ओए न्यूज़

शिमला का माल

जुलाई 9, 2017 ओये बांगड़ू

चंकी महाराज आजकल सोशल मीडिया में कम पहाड़ों में ज्यादा भटक रहे हैं, पिछले दिनों शिमला के एक इलाके में भटकते हुए उन्हें एहसास हुआ कि इधर को नशेड़ी ज्यादा आने लगे हैं. वैसे ये एहसास सिर्फ एहसास है इसे तथ्य मानकर उस तरफ चले मत जाना क्योंकि यह सिर्फ आँखों देखी है किसी संस्था के सर्वमान्य आंकड़े नहीं हैं महाराज के पास

हुआ यूं कि किसी ज्ञानी महापुरुष ने बताया कि शिमला का असली मजा लेना है तो नीचे पुल से लगे हुए गाँव की तरफ चले जाओ,वैसे भी शिमला में घुमते घुमते अब नैनीताल वाली फीलिंग आने लगी थी, एक जगह पर हद से ज्यादा समय गुजार लो तो वह शहर भी अपने शहर सा लगने लगता था, और जब तक कुछ नया एक्साईटिंग ना हो तो मजा ही नहीं आता. ऊपर से हम पहाडी हमें चारों तरफ से घर की फीलिंग अ रही थी,बस एक होटल ही था जिसमे जाते हुए एसा लगता था कि हम कहीं बाहर घूमने आए हैं नहीं तो आगे पीछे दांये बांये सब पहाड़ ही पहाड़.संगी साथी कई बार कुछ चीजों को लेकर रोमांचित हो जाते थे लेकिन अगले ही पल जब वो हमारे मुंह से सुनते कि कभी उत्तराखंड आना हम बतायेंगे कैसे होता है ये तो वो खामोश हो जाते .

हम अपने संगी साथियों को उनके हाल पर छोड़कर नीचे पुल की तरफ बड़े चल गए, पुल का एक्साईटमेंट इसलिए ज्यादा था क्योंकि हमें लगा कि इस गाँव से जुड़कर शायद हम दोनों शहरों में कुछ अंतर कर पायें. वैसे भी शहर सब एक से ही होते हैं भिन्न्नता तो गाँवों में पायी जाती है. हम गाँव देखने की इच्छा लिए एक बाईक वाले के साथ नीचे पुल की तरफ बड़े चले, एक टेक्सी ड्राईवर ने हमें यह पता बताया था और एक पहाडी होने के बावजूद हम धोखा खा गये, उसके एक्साईटमेन्ट का मतलब वही थी जो यहाँ उत्तराखंड में होता है , नशा . लेकिन हमें लगा नयी जगह है हो सकता है यहाँ कुछ और मतलब हो.

शिमला से नीचे उतरते हुए एक बाईक वाले ने पुल के पास हमें छोड़ दिया जहाँ से लगभग एक किलोमीटर आगे चलने के बाद हमें एक गाँव नजर आ गया. अच्छा गाँव था, नाम याद नहीं क्या था लेकिन सुट्टा मिलता था जबर्दस्त. जो लड़का हमें वहां मिला उसके अनुसार ‘पूरे भारत में जो शिमला का माल कहा जाता है वह यही है, इशी को सिमला का माल कहते हैं ले जाओ’. पता नहीं क्यों उसके साथ कुछ समय बिताने को दिल किया. अब सीधे सीधे समय बिताते तो वह शक करता कि आखिर बन्दा मुझ पर क्यों इंटरेस्ट दिखा रहा है इतने जबर्दस्त शिमला के माल को छोड़कर. इसलिए मैंने उसे कन्विंस किया कि मैं उससे माल खरीदूंगा. वह भी मान गया.

एक चाय की ढपरी उसने बैठकर चाय पीने की इच्छा जताई, मैं भी चाय के लिए हर पल राजी , उससे बातों ही बातों में मैंने पूछा कि कितना माल बेच लेते हो तो उसका जवाब था सीजन में ठीक ठाक बिक जाता है आर आफ सीजन में थोड़ा बहुत बाकी रेगुलर कस्टमर आते ही रहते हैं. यकीन मानिए उसने एक भी आफिसियल डाटा उपलब्ध नहीं कराया कि कितनी संख्या में लोग आते हैं . उसने बस इतना कहा कि उंगली भर का 500 तो गाँव में देना पड़ता है.

उससे मैंने माल के दाम पूछे तो उसने सीधे हजार का चूना लगा दिया, अब वादा किया था इसलिए हजार देने को मैं मजबूर था फिर भी मैंने उसे पांच सौ में राजी करने की कोशिश की . उसने बताया कि नीचे की तरफ सिर्फ नशेड़ी लोग ज्यादा आते हैं. आम पब्लिक के देखने लायक यहाँ कुछ नहीं है और ये है भी शहर से दूर. बाकी यहाँ के लोग जिनकी जान पहचान अच्छी है वह शहरों में जहाँ जहाँ टूरिस्ट रुकते हैं वहां सीधी डिलीवरी कर आते हैं. रेगुलर कस्टमर तो फोन कर देता है और हम उस तक पहुंचा देते हैं बाकी अननोन नए ग्राहक के लिए पान वाला ,होटल वाला ,चाय वाला ये सब इंतजाम कर देते हैं. शिमला आकर माल हर कोइ नशेड़ी ले जाना चाहता है.

 

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