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स्टेट बैंक और अंकल आंटी

जनवरी 4, 2018 Girish Lohni

स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के भीतर हमेशा मौहल्ले में पाए जाने वाले एक विशेष प्रकार के अंकल आंटी के घर जैसा माहौल रहा है. ये अंकल आंटी अपने बच्चे के हर बड्डे पर पूरा मौहल्ला आमंत्रित करते हैं और लग जाते हैं दिल्ली मुम्बई वाले किसी मौसी फूफा या आफ़िस के किसी बॉस या उसकी बीवी के स्वागत की तैयारी में. इन सबके बीच हम जैसे लोगों के लिए अंकल आंटी के घर से आने वाली विशेष महक चर्चा का विषय बना रहता.

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (जो एशिया का सबसे बड़ा बैंक है) में दो तरह के उपभोक्ता है एक जो लम्बी कतार में शातिपूर्ण और पूरे धैर्य से डरा हुआ खड़ा रहता है दूसरा जो एसी लगे कमरे में टांग पर टांग चढ़ाकर चाय काफ़ी के मजे लूटता है. कतार वाले के घर में किसी की मौत भी हो जाये एसबीई की कतार छोड़ नहीं सकता. दूसरी ओर बाबू साहब की घरवाली के फुंसी होने पर भी बाबू साहब के घर पहुचने से पहले पैसा पहुँच जाता है.

आप कितना ही दुल्हा बनकर जाईये अंकल आंटी का ध्यान आप पर तब तक नहीं जाना जब तक कि विशेष माहानुभाव निपट ना जायें. आपके साथ अंकल आंटी का व्यवहार इस बात पर निर्भर करता है कि महानुभावो ने अंकल आंटी के साथ कैसा व्यवहार किया है.

बैंकिंग क्षेत्र में इतनी प्रतियोगिता आने के बावजूद एसबीआई इस रेस में सबसे आगे है. ऐसा नहीं हैं कि एसबीआई सर्वश्रेष्ठ सेवा के कारण रेस में सबसे आगे है. बल्कि सरकारी संरक्षण प्राप्त होने के कारण आज सबसे आगे है. सरकारी संरक्षण के कारण ही एसबीआई लोगों के सामने आज एक विकल्प नहीं मजबूरी है जिसे चुना नहीं थोपा जाता है.

सबकुछ निपटने के बाद बारी आती है तोहफों की. आप कितना ही महंगा तोहफ़ा ले लीजिये वो महत्त्वहीन है क्योंकि वो आपके लिये भले महंगा हो अंकल आंटी के लिए हमेशा सामान्य ही रहेगा. कमियां आपके ही तौहफे में रहेगी हिकारत आपके ही तौहफे के प्रति रहेगी.

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने अप्रैल से नवंबर 2017 के उन खातों से 1771 करोड़ का जुर्माना वसूला है जिनमें न्यूनतम बैलेंस नहीं था. ( मैट्रो शहरो में न्यूनतम 5000 व शहरी शाखाओं में 3000). 42 करोड़ खाताधारको में से 29 करोड़ खाताधारको के खातों से सौ पचास काट कर यह जुर्माना वसूला गया है. ( जनधन व बेसिक बचत खाते के 13 करोड़ खातों को शामिल नहीं किया गया है) वर्तमान में सभी बैंको में एसबीआई उन बैंकों में है जिनका एनपीए सर्वाधिक है.

एनपीए वो चपत है जो बैंक को उसके मौसा फूफा खाताधारकों द्वारा लगाई जाती है. यदि बैंक अपने मौसा फूफा से पैसा नहीं उगाह सकता तो किस हक से आम जनता के पैसों पर जुर्माना लगा सकती है यदि बैंक हजार करोड़ का एनपीए छोड़ सकते हैं तो किस आधार पर गरीबों के सौ पचास रुपये पर गिद्ध सी नजर गडाये बैठे हैं?

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