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आरक्षण का दर्द

मार्च 17, 2018 Girish Lohni
15 मार्च 2018 को उत्तराखंड राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा हिंदी अंग्रेजी वाणिज्य संस्कृत विषय में राजकीय महाविद्यालय हेेतु असिस्टेंट प्रोफेसर की स्क्रीनिंग परीक्षा के परिणाम जारी किये गये। जिसमेंं सामान्य वर्ग के परीक्षार्थी को सफल होने के लिये 200 अंक में से 179  अंक प्राप्त करने थे जबकि आरक्षित श्रेणी में 200 में से 51.50 अंक। मतलब सामान्य वर्ग का परीक्षार्थी 80 प्रतिशत से अधिक अंक लाने के बावजूद इंटरव्यू के लिये अहर्ता प्राप्त नहीं कर पाता आरक्षित श्रेणी का परीक्षार्थी 25 प्रतिशत में ही अहर्ता प्राप्त कर लेता है।
उपरोक्त कट आफ हिंदी विषय की है. अन्य विषयों मेंं भी अंतर कुछ कम नहीं है लेकिन हिन्दी में सर्वाधिक है। परीक्षा से जुड़े अन्य तथ्य यह हैंं कि अभ्यर्थी द्वारा उक्त विषय में पोस्ट ग्रेजुएट के साथ नेट अथवा सेट की परीक्षा पास की होनी आवश्यक है।
सवाल है कि एक व्यक्ति जो एक विषय में इतना विशेष ज्ञान रखने के बावजूद जो स्वयं तीस प्रतिशत अंक नहीं ला सकता तो वह किस अधिकार से कालेज में तीस प्रतिशत से कम अंक वाले विद्यार्थियों को फेल कर सकता है और वह क्या बच्चों को पढ़ायेगा ?
भारत मेंं आरक्षण सामाजिक न्याय के नाम पर लागू हुआ था पर क्या आरक्षण का यह परिणाम विद्यार्थियों के सामाजिक न्याय की धज्जियां नहीं उड़ा रहा है?क्या शिक्षा क्षेत्र में मेरिट के साथ इस स्तर पर समझौता किया जा सकता है? क्या ऐसी पोस्ट जिसके जिम्मे देश का भविष्य सुधारना है वहां आरक्षण के नाम पर गुणवत्ता के साथ इस कदर समझौता किया जा सकता है? अगर हम देश की क्रिकेट टीम की गुणवत्ता में समझौता नहीं कर सकते तो फिर कैसे देश के बच्चों के भविष्य कै साथ समझौता करने को तैयार हैं.  क्या आरक्षित सीटों पर एक न्यूनतम मानक तय नहीं किया जा सकता.
भारत में कुल रोजगार में  सरकारी नौकरी का प्रतिशत दो प्रतिशत ही है। अर्थात 98 प्रतिशत नौकरी का क्षेत्र सभी के लिये खुला है। इसके बावजूद क्या इस दो प्रतिशत नौकरी मेंं ऐसे क्षेत्र चुनने की आवश्यकता नहीं है जहां मेरिट को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता न किया जाय क्योंकि सवाल केवल नौकरी का ही नहीं है ब्लकि आने वाले भविष्य की तैयारी का भी है।
कब तक बाबर की मौत का बदला जुम्मन मिंया से लिया जाता रहेगा? आरक्षण को संविधान में एक सकारात्मक निर्णय के रुप में शामिल किया गया था। स्कूल में बच्चों को आप आरक्षण दीजिये, कालेज मेंं आप आरक्षण दीजिये, संसद में दीजिये, विधानसभा में दीजिये, हर उस जगह दीजिये जहां दलितों को प्रोत्साहित किया जा सके ना कि उन्हें कमजोर कड़ी के रूप मेंं जोड़कर रखा जाय।
बाबा साहब ने संविधान अच्छा है या बुरा है के सवाल पर कहा था कि कोई भी अच्छा संविधान बुरा संविधान हो सकता है अगर उसको लागू करने वाले बूरे हों। आरक्षण का सकारात्मक निर्णय आज बुरा राजनैतिक मंशा के कारण बुरा हो गया है। आरक्षण की नीति के कारण जिस वर्ग संघर्ष का प्रश्न बाबा साहब से बार-बार किया जाता था आज वह सामने है। समय रहते ठोस निर्णय नहीं लिये गये तो यह वर्ग संघर्ष सड़कों पर भी दिखेगा|

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