गंभीर अड्डा

बाघिन अवनि को मारने के पीछे एक एंगल यह भी

नवंबर 6, 2018 ओये बांगड़ू

महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में एक सो कॉल्ड नरभक्षी बाघिन अवनी को मार डाला गया। उसके पीछे दो बच्चे अब बच गए हैं। अवनी के चर्चा में आने का कारण रहा उसके जंगल का एरिया जो कारपरेट सेक्टर को दिया जाएगा(आधिकारिक घोषणा नही हुई है, मगर चर्चा चहूँ ओर है)।

अवनी को बचाने के लिए ऑनलाइन पिटीशन की बाढ़ सी आ गयी थी। हर कोई चाहता था कि इस नरभक्षी बाघिन को मरने न दिया जाए।

यवतमाल में इसने 13 लोगों को मार डाला, ऐसा सरकार के दावे बता रहे हैं और यह भी कह रहे हैं कि ये पूरी तरह से आदमखोर हो चुकी थी, इसके शिकारी क्रेडिट लेते लेते नही थक रहे। इसके शिकार की पूरी प्रोसेस को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया जा रहा है। बताया गया कि कैमरे, ड्रोन, हैंग ग्लाइडर, ट्रैकर्स, शूटर और 200 लोग लगे ‘अवनि’ को मारने में, मगर ये नही बताया जा रहा कि अवनी के शिकार लोगों के डीएनए मैच क्यों नही हुए।

खैर मामला कहाँ से शुरू करें पता नही। इसलिए एक कहानी सुनो, बॉलीवुड इस पर फ़िल्म भी बना चुका है। कहानी कुछ यूं है कि एक ठेकेदार को जंगल और जंगल की जमीन चाहिए थी, उसने सरकार से गुहार लगाई। सरकारी आदमी की जेब भरी और जंगल की जमीन अपने नाम कर ली, लेकिन परेशानी शुरू हो गई क्योंकि जंगल से दो चार गांव और कुछ जंगली जानवर अपना जीवन चला रहे थे। सीधे सीधे जंगल दे देने का मतलब था बगावत का डर(हालांकि आजाद भारत मे एक दो छोड़कर कहीं भी कोई बगावत नही हुई जंगल के लिए)।

तो सरकार ने फैसला किया कि जंगल के नाम का डर फैलाया जाए। लेकिन भूत प्रेत का डर न जी न ये तो बचकाना हो जाएगा।

इस बीच अचानक किसी जंगली जानवर के हमले से एक की मृत्यू हो गई, प्रचारित किया गया कि शेरनी ने मारा है। शेरनी ने मारा है मतलब शेरनी के मुंह लग गया इंसान का खून अब वह और खून पीयेगी। बस फिर क्या था धीरे धीरे शेरनी के खौफ को इतना जबरदस्त तरीके से प्रचारित किया गया कि गांववालो को सच मे लगने लगा कि जंगल की शेरनी से उन्हें जान का खतरा है।

ये एक ऐसा डर था जो जायज भी था और सही भी लग रहा था क्योंकि जंगल मे 8 से 10 मौतें हो गई थी। तो बस हंगामा शुरू कि मारो शेरनी को । अब ये जंगल संरक्षित टाइप जो होते हैं यहां शेर पर हाथ डालना बच्चों का खेल नही और वह भी उस वख्त जब शेरनी गर्भवती हो

फिर भी एक दस्ता पीछे लगा रहा उसे मारने के। सरकार ने दो सिमपेथी हासिल कर ली थी। गांव वालों से

गांव वालों के लिए वह मसीहा थे जो नरभक्षी बाघिन को मारकर उन्हें डर से मुक्ति दिलाते। तो बस सरकार हीरो विलेन बाघिन और फायदा लेने वाला ठेकेदार अलग साइड

दो साल में ढूंढ खोज कर आखिरकार बाघिन को मार दिया गया।

इस बीच हजारों पीटिशन डाली गई अवनी को बचाने के लिए, लाखों तर्क दिए गए कि अवनी को फंसाया जा रहा है, अवनी का डीएनए किसी से मैच नही कर रहा वो नरभक्षी नही है। मगर कौन यहां किसकी सुनता है।

नरभक्षी बाघिन का आखिरकार हुआ शिकार की खबर के साथ ही जंगल को उसके प्रकोप से आजाद कर दिया गया

प्रकोप किसका था इस बात पर अभी भी संदेह है। मगर सरकार जो कहती है वह अंतिम सत्य होता है इसलिए प्रकोप बाघिन का था। कारपरेट को जमीन दी जाएगी तो विकास के लिए और उसका इससे कोई लेना देना नही होगा समझे

अब सोशल मीडिया में बकवास न करो। मर गयी, मर गई, बाघिन ही तो थी आप गली के कुत्ते बचाओ न यार काहे जंगल के शेरों पर टाइम वेस्ट करते हो। जितने एरिया को ये जानवर बर्बाद करते हैं उतने में कारपरेट सेक्टर गजब का डेवलपमेंट ले आएगा। बहुत अच्छा दिखाई भी देगा और प्रॉफिट भी होगा । शेर का क्या अचार डालोगे। गली मोहल्ले में कुत्ते हैं न उन्हें संरक्षित करो।

 

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