गंभीर अड्डा

सफेदी की चमक ‘नील’ विश्व को भारत की देन

नवंबर 4, 2018 ओये बांगड़ू

सफेदी को चमक देने का आविष्कार कही विदेश में नहीं बल्कि भारत में हुआ था. भारत ही वो देश है जिसने दुनियां को सफ़ेद कपड़ों पीला पड़ने से बचाने का फ़ॉर्मूला दिया. भारत में 16 वीं सदी से भी कही पहले से प्राकृतिक नीले रंग यानी ‘नील’ का इस्तेमाल होता था. 16वीं शताब्दी से पहले तक जब तक यूरोपियन भारत नहीं आये थे वे मूल रंगों में से सिर्फ दो ही रंग लाल और पीले का इस्तेमाल करते थे। जब ब्रिटिशर्स पहली दफा सूरत के बंदरगाह पर उतरे तो वो ‘नील’ को देखकर हैरान थे और उन्होंने दो महीने के अंदर नील की कई पेटियां यूरोप भेजी.

भारतवासी सदियों पहले से इस रंग को बनाने की विधि जानते थे। उन्हें नील के पौधे की पहचान थी और उसे परिशोधित करने का तरीका भी आता था। 16वीं सदी के बाद ब्रिटिशरों, पुर्तगालियों और फ्रांसीसियों ने भारत से भारी मात्रा में नील यूरोप भेजना शुरू किया। नील वहां इतना फेमस हो गया कि इसे इंडिया के नाम इंडिगो का नाम दे दिया गया। मगर इन व्यापारियों ने काफी वक़्त तक यह जाहिर नहीं होने दिया कि नील बनता कैसे है। हालात ये हो गये थे कि जर्मनों को यह लगने लगा कि नील एक खनिज पदार्थ है और वहाँ की सरकार ने नील की खुदाई की कोशिशें भी शुरू कर दीं।

दूसरे देशों में नील को बनाने के कई प्रयास किए गए. यूरोप में तो नील की खेती तक की गई लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिल सकी. भारत में नील का व्यापार इतना समृद्ध था कि प्लासी की जीत के कुछ साल बाद कई अंग्रेज ईस्ट इंडिया की नौकरी छोड़ बंगाल जा कर नील की खेती करने लगे.

ब्रिटिशर्स ने इंडिगो यानी नील प्लान्टर बनने के लिए खेती ओर रूख तो कर लिया लेकिन अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की चाह में उनके भारतीय किसानो और खेतिहर मजदूरों पर जुल्म बढ़ने लगे.किसानों पर होते अत्याचार की कहानी पर उन बंगाल के एक पोस्ट मास्टर दीनबंधु ने नील दर्पण नामक नाटक भीलिखा जो काफी मशहूर हुआ.

ब्रिटिशर्स के जुल्म से तंग आ कर बंगाली किसानों ने नादिया जिले में विद्रोह कर दिया। कंपनी ने नील प्लान्टरों के मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। प्लांटरों को बंगाल छोड़ कर बिहार के इलाके में आना पड़ा। यह 19वीं सदी के शुरूआती दशकों की बात है। बंगाल के बाद निलहे अंग्रेजों का ठिकाना बिहार के कोसी और मिथिलांचल का इलाका बना। मधुबनी का पंडौल इनका केंद्र बना और 1830 में वहां बड़ी फैक्टरी स्थापित हुई। धीरे-धीरे आस पास के इलाकों में कई फैक्टरियां खुलने लगी।

मगर बहुत जल्द वहां के किसानों ने भी विद्रोह कर दिया। यह 1867 की बात है। विद्रोह जबरदस्त हुआ और निलहों को वह इलाका भी खाली करना पड़ा। 1880 में दरभंगा राज द्वारा यह घोषणा कर दी गयी कि उनके इलाके में नील की खेती नहीं की जायेगी। इस इलाके से उजड़े निलहों को सबसे मुफीद इलाका चम्पारण का लगा। वहां बेतिया राज घराना भारी कर्ज के बोझ से दबा था। वहां निलहों को खुली छूट मिल गयी और उस इलाके के 2220 गांवों में से 1938 गांवों को इन अंग्रेजों को पट्टे पर दे दिया गया। वहां इनकी मनमानी चलने लगी।

वैसे चंपारण के किसानों ने भी इस अन्याय का प्रतिरोध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जब तक विद्रोह होते रहे। 1908 में शेख गुलाब, राजकुमार शुक्ल और शीतल राय जैसे किसानों के नेतृत्व में बड़ा आंदोलन हुआ। लोगों ने नील की खेती छोड़ देने का संकल्प लिया। उस दौरान एक प्लांटर की हत्या भी कर दी गयी। मगर प्रशासनिक बल प्रयोग के जरिये उस आंदोलन को दबा दिया गया।

इस बीच 1896 में जर्मनों ने कृत्रिम नील तैयार कर लिया था और प्राकृतिक नील की मांग भी घटने लगी थी। मुनाफा कमाने के चक्कर में निलहे अंग्रेजों ने किसानों पर कई तरह के कर लगाने शुरू कर दिया। लिहाजा विद्रोह की आग भड़कती चली गयी। फिर प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ। जर्मनी से कृत्रिम नील आना बंद हो गया। भारतीय नील की कीमत फिर से आसमान छूने लगी। मगर यह कुछ ही सालों की बात थी। उधर युद्ध बंद हुआ इधर गांधी चंपारण पहुंचे। अंततः नील की खेती और प्राकृतिक नीला रंग बनाने का भारतीय तरीका इतिहास बन गया।

 

 

 

 

 

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