गंभीर अड्डा

उत्तराखंड में सपना है रेल

मार्च 26, 2018 ओये बांगड़ू

उत्तराखंड में कांग्रेस और भाजपा ने जिस रेल के मुद्दे को कब्र में घुसा दिया है उसका रिपोर्ट रुपी भूत लाये हैं राजेंद्र नेगी उर्फ  “राजू पहाड़ी ” . लौंडयोलि की उमर में जब देश का युवा सवाल उठाता है तो समझिये की अच्छे दिन आने वाले हैं. “राजू पहाड़ी”की उत्तराखंड में रेल के सपने पर एक गम्भीर रिपोर्ट   

राजू पहाड़ी

चूल्हे से रोटी निकालनी हो तो चिमटे को अपना मुंह जलाना ही पड़ता है, रोटी खुद चलकर चूल्हे से बाहर नहीं आती। वैसे ही किसी(राज्य) को अगर उसका हक न मिले तो उसे(प्रदेश के लोगों को) अपने हकों के लिए संघर्ष करना ही पड़ेगा, बिना संघर्ष के अधिकार प्राप्ति सम्भव नहीं।

देश के उत्तरी राज्य उत्तराखण्ड में रेलवे की सेवाएं जगज़ाहिर हैं। अगर अंग्रेजों ने भारत पर 10-20 साल और राज किया होता तो शायद उत्तराखण्ड में रेलवे की स्थिति वर्तमान से बेहतर ही होती। क्योंकि ब्रिटिश शासन काल में ही टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन को मंजूरी मिल गयी थी, 1912 में सर्वे भी पूरा हुआ, उसके बाद टनकपुर से कुछएक किलो मीटर रेल पटरी बिछी भी थी और फिर देश आजाद हो गया। उसके बाद सरकारों ने इस काम के लिए आंखे बंद कर ली।

आजादी के पहले ही उत्तराखण्ड में दो रेल लाइनों(पटरियां) को बिछाने की बात चली थी। पहली कुमाऊं में ‘टनकपुर-बागेश्वर’ रेल लाइन(155 कि.मी.) और दूसरी गढ़वाल में ‘ऋषिकेश-कर्णप्रयाग’ रेल लाइन(125 कि.मी।)। पर आजाद भारत के राष्ट्र निर्माताओं ने इस ओर कभी ध्यान देने की जरूरत ही महसूस नहीं की।
सालों पश्चात आमजन के एक लंबे संघर्ष के परिणामस्वरूप 2006 में आजाद भारत में दोबारा इस रेल लाइन की सर्वे हुई। फिर 2009, 2010 और 2011 में पुनः सर्वे हुए, यूपीए ने इसे अपने राष्ट्रीय परियोजना में शामिल किया, और ठंडे बस्ते में डाल दिया। इस बीच भूगोल विज्ञानी डॉ जे.एल.साह ने इस रेल लाइन का नक्शा तैयार किया, 155 किमी की लाइन में जरूरी स्टेशन भी दर्ज किए। केंद्र को सौंपा, पर दिल्ली में इस नक़्शे पर धूल की परतें ही बिछती रही।
उत्तराखण्ड में रेलवे की इस स्थिति की जिम्मेदार आजादी से अब तक कि हर सरकार है, यद्यपि आजादी से आज तक के समय काल में कोंग्रेस ने ही अधिकतर पंचवर्षीय योजनाएं चलाई हैं, लेकिन मौजूदा केंद्र और राज्य सरकार ने भी उत्तराखण्ड में रेलवे विस्तार के लिए ऐसा कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जिसको लेकर कहा जा सके कि सरकार इस विषय के लिए चिंतित है।
दशकों से सरकार का ध्यान खींचने के लिए समय-समय पर शांतिपूर्वक आंदोलनों द्वारा बड़ी कुर्सी में बैठे लोगों तक राज्यवासियों ने आवाज पहुंचाने की पूरी कोशिश की, ये अलग बात है कि इन आंदोलनों को राष्ट्रीय मीडिया में कहीं भी जगह नहीं मिली। शायद इसलिए भी क्योंकि हम जाट और पटेलों की तरह इन आंदोलनों से सरकारी संपत्तियों का नुकसान नहीं कर पाए, कुछ निर्दोषों को मौत नहीं दे पाए, स्कूल की बसें और अस्पतालों के एम्बुलेंस नहीं जला पाए, यातायात बाधित नहीं कर पाए।
मुझे समझ नहीं आता हमारी सरकारें शुरू से ही सीमावर्ती क्षत्रों के विकास के लिए इतनी उदासीन क्यों रही हैं? जहां एक ओर चीन ने विस्तारवादी नीति के तहत अपनी हर सीमाओं तक रेल लाइनों और सड़कों को पहुंचाकर अपने सीमावर्ती क्षेत्रों को सुलभ किया है वहीं भारत सरकार की नीति इस संबंध में निराशाजनक ही है। आपको ज्ञात होगा कि उत्तराखण्ड राज्य की करीब 350 किलोमीटर सीमा चीन से लगती है। इससे पहले चमोली जिले के बराहोटी इलाके में चीन 2013-14 और 2015-16 में घुसपैठ की कोशिशें भी कर चुका है। यहां करीब 80 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में चीन अपना दावा करता रहा है। सरकार फिर भी उत्तराखण्ड के ऐसे सुदूर हिस्सों तक रेल जैसी मामूली सुविधा मुहैया नहीं करवा पाई। ऐसे में उत्तराखण्ड के पहाड़ी आंचलों और सीमावर्ती गांवों से पलायन बदस्तूर जारी है जो पूरे देश के लिए किसी संकट से कम नहीं।
वित्त वर्ष 2011-12 में खबर थी कि केंद्र ने ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन के लिए 4295 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी है, और इस रेललाइन का निर्माण पांच से सात साल के बीच हो जाना है। पर राज्य सरकार की सुस्ती के चलते ये पैसे अभी तक खर्च नहीं किये गए, भगवान जाने पैसे मिले भी थे या नहीं?
इसके बाद अप्रैल 2016 में समाचार पत्रों में ये खबरें छपी थी कि यह रेललाइन जोकि देहरादून(ऋषिकेश), टिहरी, पौड़ी, रुद्रप्रयाग, चमोली जिले से गुजरेगी इसके लिए वित्त वर्ष 2011-12 में बज़ट की स्वीकृति के बाद ‘रेल विकास निगम लिमिटेड’ ने चार सालों में सर्वे सहित अपने हिस्से के काम पूरे कर लिए हैं। अब जबकि 2012 से लेकर 2018 तक छः साल बीत चुके हैं और इन वर्षों में रेल लाइन एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पाई।
वैसे भी अब अगर भारत-नेपाल सीमा में पंचेश्वर बांध बनता है, जिसके निर्माण कार्य के लिए प्रदेश भर में विरोध के स्वर उठ रहे हैं, लेकिन फिर भी सरकार इसका कार्य 2018 से 2028 तक पूर्ण करने का मन बना चुकी है तो ऐसे में रेल लाइन का सपना-सपना ही रहना है। क्योंकि जहां पंचेश्वर पर बांध बनना है वहीं से रेल लाइन की सर्वे भी हुई है।

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