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राष्ट्रभगति कोई दवा नहीं जिसे इंजेक्शन से भर दो

दिसंबर 2, 2016 ओये बांगड़ू

मैं नहीं जानता मेरे पिता ने मुझे सही सीख दी या नहीं. पर बचपन में एक पाठ, उन्होंने मुझे जरूर पढ़ा दिया था कि जब तक आप किसी का ह्रदय से सम्मान ना करो उसे प्रणाम न करना। इज्जत ह्रदय से आती है और बेमन से किया सम्मान केवल ढोंग है. सुप्रीम कोर्ट का राष्ट्रगान सम्बन्धी निर्णय पढ़, पिता के उस पाठ की याद आ गयी. क्या राष्ट्रभगति कोई दवा नहीं जिसे इंजेक्शन से भर दो राष्ट्रभक्ति इतनी कठिन हो गयी है कि उसे सुप्रीम कोर्ट के फरमान के द्वारा थोपा जाये। या इतनी सस्ती हो गयी है कि राष्ट्र-गान के समय खड़ा होना किसी की राष्ट्र-भक्ति का प्रमाण माना जायेगा। आखिर किस समाज में जी रहे है हम?

मेरा विरोध किसी निर्णय से नहीं। ना ही न्यायालय के निर्णय की अवमानना करना मेरा लक्ष्य है। ना ही इस बात पर मेरी दोराय है कि राष्ट्र-गान के समय सभी भारतीयों को सम्मान स्वरूप खड़ा होना चाहिए। लेकिन क्या इसके लिए भी नियम बनाने की आवश्यकता है? अगर यही था तो संविधान में मॊलिक कर्तव्यों को शामिल करते समय स्वर्णसिंह समिति की अनुशंषा अनुरूप मौलिक कर्तव्य के पालन न करने वालो हेतु दंड का प्रावधान रखा जाता। चलो छोड़ो बस इतना बता दो क्या १२५ करोड़ की आबादी वाले इस देश का राष्ट्रगान किसी के सम्मान का मोहताज रह गया है? जो नियमों के द्वारा उसे अब सम्मान दिलाया जाएगा। खेद का विषय है, खुद को स्वमेव-महाशक्ति राष्ट्र घोषित कर चुके भारत के राष्ट्रगान को आज सम्मान के लिये नियमों की आवश्यकता पड़ी है।
नियम भी कैसा यदि आप मनोरंजन चाहते है तो पहले राष्ट्रगान का सम्मान करके दिखाओ। हास्यास्पद है. आज तक सुप्रीम-कोर्ट ने ये नियम नहीं बनाया की यदि सरकार प्रत्येक व्यक्ति को एक समय का भोजन उपलब्ध न करा पायी तो उसे सरकार से बर्खाश्त कर दिया जायेगा। उसकी राष्ट्र भक्ति पर प्रश्न नहीं उठाया जाता जब सुप्रीम-कोर्ट के परिसर तक में छोटे-छोटे बच्चे चाय बेचते है. तब प्रश्न नहीं उठाया जाता जब हर रोज कई माँ सड़क पर बच्चे को जन्म देते देते मर जाती है. तब प्रश्न नहीं उठता जब सरकार की गलत नीतियों के कारण हर रोज किसी की जान जाती है और आगे भी जाती रहेगी। वर्तमान नोटबंदी के निर्णय के कारण हुई लोगों की मृत्यु पर सुप्रीम-कोर्ट ने अब तक केंद्र सरकार से जवाब नहीं माँगा।
सवाल ये नहीं है कि राष्ट्रगान के समय खड़ा होना चाहिए या नहीं। सवाल ये है कि ये पैमाना कौन सा है जहाँ किसी की राष्ट्रभक्ति नापने का पैमाना राष्ट्रगान के समय खड़ा होना है? अगर यही पैमाना है तो फिर सार्वजानिक स्थान पर कही भी थूक देने वालों को क्यों न राष्ट्रद्रोही करार दिया जाय ? सवाल ये है कि जब सरकार के नीति-निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए कोई नियमावली नही है तो नागरिकों के मूल-कर्त्तवों के लिए नियमावली कैसे हो? सवाल ये है कि यदि सरकार अपने कर्तव्यों के पालन में विफल रहती है तो उसे कोई दंड नहीं तो आम-नागरिक के विफल होने पर दंड क्यों? सवाल ये है कि क्या अब देशभक्ति का संचार लोगों में नियमो के द्वारा किया जायेगा?
राष्ट्रभक्ति कोई दवा नहीं जिसे आप नियमों के इंजेक्शन के सहारे अपने नागरिकों की नसों में घॊल देंगे।
राष्ट्रभक्ति एक भाव है जिसे खड़े होकर नहीं ह्रदय में सजों कर रखा जाता है. और जब आप ज़बरन इसे नियमों के तहत लागू करना चाहते है तो ये भाव का कोई मोल नहीं रह जाता। नियमों की जंजीरों ने हमेशा एक कट्टरपन को जन्म दिया है और राष्ट्रभक्ति तो एक भावना है. भावनाओं को जितना खुला आकाश देंगे वो उतना उड़ेंगी, उतनी महकेंगी.

(यह लेख पिथौरागढ़ से गिरीश ने लिखा है)

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