यंगिस्तान

पिथौरागढ़- मेरा शहर बदल रहा है

फरवरी 24, 2017 Girish Lohni

याद से ही याद आता है, अपना शहर हर किसी को रास आता है. वैदिक काल से
अस्तित्व में रहा पिथौरागढ़ 24 फरवरी 1960 को चीन से भारत की बेहतर
सुरक्षा के लिहाज से अल्मोड़ा से अलग होकर पूर्ण जिले के रूप में अस्तित्व
में आया. बीते साल की याद से पिथौरागढ़ के संबन्ध में अपने दिमागी और
वास्तविक चित्रों को उकेरने की कोशिश भर की है।

एक अरसे बाद पिछले साल अप्रैल में पिथौरागढ़ जाने का मौका मिला. दिल में
एक तस्वीर ले चला था, उस जगह की जहां अपनी जिंदगी के पहले 17 साल गुजारे
थे. मेरे बचपन और मेरी जवानी के शुरुआती साल की यादों से भरे, 4 साल से
अनदेखे मेरे अपने शहर में दर्जनों सवालों संग प्रवेश किया था मैंने.
सवालों से ज्यादा जिज्ञासा थी और जिज्ञासा से ज्यादा उत्साह था. ऐचोली से
नीचे आ चुकी कंकरीट के मकानों की बाढ़ ने जहां मेरी आँखों के परदे को
एक्सिलेटर दिया तो ऐचोली पुल पर ही जाम की भीड़ ने गाड़ी को ब्रेक दिया.
एक समय शांत-हरे-भरे ऐचोली में आज हर कोई जल्दी में था। हर किसी को दूसरे
से आगे बढ़ना था. मेरी तस्वीर के सबसे निचले हिस्से जिसमें पुल से थोड़ा
पीछे की तरफ से सकरे रास्ते पर पीठ पर घास लिये महिला-पुरुष पैदल जाते थे,
पर आज भीड़ और हल्ले का ब्रश चल चुका था.

कुमौड़ बैन्ड तक पहुँचते हुवे सिर से पैर तक दिखावे के कपड़े पहनी यह भीड़, मेरे शांत शहर वाले चित्र पर लगभग तीन जाम रूपी ब्रश रगड़ चुकी थी. जाम लगने पर मैं ख़ुश हूँ कि
दुखी, इसी दुविधा में उलझा घर की ओर बढ़ा. एक अजीब खामोशी से गुजरता हुवा
मोहल्ले की गली से गुजरता अपने ही घर की घंटी बजाना बहुत अटपटा सा लगा.
हमेशा दिन के समय खुले गेट के आंगन में कभी बच्चों, कभी बूढ़ों, कभी औरतों
की पंचायत लगाने वाला मेरा आंगन आज सूना था. बंद गेट के सामने मेरे घर से
सास-बहु के टीवी सीरियल, बगल के घर से पोगो चैनल की तो कही दुसरे घर से
सावधान इंडिया की आवाजों ने मेरे अपने घर में मेरा स्वागत किया. इस
उम्मीद में की मेरे आने की आहट ने कहीं तो खल्ल्ल डाला होगा जल्दी से
नहा धोकर आंगन की धूप में गेहत की दाल और भात लिये लम्बी सी बेंच पर जा
बैठा. गले से निवाले जाने थोड़े मुश्किल थे क्योकि आज मेरी थाली में किसी
के घर की छाछ का गिलास, किसी के घर के रायते की कटोरी, किसी के घर का अचार, किसी के घर का ताजे घी की जगह सबकुछ अपने ही घर से मौजूद था. घर वाला खाना तो था पर
मौहल्ले का तडका कही मिसिंग था.

खैर लंबे अरसे बाद पहाड़ में पहाड़ी खाने का स्वाद आपकी सभी शिकायतो को दूर करने के लिये काफी होता है. मेरे अपने चित्र से अलग इस नये चित्र को खाने के स्वाद ने बिना ज्यादा सवालों के शामिल कर  लिया. पर शाम होते ही मेरे बच्चों से भरे रंगीन चित्र में सन्नाटे का
साया पड़ गया. इस सन्नाटे का दोषी कौन था? बच्चे जो अब घरों से बाहर खेलते
ही नहीं. स्कूल या मोबाईल जो उन्हें खेलने से रोकते हैं. वो मां-बाप जो
बच्चे पैदा कर दूसरों की देखा-देखी में अब बस अपने बच्चों की जरुरत
जुटाने में मसगूल हैं. या मैं खुद को दोष दूं जो शायद अब भी अपने शहर को
अपने ही चित्रों में देखने की चाह रखता हूँ. सवालों के घेरे में अप्रैल
के महीने में रात को पंखा चलाने की मजबूरी के साथ पहली रात तो कट गयी पर
एक नये चित्र के साथ.

तय कार्यक्रम के अनुसार सुबह की पहली चाय स्टेडियम के पास वाले होटल में
होनी थी. कभी बाघ और भूत की मनगढ़न्त कहानियों के लिये प्रसिद्ध कुमौड से
हनुमान मन्दिर होता हुवा डाकपुल तक का सफर जिंदगी में पहली बार पालतू
कुत्तों के डर के साथ तय किया. भूत और बाघ के होने की गुंजाइश शहर के
कंकरीट के जंगलो ने समाप्त कर दी थी. एक नये एक एहसास के साथ होटल पहुचा.
मेरी उम्मीद के चित्र में यहां अभी पसीने से तर लड़कों का समूह होना था।
किसी के हाथ में नगद वाली तो किसी के हाथ में उधारी के खाते वाली चाय
होनी थी. कड्क ताजे फेन के दाँतों से टूटने की आवाज मेरे चित्र को पूरा
कर देती. अपने चित्र के इंतजार में होटल के कोने की कुर्सी पकड़ में
स्टेडियम की अपनी यादों में पहला गोता लगा ही पाया था कि जै बाबा बरमानी की
एक आवाज ने मुझे घसीटकर यादों से बाहर फैंक निकाला. सामने एक टेबल छोड़
मुश्किल से 7वी या 8वी में पढ़ने वाले बच्चों के एक समुह में बड़ी कलाकारी
से माचिस की दो तीलियों के बीच कुछ जलता नजर आया.

मैं जानता था की जलने वाली वो चीज क्या थी. पर मुझे जिसने परेशान किया वो था उसको जलाने वाले की उम्र. इससे पहले की मैं कुछ बोलता सलाह दी गयी कि चुपचाप अपनी चाय पर
ध्यान दूं. इस उम्र में जिस तरह से उन बच्चों ने एक-एक कश ली वो वाकई
डरावना था. पूरे दिन में इस उम्र के साथ अलग-अलग उम्र के कयी चेहरे कहीं
बाबा बरमानी के, कही बाबा के, कहीं भोले के, कही भोले बाबा के जयकारे के साथ यही करते नज़र आये. देर शाम अपना रुख चाय की इन दुकानों से दूर चन्डाक की ओर किया. किसी समय
यहां से सबकुछ हरा-भरा-खुला-खुला सा दिखता था आज मिठाई के डिब्बे जैसे
सटे घरों के अलावा कुछ नहीं दिखता. इन डब्बों पर खुश होना चाहिये की कुछ
ओर अभी तक अंदाजा नहीं लगा पाया हूँ. मैंने शहर की बिजली की रौशनी में
नहाती कई शानदार तस्वीरें देखी है पर मुझे इंतजार है बिना बिजली के इन
डिब्बों का चाँदनी रात में नहाती किसी एक तस्वीर का. पूरे दिन के चित्रों से
जद्दोजहद के बीच कभी ना बदलने वाली पिथौरागढ़ की चाऊमीन की दुकान का
ख्याल आया तो सीधा मुड़ गये गाँधी चौक की ओर.

चाऊमीन के सूप की पहली घूँट ली तो पहली वो चीज मिल गयी जो वैसी की वैसी थी जो मेरे ख्यालों में थी. चाऊमीन का स्वाद दिन के डरावने चेहरों को मिटाने को ही था कि एक दोस्त ने
चरस द्वारा शरीर को होने वाले नुकसान पर बहस छेड़ दी. मैं हैरान था कि
कैसे एकाएक ही दुकान में बैठे लगभग सभी चरस की वकालत पर उतर आये थे. 19
वी शताब्दी के अंत में अँगरेजों द्वारा चरस की खेती को भारत में कानूनी
बनाने के लिये चरस के प्रयोग पर जारी की गयी रिपोर्ट से लेकर शराब की तरह
चरस के चलन को भी कानूनी तरह से समाज में चलाने की जुगत में लगी ड्रग
कंपनियों द्वारा जारी तमाम शोधों की रिपोर्ट खोज निकाल दी गयी.

अपने तथ्यों को सही ठहराने के लिये एक जनाब ने बंगाल के गवर्नर राबर्ट क्लाईव
की चरस के उपयोग से हूयी मौत तक को आत्महत्या साबित कर दिया. बेतुकी बहस
के आठ बजे तक चले एक लंबे दौर ने मैं मुर्ख से अधिक कुछ भी साबित नहीं हुआ.
खैर अब आठ बजे के बाद गाँधी चौक से सिल्थाम के बीच कुछ दुकानें खुली रहती
हैं. सड़को के किनारे अब अधिकांश स्ट्रीट लाईट जगमगाती हैं. देवसिह का
फिल्ड अब एक मनमोहक फुटबाल ग्राउंड में तब्दील हो चुका है.आँखों के
अस्पताल की ओर पीठ लगा धुवां उड़ाने वालो की सख्या अब बढ़ गयी है लेकिन धुआं उड़ाने वालों की उम्र घट गयी है. एक ही समय एक ही घर से समाचार और टीवी सीरियल दोनों की साथ में आवाज बिना किसी की आवाज के भी बहुत कुछ कह जाती हैं. अच्छा की बुरा पर मेरा शहर बदल गया है।

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