बांगड़ूनामा

पहचान- अमृता प्रीतम

जनवरी 3, 2019 ओये बांगड़ू

तुम मिले

तो कई जन्म

मेरी नब्ज़ में धड़के

तो मेरी साँसों ने तुम्हारी साँसों का घूँट पिया

तब मस्तक में कई काल पलट गए–

 

एक गुफा हुआ करती थी

जहाँ मैं थी और एक योगी

योगी ने जब बाजुओं में लेकर

मेरी साँसों को छुआ

तब अल्लाह क़सम!

यही महक थी जो उसके होठों से आई थी–

यह कैसी माया कैसी लीला

कि शायद तुम ही कभी वह योगी थे

या वही योगी है–

जो तुम्हारी सूरत में मेरे पास आया है

और वही मैं हूँ… और वही महक है…

 

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