यंगिस्तान

म्यामार के बहाने पहाड़ का बचपन

जनवरी 19, 2019 ओये बांगड़ू

डाक्टर ईशान पुरोहित फिलहाल म्यामार की आफिशियल यात्रा पर हैं,सोलर एनर्जी पर देश विदेश में इनके व्याख्यान होते हैं.आईआईटी से पासआउट हैं और कलम में गजब की पकड़ रखते हैं .फिलहाल वह म्यामार के बहाने बचपन याद कर रहे हैं.

म्यांमार (वर्मा) के दूरदराज के इलाकों में टीम के साथ घूम रहा हूँ जिसमें सभी साथी अलग अलग देशों के हैं। प्रयोजन दूसरा है लेकिन पिछले चार दिनों से इन इलाकों मैं घूमकर ऐसा लगता है जैसे अस्सी के दशक का हमारा गाँव हो। मासूमियत, उत्साह और इसके इतर पूरे किये जा सकने वाले सपनों की उड़ानें लेकिन ये सब कुछ एक रूटीन से जॉब का हिस्सा है तो कभी कभी कुछ ख़ास दिखने को मिलता है जो दिल को छू देता है और जिसको लिखने का मन भी होता है। लेकिन यकीन मानिये, धरती का ये हिस्सा हमारी कल्पनाओं से भी खूबसूरत है।
यहाँ के एक सुदूरवर्ती इलाके में एक स्कूल के सामने से गुजरने का मौक़ा मिला। आदतन गाड़ी रोकी और बच्चों को देखने लगा। साफ़, सुन्दर, और ऊर्जा से भरपूर बच्चे। साथ के लोकल साथी ने बताया कि पांचवीं तक का स्कूल है। इत्तफाकन लोकल साथी अपने सूरज भाई हैं जो पिछली तीन पीढ़ियों से वर्मा के ही निवासी हैं। भारत में इनका परिवार आंध्रप्रदेश मैं रहता था। सूरज भाई से जो कुछ भी जाना यहाँ के बारे मैं वो बहुत ख़ास था लेकिन यहाँ की सरकार में उनका एक बड़े पद पर होना मुझे बहुत अच्छा लगा।
स्कूल की छुट्टी का टाइम रहा होगा इसलिए अमूमन सारे बच्चे एक तरह से घर जाने की जल्दी मैं दिख रहे थे। सामने देखा तो कई बच्चे सीमेंट, रेत और बजरी मिलाकर छोटी छोटी ईटें बना रहे थे। इतने मदमस्त होकर वो इस कार्य को अंजाम दे रहे थे कि देखते ही बनता था। एक बच्चा मसाला खांचे में भरता तो चार बच्चे उसको लकड़ी से ठोकते। और फिर दो बच्चे मैदान मैं उस खांचे से ईंट निकालते और डिजाइन भी तैयार कर लेते। ऐसा परफेक्शन कि आप सोच नहीं सकते कि ये चौथी और पांचवीं कक्षा के बच्चे हैं। और फिर राष्ट्रगान शुरू हुवा और फिर छुट्टी .बच्चे वैसे ही गेट से बाहर निकले जैसा आप सोच रहे हैं , हो हो हो , दस मिनट के इस अंतराल ने बचपन के अपने स्कूल में पहुंचा दिया था।
यहाँ से हमने अपना सर्वे पैदल शुरू किया। एक बड़ा सा रबड़ के पेड़ों का जंगल जिसमें बेतरतीब सी झाड़ियाँ और उतार चढ़ाव वाली पगडंडियां थीं। चलना शुरू किया तो देखा एक बच्चा हमको फॉलो कर रहा है। लेकिन वो हमारे पीछे नहीं बल्कि झाड़ियों और खेतों से होते हुए आगे आगे ही चल रहा था। बिलकुल नंगे पाँव,स्कूल से छुट्टी हुई तो कमीज भी शायद घर पर फेंक आया था। बहुत देर तक वो हमको और मैं उसको नोटिस करता रहा। हम लोग तकरीबन पांच किलोमीटर चले होंगे तो वो भी हमारे पीछे पीछे इतना ही चला।
और फिर हमारा काम ख़त्म हुवा। ड्राइवर किसी तरह गाड़ी को जंगल तक ले आया। मेरे साथी आगे आगे चल रहे थे और मैं सबसे आख़िरी में आ रहा था। क्योंकि बहुत कुछ ऐसा था यहाँ जो शायद मैंने नहीं देखा था। रबड़ का जंगल , बांसों से बने घर , लोगों का कुदरत से रिश्ता आदि आदि साथियों को गाड़ी में बैठता देखकर वो बच्चा ठिठक गया और बड़े कौतूहल से देखता रहा। शायद उसके पीछे पीछे उसका कुत्ता भी आ गया। पतानहीं क्यों  मैंने उसको पास बुलाया तो वो एक अजीब सी झिझक के साथ खड़ा हो गया। मैं उसके पास गया और उसके गाल को थपथपाया तो एक प्यारी सी मुस्कान मिली। मैंने जेब से कुछ लोकल नोट निकाले और बच्चे को थमा दिए। उसने पहले तो कौतूहल से देखा और फिर दोनों हाथ बढ़ाकर पैसे ले लिए। मैं फिर गाड़ी में आ गया और देख रहा था कि कितने उत्साह से वो अपने गाँव की तरफ भाग रहा है।
इन ख़यालों की जुगाली करने के लिए मेरे पास चार घंटे का वक़्त था जो मुझे सड़क पर यंगून आने के लिए करना था।  उस बच्चे की दौड़ से मैंने कहीं न कहीं ये पाया कि ये सालों पहले का मैं ही तो हूँ, हम भी तो अपने गाँव मैं इस उम्र में ऐसे ही तो थे। स्कूल से ठीक ऐसे ही भागते थे। गेट की बस को पकड़ने के लिए उसके पीछे उड़ती हुई धूल में दूर तक भागते थे।

स्कूल से चौपड़ाधार बाजार से गुजरते हुए घर आना और कनखियों से दुकानों की तरफ टॉफियों के भरे डब्बों की तरफ ललचाई नज़रों से देखना। और देवराम ताऊजी के समोसों की खुशबू शरीर की इन्द्रियों को झनझना देती थी। भागकर घर पहुंचकर सबसे पहले माँ ने खाने के लिए क्या रखा है वो जपराली लगाते थे। और न जाने क्या क्या, भूख होती थी और पैसे नहीं होते थे और मेरे ही पास क्या किसी के पास भी नहीं होते थे,फीस के दिन किसी लड़के के पास एक समोसे जितनी चिल्लर मिल भी गयी तो उस एक समोसे के लिए आठ आठ बच्चे जाते थे, किसी को कोने का टुकड़ा,किसी को आलू का, वो भी विरोधी खेमे के बच्चों को ललचा ललचा कर,और उस उम्र में पैसे होने की एकमात्र उम्मीद होते थे हमारे रिश्तेदार चाचा जी,मामा जी,पास के दूर के सभी तरह के।

गेट के बस से सवारी क्या उतरती हमारी नज़र एक किलोमीटर से पहचान लेती कि कौन आया है या फिर किसके घर का मेहमान है।पहचान का निकला तो सीधा सौ की स्पीड मैं सामान लेने चले जाते। एक एक आदमी को लेने कई बार बीस बीस बच्चे भी जाते थे।सामान मैं ले जाऊंगा इस बात पर ही लड़ाई हो जाती। और मेहमान को सीधा घर में लाकर ही छोड़ते।जब तक गुड़,चना,टॉफ़ी या फिर कुछ भी नहीं का फरमान नहीं मिल जाता टस से मस नहीं होते थे।उसके बाद भी बहाने से एक दो चक्कर मार आते कि क्या पता मेहमान का लाया हुवा मिठाई का डिब्बा खुल गया हो।
मुझे याद है गाँव से रोजगार से शहरों की तरफ गए लोग अपने घरवालों को पार्सल भी भेजते थे (मैंने अपने गाँव में विनोद दादा जी जो मेरे साथ फेसबुक मैं कनेक्टेड हैं उनके अपनी माँ को भेजे पार्सल कई बार देखे हैं)। पार्सल में दरअसल कुछ मिठाइयां आदि होती थीं। पोस्टमैन विशेष इनाम या सत्कार की तमन्ना के साथ पार्सल डिलीवर करता था। और पीछे पीछे पूरे को गाँव को भी बता देता कि फलाने का पार्सल आया है और कितना बड़ा या कितना भारी है।
अपने घर में जब भी कोई रिश्तेदार आते तो हम सातवें आसमान पर होते थे। बैग या झोले से अंदाजा लगा लेते थे कि क्या क्या माल पानी है। शाम का इन्तजार होता। रिश्तेदार की अपने तरीके से हर संभव आवभगत करते। मतलब चाय के गिलास से लेकर बाहर जंगल जाने तक के लोटे की व्यवस्था,सब कुछ। दादी की खूब चमचागिरी करते। संध्या का पानी,तेल का डिब्बा,माचिस और वो सब कुछ जो दादी को शाम के वक़्त चाहिए होता क्योंकि ‘झोला’ उन्होंने ही खोलना था। माँ को ये रूतबा दादी के जाने के बाद ही हासिल हुवा। दादी भी उस दिन पूरे एटीट्यूड से देर लगाती। और फिर किसी तरह सबका इतंजार ख़त्म होता। दादी मिठाई का डिब्बा खोलती और सबसे पहला पीस भगवान् जी के ठो में रखना होता,जिसको आधी रात मैं हम ही उठकर चट करते। झोले से निकले चवनप्रास,या फलों में कोई इंटरेस्ट नहीं होता।

