यंगिस्तान

हिन्दी में जॉब नहीं है! सच में ?

अक्टूबर 2, 2016 ओये बांगड़ू

इस पूरे लेख के जिम्मेदार अमित तिवारी जो हैं वह हिन्दी के लिख्खाड हैं. जबर्दस्त तरीके से अपनी बात को लोगों  के सामने उन्ही की जबान में रख जाते हैं . अब जो है कि इसमें उन्होंने हिन्दी के बारे में बड़ा अच्छा सा लिखा है .

हिन्दी, जो है कि, हमारी राजभाषा है| हमारी माने भारतीय गणराज्य की| भारतीय गणराज्य माने कि केंद्र सरकार की| 14 सितम्बर 1949 को संविधान के माई-बाप लोगों ने तय किया कि हिन्दी को, जो है कि, राजभाषा रखा जाएगा| अगले ही दिन से गैर हिन्दी-भाषी राज्यों ने, जो है कि, बांस करना चालू कर दिया| हौं-हौं-लिहो-लिहो के बीच के नुचती लुंगी बचाने के लिए माई-बाप लोगों ने, जो है कि, अंग्रेजी को भी राजभाषा बना दिया| सबको संतोष हुआ, काहे कि अंग्रेजी के साथ अच्छी बात ये थी कि वो किसी को भी ढंग से नहीं आती थी| समानता ज्ञान पाने से ही नहीं, ज्ञान की कमी से भी आती है|

फिर कुछ दिन में लगा कि, ससुरी अंग्रेजी सीखने में, जो है कि, बड़ी दिक्कत हो रही है| पुट्ठे का बालतोड़ हो गया है| फिर सब झंडाबरदारों ने तय किया कि राज्य वाले अपने हिसाब से, जो है कि, राज्य की राजभाषा रख सकते हैं| भाषाओँ का रेला लग गया| इस सब कुकुर-झौं-झौं के बीच हिन्दी कोने में अंगूठा चूसते खड़े रह गयी|

आज़ादी के बाद रोटी-दाल के जुगाड़ में मारे-मारे फिर रहे हिन्दी-भाषी राज्य के निवासियों ने, जो है कि, मातृभाषा का कॉल होल्ड पे रख के उन सभी भाषाओँ का कॉल अटेंड करना शुरू किया, जिसमें नौकरी लगती थी| मराठी, बांग्ला, अंग्रेजी और यहाँ तक कि कन्नड़ और तेलगु भी| जबान तब न चलेगी जब पेट में अन्न होगा|

आर्थिक सुधारों का दौर चला| सत्तर के दशक से मनमोहन अंकिल के चमत्कारी बजट तक| नौकरियों में विदेशी एलीमेंट्स का आवागमन होने लगा| अंग्रेजी मजबूरी हो गयी| लेकिन भईया, लोगों ने, जो है कि, अंग्रेजी को जरूरत के साथ इज्जत-पानी का भी कोश्चन बना लिया| रैपिडेक्स वालों ने अंग्रेजी सिखाने के नाम पे, जो है कि, धकाधक्क पैसा कमाया|

कन्या का अटेंशन, गुदगुदी कुर्सी वाली नौकरी, समाज में “मनोहर” के बजाय “गुप्ता जी” से सम्बोधित किये जाने से ले के होटल में पानी की जगह “टैप वाटर” मांगने तक के लिए अंग्रेजी को ही जन्तर मान के पेट की धुन्नी से बाँध लिया गया| जरूरत अब शौक बन गयी| अंग्रेजी का प्रयोग आदमी के, जो है कि, हाई क्लास होने का सबूत माना जाने लगा|

हमारे यहाँ एक ठो नियम है| दो चीजों को एकसाथ फलता-फूलता नहीं देख सकते| अंग्रेजी के साथ हिन्दी को भी उठाये रखने में तकलीफ होने लगी| हिन्दी-भाषी समाज के हनुमान ने राम को अयोध्या छोड़ दिया, लखन को ले गये, एमएनसी में नौकरी दिलाने|

लेकिन भाई हिन्दी को भी सपूत मिले| खांटी जुझारू, जो है कि, लव-कुश टाइप| भारतेंदु हरिश्चन्द्र से ले के अपने दिव्य प्रकाश दुबे और सत्य व्यास जैसे|

हिन्दी लड़ी| खूब लड़ी| राजनीति से| लाल-फीताशाही से| ऑनसाईट के लिए ललचाये अपने पुत्रों से| हिन्दी में बात करने पे फाइन लगा देने वाले स्कूलों से| बच्चों को बचपन से ही “से हलो टू अंकल” टाइप घुट्टी पिलाने वाले अभिभावकों से| होटल में “साल्ट एंड पेप्पर” मांगने वालों से|

हिन्दी लड़ी| खूब| झांसी की रानी के जैसे| पर झांसी की रानी की तरह जब शहीद होने के कगार पे थी, तो थोड़ी खुशनसीब निकली| झाँसी की रानी को मदद नहीं पहुंच पायी थी| हिंदी को हल्की सी मदद मिल गयी| गूगल इनपुट टूल और सस्ते एंड्राइड फोन के रूप में| बस फिर क्या हिन्दी और हिन्दी लिखने-पढ़ने-बेचने वालों की, जो है कि, रेलमपेल हो गयी|

लेकिन भईया, वो क्या है कि, हम दोगले हैं, जेनेटिकली| हिन्दी की दशा बुरी बताते हैं और फिर बच्चे से बोलते हैं “नो मोर टीवी अंशुल, गो तो बेड”| भाई, अंग्रेजी, स्पेनिश, जर्मन, अमका-ढमका सब सीखो| खूब बोलो| दुनिया-जहान जीत लो| लेकिन कोने में पड़ी बूढी माँ की तरह हिन्दी को, जो है कि, अपने ही घर में घुटन न महसूस कराओ|

बाप-दादा जर-जमीन दे के जाते हैं हैं तो आदमी उसको बढ़ाने का सोचता है| बेचने वाले को सौ जूते मारने की बात करता है| तो हिन्दी के साथ ये क्यों? लिखो, पढ़ो, ऑफिस के प्रेजेंटेशन में न सही पर रोजमर्रा के कामों में इस्तेमाल करो| “हिन्दी में जॉब नहीं है” का रोना रोते रहोगे तो मर जायेगी हिन्दी| सरकार तो आदमी तक को एम्बुलेंस नहीं दे सकती| भाषा को क्या खाक देगी| तुम भले हिन्दी से नहीं हो पर हिन्दी तुमसे ही है| मर गयी ना, तो संस्कृत की तरह इसकी महानता पे भी अंग्रेजी या स्पेनिश में निबन्ध पढ़ोगे|

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