यंगिस्तान

थ्री इडियट के बाहर का हॉस्टल -दूसरा किस्सा

अक्टूबर 4, 2016 ओये बांगड़ू

इंजिनियरों की अपनी एक अलग दुनिया होती है. उनका कालेज उनका हास्टल उनकी हास्टल लाईफ सब एक अलग जहान सरीखा होता है. ये चार साल उनकी जिन्दगी के शायद खुशनुमा चार साल होते हैं. हमारे इंजिनियर डबल द इंजिनियर  (असली नाम अगली बारी लिखूंगा ) ने खुद से ये किस्सा शेयर किया है. इस किस्से के लेखक खुद इंजिनियर हैं और आज भी सोते जागते बस हास्टल याद करते हैं.

रैगिंग भले ही पूर्णतः बंद हो गयी है पर एक जमाना था जब सीनियर्स को देखते ही 90 छूट जाती थी। 90 180 3rd बटन का मतलब इस ज़माने के इंजीनियर नही जान पाएंगे। पर इतने सालों बाद जब भी सीनियर्स मिलते है मैं 90 मारना नही भूलता। जूनियर और सीनियर के बीच का रिश्ता जो ये 90 बना देती है वो कोई क्या समाज पायेगा।
जो लोग इंजीनियरिंग लाइफ से ताल्लुकात नहीं रखते तो उनको मैं आसान भाषा में समझा देता हूँ कि ये 90 और 3rd बटन का मतलब क्या है!

इंजीनियरिंग कॉलेज में जूनियर्स के सीनियर छात्रों के सामने से निकलने का तरीका भी तय है। सीनियर्स को देखते ही सभी जूनियर को थर्ड बटन पोजीशन (गर्दन झुकी कर शर्ट की तीसरी बटन पर नजर) पर ही देखने के निर्देश होते हैं।
इतना ही नहीं, सीनियर्स के पास से गुजरने पर 90 डिग्री पर झुककर प्रणाम भी करना अनिवार्य है।

आज भी सीनियर मिलते ही टिक(TIC) मांग लेते है। technical identity कार्ड जिनको नही पता उनके लिए और जिनको पता है वो ज़रा चेक कर लो अपना tic। मै किसी कानून का विरोध नही कर रहा पर पर 1st ईयर को ये बोलना कहता हूं कि तुम लोगो ने बहुत कुछ मिस कर दिया। लिमिट मे जब चीज़ें हो तो अच्छी होती हैं बहुत अच्छी। आज भी सड़क में स्विमिंग करना मेरी इंजीनियरिंग की सबसे अच्छी यादो में से एक है।

स्टूडेंट जब स्कूल से कॉलेज में जाता है, खासतौर पर इंजीनियरिंग कॉलेज में तो उसके लिए माहौल एकदम नया होता है। नए टीचर्स मिलते हैं, नए स्टूडेंट्स से रूबरू होते हैं। माहौल में एडजस्ट करने के लिए थोड़ी बहुत रैगिंग होनी चाहिए। इससे स्टूडेंट खुलता है। यदि कोई प्रॉब्लम होती है तो वह अपने सीनियर्स और टीचरों को बता सकता है। थोड़ी बहुत मस्ती होती है तो लगता है कि हम कॉलेज में पढ़ रहे है। रैगिंग ऐसी नहीं होनी चाहिए कि स्टूडेंट स्ट्रेस में आ जाए और कोई गलत कदम उठा लें। रैगिंग केवल एक-दूसरे को जानने तक की जाए तो बेहतर है।

हम इंजीनियर अपने 4 साल कॉलेज में बिताते हैं और सीनियर और जूनियर कॉलेज लाइफ में एक दूसरे के पूरक होते हैं। चाहे वो होस्टल रूम हो या कॉलेज, जूनियर व सीनियर छात्रों की कई जरूरतें एक दूसरे पर भी निर्भर करती हैं। टेकफेस्ट, मस्ती या लड़कियों से दोस्ती का भी सवाल हो तो सीनियर और जूनियर ही भगवान् बन कर मदद करने को अवतरित होते हैं। यहाँ तक कि कॉलेज के बाहर के लफ़ड़े भी हम आपस में मिल कर ही निपटाते हैं, ऑटो वाले के 5 रूपये की जगह 4 रूपये देने का झगड़ा हो या लेट नाईट मूवी शो में कॉन्ट्री करते टाइम कम पड़ने वाले का अरेंजमेंट, ये सब कुछ!

हॉस्टल रूम मिस करते होंगे आजकल अपने स्पाइडर मैन, अनारकली और जुगनू डांस को। आज सुबह सुबह शर्ट का 3rd बटन लगाते हुए बस याद आ गया अपना फर्स्ट इयर।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *