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सोनिया गांधी-पितृसतात्मक समाज का एक अन्य शिकार

दिसंबर 16, 2017 Girish Lohni

1968 में जब राजीव गांधी का विवाह इटली की गोरी महिला के साथ हुआ तो निश्चित ही भारतीयों ने गर्व का दंभ भरा होगा. गोरे रंग की अंग्रेज कन्या पर विजय ने भारतीय जन मानस पर लगी उपनिवेशवादी गुलामी की चोट पर मरहम जरुर लगाया होगा. हमारे समाज में स्त्री को परिवार की इज्जत माना जाता है इसलिये इतिहास में ऎसी अनेकों घटनाएँ हैं जहां विजेता पराजित राज्य की महिलाओं का बलात्कार करते देखे जा सकते हैं.

यद्यपि भारतीय विवाह संस्था अंतरजातीय विवाह को हतोत्साहित करती है परन्तु समर्थ उच्च वर्ग के पुरूष के लिए यह इसकी उचित व्यवस्था करती है. यही कुछ कारण हैं कि पितृसतात्मक भारतीय समाज ने कभी राजीव गांधी व सोनिया अंटोनियो के विवाह का कभी कोई विरोध नहीं किया.

जैसे की हमारा समाज करता है सोनिया को देश की बेटी मानने का ढोंग रचा गया. सोनिया जब तक राजीव गांधी की पत्नी बनकर रही तब तक उनका विरोध कभी नहीं किया गया. परन्तु राजनीति में प्रवेश के उनके फैसले को भारतीय पितृस्तात्मक समाज ने चुनौती के रूप में समझा. पक्ष और विपक्ष दोनों में जो दलीलें दी गयी वो भारतीय समाज में पितृसत्तामकता की मजबूत जड़ों को दिखाता है.

जहां पक्ष में शहीद की पत्नी की भूमिका को भुनाने की जीतोड़ कोशिश की गयी वहीं विपक्ष के लिये अचानक देश की बहु विदेशी हो गयी. पक्ष ने मरती हुई कांग्रेस के लिये सोनिया को मॉ की भूमिका में स्वीकार किया विपक्ष ने पति-गृह में पुत्र की संरक्षिका के रुप में तो स्वीकार किया परंतु उत्तराधिकार के अधिकार को सिरे से खारिज किया. सोनिया के पक्ष और विपक्ष का माहौल इसलिये बना क्योंकि पत्ति की मृत्यु के पश्चात वे राजनीति में प्रवेश करती हैं यदि सोनिया पत्ति की मृत्यु के साथ सती हो जाती तो एक स्वर में उनका महिमा मंडन किया जाता.

यह आश्चर्य का विषय है कि 2004 में सोनिया के प्रधानमंत्री बनने के खिलाफ सबसे तीखा हमला देश की दो महिला नेताओं सुषमा स्वराज और उमा भारती द्वारा किया गया. आज विदेश के प्रत्येक कौने में भारतीय महिलाओ की हितैषी सुषमा स्वराज अपने ही देश में एक महिला के प्रधानमंत्री बनने पर यह कहती नज़र आयी कि सोनिया के प्रधानमंत्री बनने पर वे अपना सिर मुंडवा देंगी.

सोनिया गाँधी एक सामान्य से परिवार से आने के बावजूद कभी इस बात को अपने राजनैतिक फायदे के लिये भुनाने को कोशिश करती भी नहीं पायी गयी. सोनिया कभी अपने जीवन के संघर्ष को किसी सार्वजनिक मंच पर अन्य उम्मीदवारों की तरह डंके की चोट पर कह नहीं पायी जिसका एक मात्र कारण उनका स्त्री होना और देश के प्रतिष्ठित परिवार की बहु होना है. पुरुषसत्तात्मक समाज में स्त्री के साथ परिवार की इज्जत स्वतः जोड़ दी जाती है. इज्जत की बेड़ियों के कारण सोनिया कभी किसी सार्वजनिक मंच पर नरेंद्र मोदी की तरह नहीं कह पायी की उनका बचपन भी अभाव में गुजरा है.

गांधी परिवार में सोनिया के अलावा प्रियंका भी समाज की पितृसतात्मकता सोच का शिकार हुई हैं. प्रियंका और राहुल में कौन कांग्रेस की कमान संभाल सकता है? के प्रश्न पर प्रियंका अपने लिंग के कारण प्रतियोगिता से ही बाहर हो गयी. राहुल का कांग्रेस की कमान संभालना दिखाता है कि हमारे समाज में पितृसत्ता की जड़े कितनी मजबूत हैं.

2014 के आम चुनाव में कांग्रेस द्वारा अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित नहीं किया गया था राहुल गांधी को भाजपा ने स्वयं प्रधानमंत्री पद का दावेदार मान लिया था. भाजपा ने एक स्त्री जिसे भारत की नागरिकता प्राप्त है उसे विदेश में जन्म लेने के कारण भारत का प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया लेकिन उसके पुत्र को स्वयं प्रधानमंत्री का दावेदार घोषित कर दिया.

भले ही देश की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा राहुल को कांग्रेस की कमान दिये जाने के विषय में तमाम बातें कर लें वास्तविकता यह है कि इस पूरे प्रकरण में यह स्पष्ट रुप में देखने को मिला है कि हमारे समाज में पुरुषवादी मानसिकता किस कदर हावी है.

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