बांगड़ूनामा

पुन्तुरि

नवंबर 15, 2016 ओये बांगड़ू

पहाडी समाज के लोगों का असली मर्म समझने वाले तारामोहन पन्त की रचनाएँ अपने और इस समय के समाज की नब्ज पकडती रचनाएँ इन्हें समझने के लिए अलग से हिन्दी अर्थ देने तक की जरुरुत नहीं है .हिन्दी पहाडी में लिखी ये कहानियां दिल को छू जाती हैं.

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गोविन्द वल्लभ ज्यू इंटर कॉलेजक अंग्रेजी और गणितक मास्टर भै , भौते  कठोर स्वाभाव भै , पर मास्टर गज़बक भै , जैल उनन  थें पढ़ लि, जांणौ  वीक जीवन सुधरि  गै  । मास्टर ज्यूक ठुल  च्योल ले भौत  कुशाग्र बुद्धि वाल भै , हाई  स्कूल और इंटर में पुर जिल्ल में टॉप करी भै , अब अघिल कै पढ़ाई कारन हूँ जिल्ल  में क्वे स्कूल नि भै  । एतुक होशियार च्यालेकि जिंदगी खराब है जालि कबेर ऊँ उदासी  रुनेर भै , अब उनर  किस्मत कई जाओ या च्यालैकि , उनर पढ़ाई एक शिष्य धर्मानंद , जो लखनऊ में पी सी एस अफसर छी , उन्हेंहूँ भेंट करण  हूँ आई भै , बातचीत में वील गोविन्द वल्लभ ज्यूक हाल चाल पूछणक बाद नान्तिन्नक हाल पुंछिन  त उनूल आपुंण पीड बते  , धर्मानंद ज्यू गोविन्द वल्लभ ज्यू कनि अपूण बाब जस माननेर भै , उनर उपकार भै , त धर्मानंद ज्यू , मास्टर सैपक च्याल हरिदत्त कनि आपुंण दगड लखनऊ लि गै और वीक एड्मिसन वां विश्वविद्यालय में करै  दे  ।

हरिदत्त त उसीके होशियार भै , धर्मानंद ज्यू  वीक  बुद्धि देखिबेर प्रभावित  छी , त,  बी ए करण क  बाद उनूंल  हरि के आई ए एस परीक्षा में बिठै दे , और हरि पैल बखतै में सिलेक्ट है गे , और ट्रेनिंग करण लागि गै  । धर्मनद ज्यूक ठुल भै पीताम्बर ज्यू सीनियर आई  ए एस  अफसर भै , उनर चेलि ममता ले सिलेक्ट हई भै और हरिदत्तक दगड ट्रेनिंग में भै , चेलि बेउण  हैगे , पीताम्बर ज्यू कनि, हरिदत्त भल जोड़ दिखाई दे , उनलि  धर्मानंदजयूक मार्फ़त बात चलाई त रिस्त  पक्क है गे  ।

भली कै ब्या ले हैगे , पीताम्बर ज्यूल मस्त दान दी , पर गोविन्दवल्लभ ज्यू के नि लिगै , विद्वान छी त समझ गईं कि ब्वैरि कान्वेंट स्कूलेकि पढ़ी छ , पहाड़ कभै देखी नि भै , त वां तैक मन नि लॉग , शकुन करणक  लिजी , ब्वैरि गौं लाई , पर तिसर दिनै च्याल- ब्वैरि कंन लखनऊ पठै देछ  । घर  पण्डितान्जयूलि कतुकस्यूंण  देखि भै , ब्वैरि आलि त  यस करुन , उस करून , पर मोरक मुकुट बांध्यै रैगे  ।

बाद में हरिदत्त इज -बाब कनि बुले लिगै , आलीशान कोठि मिलि भै लखनऊ में , नौकर चाकर , खानसामा सबै  भै , पर बुड – बाडीनेकि  आफत ऐ गे , गोविन्द वल्लभ ज्यू धोति बदल बेर खानेर भै और केवल पण्डितान्जयूक हाथक  ! रस्या में कुकिंग टॉप भै, असज है जनेर भै , खानसामा क्रिश्चयन भै  , द्वी दिन त जसी तसी कटि गै , तिसर दिन धर्मानंद ज्यूक वां खाणक  न्यूत  छी, बुड-बाडि , वां जाइ भै , रात डिनर टेबल में , खांण शुरू भै त ब्वैरिल हरी थें कै :

ममता : हरी डार्लिंग  ! व्हाई युवर पैरेन्ट्स अार सो हिपोक्रेटस ?

हरि : व्हाट हैपेन्ड ?

ममता : यू नो ? जॉन ( खानसामा ) बता रहा था , दैट ओल्ड लेडी वाज  कुकिंग  हरसेल्फ , और उसको छूने से मना कर दिया , यार ! इट्स एम्बैरेशिंग , अगर जॉन नाराज हो गया और काम छोड़ गया तो , यू कांट फाइन्ड सच एन एफिशिएंट  कुक  !

हरि : ओह ! कम आन डार्लिंग , दे  आर युअर फादर एंड मदर इन लाज , बियर विद  देम ,यार वो हमेशा के लिए यहां नहीं रुक रहे

ममता : डार्लिंग ! प्लीज अंडरस्टैंड , ऐसी प्रिमिटिव सोच से बात नहीं बनेगी , आई एम नाट अगेस्ट दम ,  उनको ये अन्टचेबिलिटी अब छोड़ देनी चाहिए , एम आई रॉन्ग ?

हरि ( बात का पटाक्षेप करते हुए ) : ओ के ! आई विल मैनज

और दूसर दिन जब बुड – बाड़ी वापस आईं त गोविन्द वल्लभ ज्यू जाँणी कसि समझ गै कि कुछ गडबड मामूल छ , उनेल हरिदत्त थें के :

गोविन्द वल्लभ ज्यू : हरि ! च्यला ! आज हमर टिकट करै दे , भौत दिन है गईं घर छोड़ि ,

हरि : किले बाबू ! तस किले कूँणौंछा , के गलती है गे मैं थें ?

गोविन्द वल्लभ ज्यु : नै च्याला ! क्वे गलती नि करि त्वील  और ब्वैरिल , बस  अब गोर बाछनेकि याद ऊंनै , नानतिन जस पालि भै , निश्वासी गै हुनाल , फिर तेर नान  भै ले आजि नानै भै , वीक भरौस एतुक ठुल गृहस्थी छोड़ी ऐ रयां , भगवान चालो फिर ऐ जून , अब त सार ले ऐ गे देश उनैकि

हरि नै  !  नै  ! कूँण में रैगे पर गोविन्द वल्लभ ज्यूल हद्द जसि हाण  दे , और उ रात , बुड – बाड़ी पहाड़ हूं हिट दीं

कतुक साल बीति गे , नान भैक ब्या में एक दिनाक लिजी हरि घर आ , इज – बाब थें माफि मांगण लागि , बौज्यू दूरदर्शी भै , वीक मनोदशा समझनेर  भै , उनैलि हरि कें समझै  देछ  ।

फिर चार पांच साल बाद गोविन्द वल्लभ ज्यू स्वर्ग सिधारी गै , नान ब्वेरि ले च्योल हुण में खत्म है गे , नान च्योल पगलि जस गै , घर बटि भाजि गै , वीक पत्ते नि  लाग  , पण्डितान्जयूक ख्वार बज़र  जस पडिगे , नानू  भौ कें  रुवाक बातैली  दूध पिऊँनेर भै , जसि-कसी पालि बुढ़ियैलि  छोर-मूल्या ,

अापूण नान्तीनां में और काम में हरिदत्त एतुक व्यस्त हैगे , कि उ कभे घर नि जै  सकि , पचास रूपैंक् मनीआर्डर हर महैंण  घर भेज दिनेर  भै , न कबै वील चिठ्ठी  भेजि , न वील कबै पाई  ।

हरिदत्तक पड़ौस में पाण्डेज्यु  रनेर भै, पुलिस विभाग में डिप्टी  एस पी भै , ऊ हरिदत्तक  गौंक नजदीकक गौंक भै , उनर नौकर पहाड़ी छी , रत्ते ब्याँण उ नौकर हरिदत्तक घर पूजि, घंटी बजै , त  हरिक नौकर एक पुन्तुरि  लिबेर भितर ऐ , मेम सैप जिम जाईं भैन , हरि अखबार पदन में लागि छी , वील नौकर थें पूछौ ,” कौन है ?”

नौकर : पांडे जी का नौकर है सर ! कह  रहा था आज ही पहाड़ से लौटा है , एक सिला हुआ थैला  लाया है  !

हरी : दिखाओ !

नौकर पुन्तुरि लि बेर हरियाक सामुनि ठाड़  हैगे , हरियैली पुन्तुरि देखि , एक मैल कपड़ाक टुकुड कनि म्वाट काल धागैलि  सिलि बेर पुन्तुरि बड़ाई भै , पत्त मेँ काल स्याहील लिखी भै ” पं हरिदत्त जी को मिले ” , हरियल नौकर थें कै ,” देखो इसमें क्या है ? ”

नौकर पुन्तुरि खोली बेर : सर ! इसमें ऊपर से कुछ ब्लैक बींस हैं , बाक़ी नीचे दबा हुआ है ”

हरिदत्त : अच्छा देखो, इन बींस की दाल बनाने को कहो खानसामा से और अगर कुछ और हो तो उसको भी कुक करके लाने को कहो !

नौकर : सर ब्रेकफास्ट तो रेडी है , मैंम साहब  आ जाएँ तो मैं सर्व कर दूँगा

हरिदत्त : मैं जितना कह रहा हूँ उतना करो ।

और नौकर  न्हेगे , हरि अखबार पढ़न  में लागि गै , आदु घंट बाद , खानसामा ट्रे में में द्धि मड़ुवाक रवाट , और अखोडैकी गिरी सजाई बेर ली ऐ

खानसामा : हेयर इज युअर ब्रेकफास्ट सर ! बड़ी मुश्किल से ये चपाती बना पाया हूँ , एण्ड सम वॉलनट्स सर ! , और सर देअर  इज इ लैटर आल्सो हिडन बिलो आल द आइटम्स सर !

ट्रे बटी चिठ्ठी उठै बेर हरिदत्त पढ़न  लागि ,

ऊँ श्री गणेशाय नाम : ग्राम देवताय नाम :, गोलू देवताए नाम:

” सिद्धी श्री सर्वोपमा योग्य श्री ६ पूज्य जेठ्बाज्यू  और पूजनीया जेडजा के चरणतल पालनीय को नमस्कार और पैलागो, प्रथम जतन  देह को करला तबै हमारि  पालना होली , सब भै बैणिन कं पैलागो व् आशीर्वाद , अत्र कुशलं तत्रास्तु  , याँ पन  कुशल ठीक छू , आपूँ लोगनक  लिजी  भगवती  थें  प्रार्थना छु  ।

( अघिल कै  आम कुनै ) प्रिय च्याल हरि और ब्वैरी कण, म्योर आशीर्वाद और नानां कण ले खूब आशीष भै , कतुकै साल हैगई , त्वे  चिठ्ठी लिखण में आज-भोल  हैगे , मैंकण  लेखण उनेर नि भै और गौ में क्वे कण  फुर्सत ले नि भै , फिर आपुंण क्वीड़ ले कै – कै  सामुण  कईनेर भै ? अब जब यो छनु लेखन सीखि  गै त , आज यो चिठ्ठी भेजण  लागि ऱयूँ , त्योर  काम ठीक चली रै  हनोल, ब्वैरी ले नौकरी वालि  भै त परेशानी हून  हुनेल  ।

आज चिठ्ठी लेखनक कारण यो छू कि जब तक तयार बाब छी त में के फिकर नि रूंछी , नान ब्वैरी ले छनुवाक हुन  दिन ये कं छोड़ि गै , येक  बाब वीक दू:ख में पगली जस गै  और घर छोड़ी भाजि  गै  , कां  छ कस छ क्वे पत्त  नहान, जसी तसी यो छोर-मूल्या पालि मैल , आपुण  खाई नि खाई पाली भै , के करूँ वंशक अंश भै , अब च्याला में भौतै बुडी  गयूं ,त्यार  बाब ज्यूँ हुना त येक  पढ़ाई देखन , होशियार  त यो तेरे जस भै, पर क्वे देखनीं नि भै, घरक सब काम योई  करनेर भै , स्कूल ले जानेर भै , परार साल त्यार  माम  एक गोरु दी गैछी , थवाड़  धिनालि जस है जाछि ,  अब गोर ले छण – मण  करैछ, मण  द्वी मण  दूध दिनेरै भै , धान बोइन त ऐल साल अत्ति डाल पडि  गै  , सब ख़तम  है गै  !

छनु कें अब में नै  थाई सकनूँ , गौंक बिरादर हर बखत खिजै दिनी , यो आपुण इज बाबनक बार में मैथे पूछूं  अब में के  बतू, गौ वाल एके त्यार  लिजी ले खिजूनी , यो घर ऐ बेर मैं थें कजी करूँ  , के  कूँ ?  मैं रान  हूँ त काल ले हरै गौछ  ( आम कूँणै ) च्याला नक जन मानिए पर ये केन आपुण  दगड लि जाने त यो ले मैंस  बणी जान , म्योर के छ कबख्तै आँख निमि जाल त यो के करल , ? यो याँ नि ले होलो त बिरादर मैं कनि फुकी दयाल, ततुक कमाई त्यार बाबुलि करी भै , क्वे  न क्वे किरी ले करि द्योल  ( आम कुनै ) बस तु एकनि लिजा बेर  मैंस  बने दे त मैं भली कै मरि सकुन  , त्यार घर में एक कुण में खेती रौल , सिध छ  , तेरि सेवा ले करल , त्योर भतीज भै त अघाण  , छोर -मुल्या  !

च्यला , नानछना तकैं जे भल लांगछी ,ऊ भेजण  लागि ऱयूँ , थ्वाद मड़ुवक् पिस्यु , खाज , मणि भट – गहत , भांग, अखोड़  एक भुड गडेरिक छ , यो तां  नि हुन बल , खै लिये , भ्यार खितण होलो त पाण्डे ज्यूक नौकर कें दि दिये , बर्बाद जन करिए भागी ! बड जतन करि उपजाई भै  ।

तेरि अभागि इज  ! ( दस्खत आमा की तरफ से आपका आज्ञाकारी )

जस -जस चिठ्ठी पढ़नेर भै  हरियाक आँखेन  बटी आँसुनैकि तौड़  बगण  लागि  ” ऊँ  ! ऊँ  !! करि बेर डाड  हालण  बैठ, नौकर चाकर हकबकाई गै  , एक नौकरैल, जिम में फोन करि मेमसैप  थें कै , तब तक  हरिदत्त चम्म उठि  बेर धिंगाड़ बदल बेर ड्राइवर ली बेर जाने रौछ, नौकर थें कै गै  कि मेम साहब से कह देना कि साहब अचानक पहाड़ को चले गए हैं  ।

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