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पकौड़े वाले का इंटरव्यू

जनवरी 23, 2018 कमल पंत

ये साप्ताहिक इंटरव्यू है,साप्ताहिक इंटरव्यू उन लोगों का जिनका हमारी वास्तविक दुनिया में अस्तित्व तो है मगर हम उनके अस्तित्व को ना स्वीकार पाते हैं न नकार पाते हैं. जैसे पकौड़े वाले भैया.अब पकोड़े शब्द को सुनकर इसे पीएम साहब के रोजगार बढाओ अभियान से मत जोड़ लेना,ये पकोड़े वाले भैया पिछले 20 सालों से मेरे मोहल्ले में पकोड़े बेचते आ रहे हैं.शाम को सर्दियों में चाय भी बना लेते हैं ख़ास लोगों के लिए .बाकी पूरा दिन सिर्फ पकोड़े तलते हैं.

वर्ष 2002 में गाजियाबाद नगर निगम द्वारा बनाये जा रहे फ्लेट किस्मत से इनकी झोली में गिर गए . जिसकी किश्त ये आज तक चुका रहे हैं.अब कहने को एक दो बेडरूम हाल किचेन का फ्लेट इनकी प्रापर्टी के रूप में दर्ज हो चुका है लेकिन उस प्रापर्टी का सदुपयोग करने के लिए इन्हें एक दिन अपने पकोड़े की दूकान को बंद रखना पड़ता है.हालांकि इतने वर्षों में इन्होने अपनी दूकान का विस्तार भी किया है.अब पकोड़े के साथ साथ समोसे ,कुलचे जलेबी जैसी चीजें भी ये बनाकर बेचते हैं.

अब परिचय लगभग समाप्त हो चूका है इसलिए अब सिम्पल तरह से इंटरव्यू किया जाए.

मै -गुप्ता जी ये बताइए …..?

पकोड़े वाले भैया -पहले तो ये गुप्ता जी कहना बंद कीजिये ,आप पिछले दस सालों से मुझे गुप्ता जी कह रहे हैं और मैं सुने जा रहा हूँ,लेकिन आज कम से कम कैमरे के सामने तो सही नाम लीजिये .

मैं -माफ़ कीजिये आप का सही नाम मुझे नहीं पता , मैं तो आपको गुप्ता जी ही सोचता था ..
पकोड़े वाले भैया -ये आप ही नहीं पूरे दिल्ली की समस्या है,यहाँ चिकेन बेचने वाले पंजाबी और वेज बेचने वाला बनिया माना जाता   है. पकोड़े ,समोसे,  बर्गर जैसी चीजें बेचने वाला तो गुप्ता या अग्रवाल ही होता है बस. मेरा नाम हेमंत बंसल है .

मै -अच्छा तो बंसल साहब ,हेमंत बंसल साहब आप ये कब से चला रहे हैं दूकान और कैसे इसकी शुरुवात हुई .

बंसल साहब -दरअसल मै दिल्ली व्यापार करने आया था,मेरे पिताजी मथुरा में पन्नी पैकिंग बाक्स बनाते थे ,उसी व्यापार को फैलाने मैं दिल्ली आया था.लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था,यहाँ आकर लुट गया,घर वापस जाने के पैसे नहीं थे और उधर मथुरा में पिताजी का बिजनेस तबाह हो चुका था.तो मैंने अपने गुरु श्री शंकर लाल अग्रवाल जी से प्रेरणा लेकर पकोड़े तलने शुरू कर दिए.

मैं -शंकर लाल अग्रवाल कौन ?

बंसल -जी वह रिश्ते में मेरे ससुर हैं और वैसे एक मिठाई की दूकान के मालिक हुआ करते थे,पिताजी की तरह जब उनका व्यापार भी डूबने लगा तो उन्होंने मिठाई की दूकान में गोलगप्पे खिलाने शुरू कर दिए,बस मैंने तुरंत उनसे प्रेरणा ले ली कि मैंने भी किसी भी काम में कुछ भी घुसेड देना है .

