यंगिस्तान

जासूसी उपन्यास के जनक: गोपाल राम गहमरी

जून 21, 2018 ओये बांगड़ू

अगर आपने कभी हिंदी साहित्य पढ़ा होगा तो गोपाल राम गहमरी का नाम सुनते ही दिमाग में पहला शब्द जासूस आ जायेगा. हिंदी साहित्य में जासूसी उपन्यास के जनक गोपाल राम गहमरी को माना जाता है. गोपाल राम का देशीपन से लगाव इस बात से ही देखा जा सकता है कि वो अपने नाम के आगे ही अपने नैनीहाल गहमर के नाम पर गहमरी का प्रयोग अपने नाम के साथ करते थे.

गोपाल राम गहमरी जनता की नब्ज जानते थे वो जानते थे कि जनता क्या पढ़ना पसंद करती है. दिवेदी जी जब भाषा के परिमार्जन के साथ सरस्वती पत्रिका का सम्पादन संभालते हैं उसी समय के चार महिने बाद गोपाल राम गहमरी ने जासूस पत्रिका प्रारम्भ की. आलम ये था कि भारत मित्र में दिये जासूस के विज्ञापन ने हिंदी गद्य साहित्य में नवीन हलचल पैदा कर दी.

1900 में प्रकाशित जासूस को प्री बुकिंग से 175 रुपये की राशि में प्राप्त हुई. जासूस नाम से कयी लोगों के इस बात की भ्रम हो जाता है कि इसमें केवल जासूसी कहानिया होंगी जबकि हकीकत में तत्कालीन देश दुनिया के समाचार व समीक्षा भी पत्रिका का हिस्सा होते थे.

गोपाल बाबू के योगदान को केवल जासूसी उपन्यासो तक सीमित किया जाता है बल्कि गोपाल बाबू का योगदान हिंदी गद्य साहित्य में अद्वितीय है. एक ऐसे दौर में जब हिंदी गद्य साहित्य ब्रजभाषा व खड़ीबोली का द्वन्द झेल रहा था तब गोपाल राम गहमरी न केवल खड़ीबोली के पक्ष में खड़े होते हैं बल्कि ब्रजभाषा के कयी पक्षकारो को खड़ीबोली के पक्षकारो में शामिल करते हैं.

गोपाल बाबू के उपन्यासों को केवल जासूसी उपन्यास कह कर हिंदी साहित्य की मुख्यधारा से अलग कर दिया गया है असल में वो अपने समय का समाज भी दिखाती हैं. अपने देशकाल और समाज की समस्या का चित्रण करते हुये साहित्य के मूल उदेश्य को भी पूरा करता है. फैंटसी के माध्यम से अपने समाज का चित्रण गोपाल बाबू के साहित्य की मूल विशेषता है.

साहित्य की उदेश्यपूर्ति के साथ गोपाल बाबू के जासूसी उपन्यास हिंदी गद्य साहित्य के लिये एक नवीन पाठक वर्ग भी तैयार करता है. देवकी नंदन खत्री के बाद गोपाल राम गहमरी एकमात्र ऐसा नाम है जिसे पढ़ने के लिये कयी अहिंदी भाषा भाषियो ने हिंदी सिखी.

भले ही आज अकादमिक और साहित्यिक भेदभाव के चलते जासूसी साहित्य को अछूतो की श्रेणी में रखा गया हो परन्तु हकीकत यह है कि हिंदी गद्य साहित्य के विकास में जासूसी उपन्यासों की महत्तवपूर्ण योगदान को भुलाया नहीं जा सकता. जासूसी उपन्यासों के जनक को उनकी पुण्यतिथि ओये बांगडू नमन करता है.

गोपाल राम गहमरी के लिखे हुए मौलिक जासूसी उपन्यास हैं –
1- अजीब लाश
2- गुप्त भेद
3- गुप्तचर
4- डबल जासूस
5- खूनी कौन है
6- गाड़ी में खून
7- जासूस की भूल
8- अंधे की आंख
9- जासूस की चोरी
10-किले में खून
11-जासूस पर जासूस
12-भयंकर चोरी
13-रूप संयासी
14-लटकती लाश
15-कोतवाल का खून
16-हम हवालात में
17-खूनी
18-ठगों का हाथ
19-लाश किसकी है
20-आंखों देखी घटना
21-खूनी का भेद
22-मटोपटो
23-हत्या कृष्णा
24-अपराधी की चालाकी
25-सुंदर वेनी
26-अपनी राम कहानी
27-विकट भेद
28-जासूस की विजय
29-मुर्दे की जांच
30-मेम की लाश
31-जासूस की जवानमर्दी
32-जासूसी पर
33-जैसा मुंह वैसा थप्पड़
34-सरवर की सुरागरसी
35-खूनी की चालाकी
36-चांदी का चक्कर
37-गुसन लाल दरोगा
38-भीतर का भेद
39-धूरंधर जासूस
40-हमारी डायरी
41-खूनी की खोज
42-जासूस की डायरी
43-जासूस की बुद्धि
44-कैदी की करामात
45-देवी नहीं दानवी
46-लड़की की चोरी
47-सोहनी गायब
48-डॉक्टर की कहानी
49-केशबाई
50-केतकी की शादी
51-घर का भेदी
52-नीमा
53-योग महिमा
54-अर्थ का अनर्थ
55-मरे हुए की मौत
56-भयंकर चोरी
57-देखी हुई घटना
58-जासूस जगन्नाथ
59-नगद नारायण
60-डकैत कालूराम
61-भयंकर भेद
62-स्वयंबरा
63-भंडाफोड़
64-रहस्य विपल्व
65-होली का हरझोग
66-जमीदारों का जुल्म

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