गंभीर अड्डा

राज बदला तो समाज भी बदला

अक्टूबर 6, 2018 ओये बांगड़ू

सामजिक उथल पुथल एक सामन्य सी बात है,याद रहे मैं राजनितिक उथल के बाद होने वाले सामजिक बदलाव की बात कर रहा हूँ. ये इतना सामन्य है कि अब तक हमें आदत हो जानी चाहिये थी लेकिन कुछ वर्षों में चीजें सामन्य रहने से या बदलाव आंशिक होने से हमें फर्क नहीं पड़ा,मगर अब फिर से सामाजिक उथल पुथलों का दौर शुरू हो गया है.

याद कीजिये रामायण युग को(जो किताबों में पढ़ा) दशरथ का युग अच्छा था या बुरा इसकी चर्चा नहीं है कहीं लेकिन रामराज्य में समाज की स्थिती को लेकर कसीदे पढ़े गए हैं,इसका सीधा सा अर्थ है कि राम से पहले राजा रहे दशरथ के काल में समाज में कुछ कमियां रही होंगी जिन्हें राम ने दूर किया, रावण युग लंका के लिए बहुत लाभदायक था,रामयण में ही लंका की सम्पन्नता का वर्णन है,लेकिन राम रावण युद्ध के बाद,या लंका दहन के बाद क्या वहां की स्थिति वैसी रही होगी? किसी भी किताब में विभिषण के काल की कोइ चर्चा नही. समाज में कैसे उथल पुथल मची होगी फिर ?

लंका जहाँ अत्यधिक सम्पन्नता थी जाहिर है जीवन स्तर भी ऊंचा ही रहा होगा, सोना चांदी अन्न भरपूर मात्रा में, राक्षसी प्रवृति थी इसलिए मांस मदिरा भी प्रयोग होती होगी, मगर विभिषण के आने से अचानक इन सब चीजों में समाज को विराम लगाना पड़ा. क्यों ? विभिषण सात्विक प्रवृति का था और जैसा कहा भी गया है यथा राजा तथो प्रजा.जैसा राजा वैसी प्रजा. अचानक से मान मदिरा भरपूर इस्तेमाल करने वाले विलासी लंका निवासियों को सात्विक जीवन अपनाना पड़ा होगा. पूरा समाज अचानक विपरीत दिशा वाली जीवन शैली अपनाने को मजबूर हो गया. और जीवन शैली कौनसी सी सही है ये तय करने वाले हमेशा से राजा और उसके चाटुकार मंत्री ही रहे हैं.

उसके बाद महाभारत, राजनैतिक स्तर में जैसा भी बदलाव रहा हो, समाज में अधिक परिवर्तन नहीं हुआ , हस्तिनापुर की जनता पांडू के जमाने से जैसी जीवन शैली पर रह रही थी,लगभग वैसी ही रही,मगर कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद अचानक,बहुत सी चीजों में परिवर्तन आया, समाज को गोकुल वाली निति अपनानी पड़ी,दूध दही का अधिकाधिक इस्तेमाल, क्योंकि युधिस्टर अर्जुन द्वारिका और कृष्ण के इसी जीवन शैली से प्रभावित थे. बलराम कृष्ण जिस तरह गोकुल की तरह धन धान्य पूर्ण द्वारिका बसाए हुए थे वैसा ही राज्य युधिस्टर की भी कल्पना थी. जाहिर है हस्तिनापुर प्राप्त होने के बाद वही किया होगा.

भारत में अशोक से पहले के राजाओं ने सिम्पल से निति बना रखी थी, अनाज उगाओ और हमें भी दो बाकी सोना चांदी के लिए हम लड़ते भिड़ते रहेंगे.अशोक ने जब भारत को एक किया तो अपने भाई के साथ भ्रमण भी किया,उस भ्रमण के दौरान उसे जो जो कमियां लगी उन्हें दूर करने की पूरी कोशिश भी की,कुएं बनवाना तालाब,सराय,रास्ते ये सब उसने किया और जनता को बताया कि ये भी राजा का काम है. उससे पहले जनता को इन चीजों की आदत नही थी,तो अचानक से जब राजा उनके लिए कुछ करने लगा तो उन्होंने भी इसके उत्सव मनाने शुरू कर दिए, राजाओं को पूजा तक जाने लगा गाँव गाँव में. कई मंदिरों के उत्सव में आज भी जब तक राजा नही होता उत्सव शुरू नहीं होता, ये उस समय का सामाजिक बदलाव था.

