गंभीर अड्डा

साजिश किसकी है?

अप्रैल 3, 2018 कमल पंत

देश में अचानक से मुद्दों की बाढ़ सी आ गयी थी,आवाजें बुलंद हो रही थी जो किसी वजह से कुछ समय के लिए खामोश थी,सरकार लगातार कह रही थी कि ये उसे घेरने की साजिश हो रही है,मगर सरकार ने जब सब अच्छा किया है तो वह घिरेगी क्यों?

2016 से शुरू करते हैं जब तमिलनाडु से आये किसान अचानक चर्चा में आने लग गए थे,एकदम से टीवी न्यूज चैनल में जन्तर मन्तर में बैठे ये किसान हरे रंग की धोती और अपनी मांगो के साथ आदमी की डमी खोपड़ियाँ लिए नजर आ रहे थे,रोजाना अलग अलग हरकतों के जरिये खुद को मीडिया में बनाये रखना भी अपने आप में एक हुनर होता है वरना रोज जन्तर मन्तर में एसे सैकड़ों आन्दोलनकारी किसान देखने वाली मीडिया कभी भी उन्हें सीरियसली नहीं लेती. इन्होने सरकार के सामने विरोध भी किया और विरोध में एसे अहिंसक तरीके अपनाए कि मीडिया का इन पर इंटरेस्ट भी बना रहा. कभी बोतलों में पेशाब भर कर प्रदर्शन किया तो कभी जमीन में दाल चावल खाकर,कभी नंगे बदन सर्दियों में बैठ गए तो कभी मरे चूहे ले आये. सरकार अचानक से बैक फुट पर आने लग गयी क्योंकि किसान फ्रंट फुट पर खेल रहे थे. 

फिर एक बिसलेरी की बोतल चली,कहीं से सोशल मीडिया में ये खबर आने लगी कि ये लोग बिसलेरी का पानी पीते हैं,बिसलेरी के पानी से होते हुए बहस इनके खान पान जंतर मंतर में रहन सहन तक पहुँच गयी,अचानक पूरा मुद्दा ही बदल गया मीडिया में,अचानक सोशल मीडिया में फ़ैली भ्रांतियों ने किसानों के आन्दोलन को समाप्त कर दिया.आज भी तमिलनाडू के किसान आ रहे हैं मगर मीडिया कवरेज बहुत कम है.

2017 में जन्तर मन्तर से आन्दोलन हटवा कर सरकार ने दो अच्छे काम कर लिए(अपने लिए),एक तो मीडिया को एसे आन्दोलनकारी अब आसानी से नहीं मिलते दूसरा आन्दोलनकारी खुद कन्फ्यूज हैं कि उन्हें किधर जाकर प्रदर्शन करना है, एक्सपीरियंस आन्दोलनकारी अन्ना तक को धमकी भरा पत्र देना पड़ा कि आप व्यवस्था करो नहीं तो मैं अपने मन की जगह जाकर बैठ जाऊंगा तब जाकर अन्ना के लिए रामलीला मैदान करना पड़ा.

प्रदर्शन आन्दोलन जो पहले थोक के भाव होते थे अब ढूंढें नहीं मिलते,सरकार के अच्छे कामों की वजह से नहीं बल्कि जगह के कन्फ्यूजन की वजह से,लोग दूर दूर से आन्दोलन के लिए आते तो हैं मगर जगह को लेकर जबर्दस्त कन्फ्यूजन बरकरार है. कोइ कहता जन्तर मन्तर के दूसरी तरफ चले जाओ तो कोइ रामलीला मैदान भेज देता,कोइ कहता संसद के पास बैठो तो कोइ इण्डिया गेट भिजवा देता. रांची से आये गोपाल स्वामी तीन दिन तक भटकते रहे और उन्हें भटकाती रही पुलिस. वह पहले की तरह जंतर मन्तर आ गए तो उन्हें एलआईयू ने यह कहकर उठवा दिया कि अब यहाँ धरने नहीं होते रामलीला मैदान जाओ, रामलीला मैदान में कोइ धरना होता न देख गोपाल वापस आ गए,जंतर मंतर पर मौजूद चाय की दूकान में हुए एक मुलाकर में उन्होंने बताया कि उनकी बेटी लापता है,स्थानीय पुलिस मदद नहीं कर रही इसलिए राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक को पत्र लिख दिया है,अब आमरण अनशन पर बैठने के लिए दिल्ली आये हैं लेकिन यहाँ मालूम ही नहीं चल रहा कि किधर बैठना है.

खैर मुद्दा है सरकार के घिरने के,अचानक किसानों के बाद छात्र बेकाबू हो गए और आन्दोलन पर उतर आये,अधिकाँश सरकारी सीटों पर नियुक्ति के बदले मिल रहे गोल मोल जवाब से परेशान होकर मजबूरन दिल्ली में छात्रों ने प्रदर्शन कर डाला, लाठियां चली छात्र घायल हुए और सरकार फिर शक के दायरे में आ गयी कि आखिर क्यों बेरोजगार इस तरह धरना दे रहे हैं.

ये मामला चल ही रहा था कि अचानक सीबीएसई के दो पेपर लीक हो गये और वो स्कूल के विधार्थी भी सड़कों पर उतर आये.अब लगने लगा था कि सरकार सच में बुरी तरह घिर रही है. इन सबके बीच अन्ना हजारे भी किसानों को लेकर रामलीला मैदान में डेरा जमाए हुए थे.

देश के किसान ,देश के छात्र और देश के बेरोजगार सड़कों पर लगभग एक साथ मौजूद थे. अचानक सुप्रीम कोर्ट की तरफ से एक फैसला आता है कि पूरी जांच के बाद ही गिरफ्तारी होगी,और हंगामा मच जता है.

लेख पढ़कर आपको लगेगा कि जानबूझकर सरकार को घेरने की कोशिश की जा रही है, जी सही पकड़ा आपने जानबूझकर एसी कोशिश कर रहा हूँ मैं, क्योंकि सरकार के पास तमाम तरह की शक्तियाँ मौजूद हैं, अगर विपक्षी दल किसी तरह की साजिश सरकार के खिलाफ कर भी रहे थे तो सरकार क्या इतनी भोली है कि वो साजिश नहीं देख पायी,इंटेलिजेंस टीम,एलआईयू,जांच एजेंसी ,आईबी सीआईडी जैसे अनेक विभाग सरकार के लिए काम करते हैं ,उनकी एक्सपर्ट नजरों से ये साजिशें बच गयी.

सरकार ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई सबसे सही शब्द यही हो सकता है,क्योंकि दिल्ली में बेरोजगार छात्रो के प्रदर्शन को कुचलने के लिए जिस तरह से लाठी चार्ज किया गया था वैसे ही हिंसक प्रदर्शनकारियों पर भी किया जा सकता था. केंद्र के साथ साथ तमाम वो राज्य सरकारें जिनके यहाँ भारत बंद का हिंसक प्रदर्शन हुआ वो सब इसके लिए जिम्मेदार हैं.

सरकार अगर कहती है कि विपक्षी दलों ने उसके खिलाफ साजिश की है तो क्या सरकार इतनी कमजोर है कि उससे कम संख्या में मौजूद सांसद और विधायक उसके खिलाफ साजिश कर जाते हैं,और सरकार देखती रह जाती है .

इन सबके बीच,आन्दोलनकारी बेरोजगार,सीबीएसई मामला,छात्र,किसान,लुटे पिटे बैंक सब चर्चा से बाहर चले गए हैं.फिलहाल देश की महापंचायत फेसबुक में यही भारत बंद जोर शोर से चल रहा है.

अब ये बहस को जन्म देना कि साजिश किसकी है ये बहुत ज्यादा जरूरी है. विपक्ष हो या पक्ष साजिश का पता फिर से सरकार ही लगा सकती है.

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