मैं -ससुर कैसे बने वो आपके ?

बंसल -उनका व्यापार पूरा डूब रहा था,ना गोलगप्पे चल रहे थे न मिठाई,ऊपर से दूकान का किराया बच्चों की फीस वगेरह वगेरह .उन्होने दूकान के आगे दिन में समोसे तलने शुरू किए,जो इत्तेफाक से चल निकले ,मैंने उनकी देखा देखी एक स्टोव खरीदा और उन्ही की दूकान के सामने रोड के दूसरी तरफ पकोड़े बेचने लग गया.लोग पकोड़े ज्यादा खाने लगे समोसे कम.उन्होंने मुझसे कहा कि’तुम्हारी वजह से मेरा बिजनेस ठप हो रहा है बड़ी मुसीबत में हूँ ,बेटी अनब्याही है तुम छोड़ दो ये दूकान ‘

मैं -अच्छा तो दूकान छोड़ने के लिए बेटी मांग ली.

बंसल -अरे वो दूकान छोडनी ही थी,वहां दूकान का मालिक पकोड़े तलने बैठने वाला था,मैंने चौराहे पर दूकान लेनी थी,अग्रवाल साहब से दहेज में कुछ पैसे लिए और उनके सर से बेटी का बोझ कम कर दिया..दूकान ले ली .

मैं -आप 20 साल से पकोड़े तल रहे हैं,बोर नहीं होते इस काम से ?

बंसल -बोर हो गया था बीच में ,कुछ महीने समोसे बनाये,फिर कचोडी बेदम पूरी सब चीज ट्राई किया लेकिन इस तरफ को पकोड़ों का ज्यादा चलता है.अभी सामने चाईनीज ठेली वाला आया मैं डर गया कि मेरा धंधा चौपट .मगर यहाँ की पब्लिक जबर्दस्त है चाईनीज भी नहीं खाया सिर्फ पकोड़े .

मैं -आपको कभी हल्दीराम जैसा धंधा करने का मन नही हुआ

बंसल -अरमान जवानी में ही बड़े होते हैं,शादी के बाद घर ठीक से चल जाए यही अरमान सबसे बड़ा होता है.

मैं -आपका बड़ा नाम है पकोड़े के नाम पर,मेट्रो में तक लोग कहते हैं कि गुप्ता जी के यहाँ पकोड़े खाकर चलेंगे.

बंसल -आधी दुनिया तो मुझे गुप्ता ही कहती है.यहाँ एक बर्गर वाला था,फ़ूड इंस्पेक्टर ने रेड मारकर धंधा बंद करवा दिया उसका.उसके बर्गर बहुत चलते थे. उसकी दूकान बंद होते ही मैंने बर्गर बनाना शुरू कर दिया.और लोगों से कहने लगा कि मैं गुप्ता ही हूँ. लोगों को मेरे बर्गर तो पसंद नहीं आये लेकिन गुप्ता नाम पसंद आ गया.

मैं -बहुत अच्छा लगा आपसे बात करके आखिरी सवाल, आप क्या सोचते हैं पकोड़े वाला रोजगार आने वाली पीढी के लिए कैसा है ?

बंसल -रोजगार तो ये जबर्दस्त है.बेचो भी खाओ भी लेकिन भूल कर भी फ़ूड इंस्पेक्टर को कम पैसे मत देना.क्योंकि जहाँ सौ की जगह पचास किया वहां रेड पड़ेगी तेल में खराबी बतायेगा ,दिल्ली वालो के स्वास्थ से खिलवाड़ बतायेगा और बस हो गया धंधा बंद..बाकी धंधा चौखा है एकदम .

 

2 thoughts on “पकौड़े वाले का इंटरव्यू”

  1. पढ़ कर मजा आ गया। लगा वास्तव में ही पकौड़े खा रहा हूं।

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