बांगड़ूनामा

परी

नवंबर 5, 2016 ओये बांगड़ू

प्रेरणा गुप्ता की ये कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित है. कई बार हमारे आस पास का माहौल हमें हमारे खोये हुए अपनों का एहसास करा देता है. वह एहसास किसी में भी हो सकता है फूल पत्ते पंछी तितली.

वो दिन नहीं भूलता, जब सुबोध और मिताली के आँगन में प्यारी सी, नन्ही सी गुड़िया ने जन्म लिया था | उसके आने से उनके आँगन में खुशियों के फूल खिल उठे और महक उठे थे उनके अरमान | उसकी किलकारियों से उनका घर गूँज उठा | उन्होंने अपनी प्यारी सी गुड़िया का नाम परी रखा | उसका जैसा नाम था, उसी के अनुरूप उसका रूप भी था | उसकी रेशमी पलकों में सजी बड़ी – बड़ी बोलती आँखे मानो बिना कहे ही कुछ कह जाती थीं | गुलाबी आभा लिए उज्जवल चांदिनी सा खिला चेहरा काले घुँघराले बालों में आकर्षित करता था | जब वह अपनी नाक चढाते हुए मुस्कुरा के अपने मोती जैसे दाँत दिखाती तो सुबोध और मिताली उल्लास से भर उठते | धीरे – धीरे समय के साथ, परी की हर मनमोहिनी मुद्रा के एक – एक पल को उमंग के साथ बिताते हुए वे जीवन का उत्सव मानते जा रहे थे |

अभी उनकी परी का बीसवां बसंत भी पूरा नहीं हुआ था कि एक दिन अचानक सुबोध और मिताली के जीवन में भयंकर तूफान आया और उनकी खुशियों की बगिया को तहस – नहस कर गया | उनकी परी ने कॉलेज जाते वक्त भीषण सड़क दुर्घटना में घटनास्थल पर ही अपना दम तोड़ दिया | परी की मौत उनके जीवन में सदा के लिए अमावस की काली रात लेकर आई थी | वे मृत समान हो गये थे, बस सांसे चल रही थीं | जीवन जीने की कोई चाह नहीं रह गयी थी | जीवन के सारे रंग बिखर कर धूमिल हो गये थे |

आज छः महीने बीत गये थे परी को गये हुए | सुबोध और मिताली मंदिर से कार में लौट रहे थे |   शाम हो चली थी | हल्की – हल्की बारिश की फुहार पड़ रही थी | साथ ही सूर्य भी अस्त हो रहा था | सूर्य की किरणें उनकी कार के शीशे से लगातार टकराती हुई आँखों में चौंध मार रही थीं | तभी अचानक कार के शीशे पर सामने से एक बहुत खूबसूरत सी तितली आकर चिपक गयी और जोर – जोर से पंख फड़फड़ाने लगी | उसकी हरकत से ऐसा लग रहा था कि जैसे वह शीशे से आर पार हो कर कार में आना चाहती हो | उसे देख कर सुबोध व मिताली दोनों ही हतप्रभ हो गये | सुबोध ने तुरंत कार रोक दी | तितली को बारिश की फुहार में भीगते देख कर दोनों व्याकुल हो उठे | सुबोध तितली को भीगने से बचाना चाहता था | उसने उतर कर तितली को धीरे से पकड़ कर सड़क के किनारे लगे पौधों के बीच छोड़ने की बात सोची ही थी कि मिताली जोर से चीख पड़ी और कहने लगी, “ मत छुओ उसे.. उसके पंख टूट जाएँगे … उसके रंग झड़ जायेंगे .. वो मेरी परी है परी… और कोई नहीं … वो हमसे मिलने आई है …” और फिर मिताली फूट – फूट कर रोने लगी | सुबोध भी यही महसूस कर रहा था | मिताली भी कार से उतर पड़ी और तेजी से आहें भरती हुई, तितली को फड़फड़ाते देख वो भी छटपटाने लगी | उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली | तभी अचानक तितली छटपटाती सी, फड़फड़ाती हुई आई और मिताली के गालों को छूती हुई पेड़ों के झुरमुट में लुप्त हो गयी | मानों वह मिताली के गालों को चूमती हुई प्यार कर ने आई हो | मिताली का ह्रदय विदारक रुदन आसपास के वातावरण को चीर गया | वह तितली को व्याकुल सी खोजने लगी, जिधर वह उड़ कर गयी थी | पर तब तक वह न जाने कहाँ खो गयी थी | अब तो मिताली और सुबोध  को यकीन हो गया था कि वह प्यारी सी तितली और कोई नहीं उनकी अपनी परी थी, जो दूसरा जन्म लेकर उनसे मिलने आई थी ……..

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