फिर आये लोदी,खीलजी उन्होंने अपने हिसाब से समाज में परिवर्तन किये, मुगलों ने फिर अपने ढंग से चीजों को तोडा मरोड़ा, सब का भुगतान किया जनता ने अपनी जीवन शैली में परिवर्तन करके, एक किस्सा है कि लोदीयों के आने से पहले भारतीय बाजारों में मांस का कारोबार नहीं होता था, उसके बाद होने लगा. जब बाजार में बिक रहा है तो लोग खा भी रहे हैं,पहले सिर्फ सिमित जातियां खाती थी, गंगा यमुना के किनारे बसे अधिकांश नगरों में तो सिर्फ शाकाहारी मिलता था. लोदियों के आने से वहां के व्यापारी भी आये,उनके रहने खाने के लिए सराय और होटल थे, पहले जिनमे सिर्फ शाकाहारी बनता था उनमे बाजार और समय की मांग के हिसाब से मांस भी मिलने लगा.

मुगलों के आने के बाद तो जनता भी इन जगहों पर जाकर खाने लगी, समाज ने समय समय पर उथल पुथल झेली हैं, अंग्रेज आये तो पूरा सिस्टम ही उनके हिसाब से होने लगा, नगरों गांवों कस्बों की बाजारों में उनके हिसाब से चीजें आने लगी, अब सामन अंग्रेजों के लिये आ रहा है तो सिर्फ अंग्रेज थोड़ी न इस्तेमाल करेंगे देखा देखी समाज भी करने लगेगा. जमीन में केले के पत्ते पर खाने वाला समाज अगर अचानक से थाली गिलास में राजाओं वाली फील लेकर खा रहां था तो उसकी भी अपनी एक वजह थी,पहले ये सामान बाजार में उपलब्ध नही थे बाद में होने लगे.

अंग्रेजों के साथ साथ ही चीनी मिट्टी के बर्तन भी बाजारों में आये और अंग्रेजों के जाते जाते भारतीय समाज अंग्रेजियत में सन गया था.

अब स्वदेशी का नारा जोरो पर था मगर हम यही भूल गए थे कि क्या स्वदेशी और क्या विदेशी, क्योंकि बनता सब यहीं था, घोड़ा गाडी बग्गी ट्रेन सब जरूरत का सामान था उसका बायकाट नहीं किया,लेकिन कुछ समय के लिए अंगरेजी सूट कपड़े छोड़ दिए,जगह जगह धोती कुरते में लोग दिखने लगे जो अंग्रेजों के समय में पेंट में आ गए थे, आफिस के क्लर्क जो पहले पतलून सिलवाते थे वह धोती में उतर आये. बाजारें बदलने लगी.

फिर प्रधानमन्त्री दर प्रधानमन्त्री बदले और हर बार एक नयी चीज देखने को मिली,बहुत धीरे धीरे वही अंग्रेजियत वापस आने लगी ,उसने आना ही ता, कारपेट कल्चर के नाम पर आज फार्मल ड्रेसेज का बोलबाला है,लेदर शूज पेंट शर्ट एक तरह से आफिस जाने की नेशनल ड्रेस बन गयी है,शायद ही कोइ धोती में नजर आता हो.

ये सब सामजिक उथल पुथल नही तो और क्या है, आज पिछले 5 सालों में अचानक बना सौहार्द शक के दायरे में नजर आता है,एक समय हासिये पर जा चुके आरएसएस के पंख दोबारा खुल चुके हैं अब वह अपने हिसाब से समाज तैयार करने में लग गया है. भीड़ में कुछ चीजें बोलना अब सच में डर का विषय है. क्या पता मार कुटाई हो जाये.

पिछले कई सालों से एक ही पेटर्न में जी रहे थे कोइ ख़ास बड़ा बदलाव नही आया था,मगर फिर से इतिहास खुद को दोहराएगा और हम किसी नए सामाजिक उथल पुथल में होंगे .

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *