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प्राइवेट नौकरी का दर्द

अप्रैल 14, 2019 ओये बांगड़ू

प्राइभेट नौकरी भी बाखड भैंस की जैसी धिनाली ठहरी साहब . दूद मिलेगा लोट्टी में और भैंस की खांण खुराक पूरी देनी हुई . बीच बीच में भैंस की लात भी खानी हुई .  भैंस यहां पर आप आप अपने मालिक या बौस को समझ सकते हैं . अब हम हिन्दुस्तानी ठैरे . हम तो ये सोचकर सन्तोष कर लेते हैं कि दूदयाल गोरू की लात ही सही . इसे वो ही समझ सकता है जो प्राइभेट नौकरी में भेल घोस रहा हो . भेल में चिमाड पड जाते हैं और इसका कोई उपाय भी नही है . अगर आप सोचो सरसों का तेल चुपड के कुछ राहत ले लो पर उससे भी चरपिरी जैसी ही लगेगी . अगर तेल बाबाजी वाला हुवा तो सम्भव है आप कुछ देर तशरीफ टिकाने लायक ना बचें . आप छटपटाहट में कुछ ऐसे मटकेंगे लगेगा ढिंचैक पूजा का नया एलबम प्रमोट कर रहे हो .

वापस मुडते हैं मूल समस्या पर . आप बॉस का  काम करते हैं तो ये आपका फर्ज कहलाता है और बौस जो तनख्वाह देगा वो उसका एहसान  ठैरा . ये मैं नही कह रहा भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता के उपदेश के बाद ये रफ नोट पकडा गये थे . आप दस मिनट लेट आते हैं तो ये आपकी आफिस के प्रति काम के प्रति लापरवाही है और बौस एक घन्टा रोक ले तो ये तो आपकी ड्यूटी ही हुई . काम के समय काम कम किया होगा टारगेट पूरा करना है वगैरह वगैरह .

आफिस का कर्मचारी बौस की नजरों में सभी पारिवारिक बन्धनों से मुक्त एक ऐसा मानव है जिसको एक निश्चित तनख्वाह में बौस द्वारा पूर्णत: ,खरीद लिया गया है . उसे घूमने फिरने घर के काम करने वीकएन्ड पर एन्ज्वाय करने का हक कतई नही है वह तो निस्वार्थ एवं निश्काम भाव से अपने काम के प्रति सोचे . आफिस की बौस की तरक्की सोचे. उसका जीवन तो व्यर्थ है ही . अब व्यर्थ जीवन में सोचकर क्या ककडी के गूदे छील लोगे .

प्राइभेट नौकरी वाले ये बात गांठ बांध लें और ये विचार मन से भ्योल घुरया दें कि आपको कोई कष्ट है या आप को जीवन में कोई समस्या है . क्योकि आपके बौस को आपसे ज्यादा समस्याए हैं . अगर आपकी तनख्वाह कम है तो आफिस की आमदनी तो बिलकुल भी नही है मतलब आफिस के जाड. बिलकुल सूख चुके हैं आपकी तनख्वाह भी बमुश्किल निकल रही है . ऐसा भी हो सकता है आपने बौस से एक लाख एडवांस की डिमांड कर दी तो मालूम पडा बौस को तो दस लाख की जरूरत है उसने ब्याज पर लिया है दिवाला निकला है होला निकला है ईदा निकला है वगैरह वगैरह .  आपको घर पर काम है तो बौस को और भी जरूरी है अगर ना करे आज ही नान बेलेबल वारंट निकल जाय . अगर आपको अपने पिताजी का चश्मा बनवाना है तो बौस के पिताजी आँखों के आपरेशन के लिए आपरेशन थियेटर पर बैठकर उसके आने का इन्तजार कर रहे हैं ताकि उनका लडका आये दस्तखत करे और आपरेशन चालू हो .

अगर आपने आफिस या काम ज्वाइन करते वक्त किसी नियम पर शर्तों पर दस्तखत किये हो तो उनमें कतई ढील की ना सोचें . वह शर्तें गाहे बगाहे आपके टांग रघोडकर घरती पर रखने के लिए होती है अगर कुछ शर्तों पर आपने ज्वाइन किया है तो उनके उपयोग का खयाल दिल से निकाल दें .  आखिर भाईचारा या आपसी सम्बन्ध भी तो कोई चीज हैं . बौस आपका अपना है उसको शर्तें याद दिलाकर बौस को काबू करेंगे … पागल हो क्या ऐसा कहीं होता है …??

तनख्वाह बढवाने का जिक्र भी ना करें . वैसे भी तनख्वाह कितनी बढवा लोगे  . बढवा कर भी एक पनवाडी से कम ही होगी फटीचर थे फटीचर हो और रहना भी फटीचर ही है . इसके साइड इफैक्ट बहुत ज्यादा हैं फायदा कम .  अब गलती होने पर आपकी बढी हुई तनख्वाह आपको बार बार याद दिलाई जाएगी गोया कि आप भक्त हो और आपका बौस एक संत जो आपको बार बार भगवदभक्ति की याद दिलाये

इसलिए कहा है –

कर चले हम फिदा अपने भाँट् साथियो …

आब तसीके आपुण दिन काट् साथियो ..

 

(प्राइवेट नौकरी वाले पाठगकगण अपने बाँस को जरुर टैग करें .निर्मल बाबा की कृपा प्राप्त होगी )

 

लेखक – विनोद पन्त ‘खन्तोली ‘

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