जैसे कमरो में ये बच्चे अपना तप शुरु करते हैं. कडी़ मेहनत कर कोई एक साल कोई दो साल तो कोई तीन साल में बच्चे अलग-अलग पोस्ट पा ही लेते हैं. क्योंकि ये अधिकांश भारतीय मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखते हैं जिन्हें बचपन से सिखाया जाता है मेहनत जीवन में सफलता की कुंजी है.

ऐसे में कोई बिना मेहनत के इनकी जगह लेगा तो गुस्सा आना सामान्य सी बात है. ये मामला बीस से तीस हजार की नौकरी ना पा सकने वाले नाकायाब लड़कों का नहीं है जैसा कि सरकार दिखा रही है. यह मामला करोड़ों के घोटाले का है.कैसे परीक्षा आयोजित करने वाले उन प्राईवेट वैंड्ररो पर भरोसा कर लिया जाये जिन्होने बिना मानक पूरे किये परीक्षा आयोजन का ठेका लिया है.  

इस तंत्र ने परीक्षा को आनलाईन करा कर पहले ही गरीब विद्यार्थी को प्रतियोगिता से बाहर कर दिया है. अब मध्यम वर्ग को बाहर करने का खेल जारी कर दिया है. एस.एस.सी के चेयरमैन कहते हैं कि ये आंदोलन कोचिंग वालों से शुरु किया है जबकि सच यह है कि आनलाइन परीक्षा ने आज कोचिंग को अनिवार्य बना दिया है. आप सोचिये एक बच्चा जो दिन रात आनलाईन परीक्षा के माडल टेस्ट देता है और दूसरा पहली बार परीक्षा के दिन ही कम्यूटर के सामने सपकपा जाता है.

पिछ्ले दस दिनों से बच्चे सड़कों पर बैठे हैं. देश के गृहमंत्री झूठ बोलते हैं कि आंदोलन समाप्त हो गया हैं एक निर्वाचित सांसद मिठाई खाते हुये देश को गुमराह करता है कि बच्चों की सभी माँगें मान ली गयी है. विपक्ष घड़ियाली आंसू बहाता है मिडिया को हिंदू मुस्लिम से फुर्सत नहीं है फिर भी बच्चे बैठे हैं अपनी मांग पर अडिग.

बदले में सरकार क्या करती है आस-पास के लड़कियों के सभी शौचालय बंद करा देती है. आस-पास के सार्वजनिक पानी के नलों को बंद करा देती है. सरकार क्या चाहती है बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और फिर क्या? सड़कों पर सुलाओ.

कोई समझाये हुक्मरानों को कि इस बार दो दिन एसी ना मिलने से मुर्झा जाने वाले पेड धरना धारियों से एक-तरफा मुकाबला नहीं हैं. इस बार मुकाबला युवा से है जो गर्मी में तपकर ही बड़ा हुआ है वो शिक्षित है अपने अधिकारों को जानता है वरना इस देश की किसी राजनैतिक पार्टी में दम नहीं की दस से ज्यादा दिन धरने पर बिना हिंसा के बैठ सके.

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