मिठाई अमूमन मिक्स वाली ही होती जिसमें से बालुशाई के पीस पर दादी का कब्जा होता और हमारे हिस्से बर्फी,रसगुल्ला या फिर लड्डू आ जाता। हां अगर पौड़ी से चाचा जी आते तो फ्रंटियर वाले की हरी नारियल बर्फी कन्फर्म थी। और फिर हमारी नजरें खोजती रहतीं कि बची हुई मिठाई कहाँ रखी जाएगी। आलमारी से लेकर अनाज के कोने तक सभी गुप्त ठिकाने हमको पता थे और पूरे स्किल सेट्स लगाकर एक दो टुकड़े चुरा ही लेते और पकडे जाने पर भरपूर मार खाने के लिए भी तैयार रहते थे।
और फिर जब रिश्तेदारों के जाने का वक़्त होता तो हम कितनी उम्मीदें पाले रहते थे। बस अभी दस रुपये मिलेंगे, अभी बीस रुपये मिलेंगे। भावुकता पर भौतिकी भारी थी ये वक़्त का यथार्थ था। रिस्तेदार भी तब तक जेब में हाथ नहीं डालते थे जब तक सामान लेकर बस स्टॉप पर न पहुंचो और बस धार में न आ जाए।और अगर जेब मैं हाथ नहीं गया तो इतनी धक् धक् होती थी जितने सेटेलाइट छोड़ते हुए इसरो वालों को भी नहीं होती होगी। दसवीं से बारहवीं तक के वक़्त मैं चाचाजी जब भी आते थे तो पूछते थे ‘आजकल क्या रेट चल रहा है तुम लोगों का ‘ और हम पचास से शुरू करते थे और चाचा जी हमारी जेब में डाल देते थे और फिर हम पूरी क्लास के शहंशाह।
आज हम उम्र और अनुभवों के मध्यक्रम में हैं जहाँ खुद से जुड़े उत्थान और अवसान दोनों देख रहे हैं। वक़्त बदला है और बहुत बदला है। वो शिद्दत जो हमारे वक़्त के दस रुपये मैं हमारे लिए थी वो आज की हमारी पीढ़ी में ही दो हज़ार के नोट के लिए नहीं है।शहर ही नहीं गावों मैं भी। इसको आप सोशल ट्रांसफॉर्मेशन कहिये लेकिन ये भी सच है कि आवकश्यता सिर्फ अविष्कार तक ही नहीं तिरस्कार तक भी जा सकती है, इसी आवश्यकता ने समाज और रिश्तों को संभाले भी रखा और मूल्यों को इसमें समाये भी रखा।
उस बच्चे की कूद फाँद में मैं ये महसूस कर रहा था कि वो बच्चा अब हाथ में वो थोड़े से पैसे लहराकर जा रहा होगा जिसको पीछे से कई और बच्चों ने भी ज्वाइन किया होगा और अब वो मीठी मीठी गोलियां ले रहे होंगे,मुस्कुरा रहे होंगे,खिलखिला रहे होंगे।इन्हीं ख़यालों की उधेड़बुन से,अलविदा म्यांमार !!!! फिर आऊंगा।

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