बांगड़ूनामा

शहर-अमृता प्रीतम

दिसंबर 30, 2016 ओये बांगड़ू

इंसान जिस शहर में रहने लगता है वहां की सड़के वहां की गलियां भी उस बतियाने लगती है. कुछ कही अनकही सी बातें होने लगती है. अमृता प्रीतम की कविता ‘शहर’ में भी एक लम्बी बहस सा है

मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है
सड़कें – बेतुकी दलीलों-सी…
और गलियाँ इस तरह
जैसे एक बात को कोई इधर घसीटता
कोई उधर
 
हर मकान एक मुट्ठी-सा भिंचा हुआ
दीवारें-किचकिचाती सी
और नालियाँ, ज्यों मुँह से झाग बहता है
 
यह बहस जाने सूरज से शुरू हुई थी
जो उसे देख कर यह और गरमाती
और हर द्वार के मुँह से
फिर साईकिलों और स्कूटरों के पहिये
गालियों की तरह निकलते
और घंटियाँ-हार्न एक दूसरे पर झपटते
             
जो भी बच्चा इस शहर में जनमता
पूछता कि किस बात पर यह बहस हो रही?
फिर उसका प्रश्न ही एक बहस बनता
बहस से निकलता, बहस में मिलता…
 
शंख घंटों के साँस सूखते
रात आती, फिर टपकती और चली जाती
 
पर नींद में भी बहस ख़तम न होती
मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है….

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