यंगिस्तान

मुनस्यारी किस्से-कौतिक का हाल

अक्टूबर 13, 2018 ओये बांगड़ू

इस कहानी के लेखक लवराज वैसे तो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में कार्यरत लेकिन लिखने का भी शौक रखते हैं. आज यह अपनी लेखनी के जरिए उत्तराखंड के छोटे से पर बेहद खुबसूरत शहर मुनस्यारी में होने वाले मेलों और बाल सुलभ मन की जिज्ञासों पर विस्तार से अपने संस्मरण लिख रहे हैं .

 

पिछले कुछ सालों से रोजी रोटी में ऐसा उलझा हुआ हूँ,कि तीज त्योहारों ,कौतिको के दौरान घर जाना कम ही हो पाता है.यही हाल मेरे हमउम्र मित्रो का भी है.लगभग सब अलग अलग शहरों में घिस रहे हैं.सबका एक साथ बैठ पाने का संयोग कम ही बन पाता है.
कौतिक(मेले)खैर अब बेमतलब से भी हो गये हैं.आखिरी बार 2014 में डाना धार का कौतिक देखा था. लोगों की घटती भीड़ और उल्लास को देखकर निराशा ही हुई.मनोरंजन के विकल्प अब इतने बढ़ गये हैं कि लोगों के लिये कौतिक जरा अप्रासंगिक(इरिलिवेंट) हो गये है.एक समय था जब इन कौतिकों के लिये गजब की दीवानगी हुआ करती थी.

बच्चे,बूढ़े,अपने सबसे नये कपड़े इन कौतिको में पहनने के लिये तह कर के रखते थे.कौतिक के दिन बड़ी भारी भीड़ देखने को मिलती थी.लोग बाकायदा 25-30किलोमीटर का भी सफर तय करके आते थे.

बीस रुपये भी उन दिनों जेबखर्च के लिये बहुत ज्यादा थे.इतने पैसों में आप दबा के जलेबी और अमरूद सूत(खा)सकते थे.खाने के बजट में थोड़ी कटौती कर ली जाये तो दस रुपये में एक प्लास्टिक की बन्दूक भी आ जाया करती थी.

इन बन्दूको में प्लास्टिक की कोनिकल गोलिया जाती थी.हालांकि कुछ काइयाँ किस्म के लौंडे बन्दूक की नलियों में छोटे छोटे पत्थर भर के भी दागा करते थे.अमूमन इनका निशाना कौतिक में बिकते गुब्बारे हुआ करते. इन काइयाँ लौंडो में से कुछ का दुस्साहस यदा कदा सातवे आसमान पर भी पहुँच जाता.ऐसा होने पर ये बकलोलियो की हद पार करते हुऐ साथियो की खोपड़ी को निशाना बनाना शुरु कर देते.जनहित के लिये इन लौंडो की बराबर घेराबंदी की जाती थी.मौका मिलते ही इनकी बंदूकों की इहलीला समाप्त कर दी जाती.

कौतिको में कभी कभार घर आये फौजी रिश्तेदार भी दिख जाया करते थे.उनके चरण छूने में हमे जरा भी हिचकिचाहट नही होती थी.ऐसा करने के पीछे उनके प्रति सम्मान से अधिक हमारा निजी स्वार्थ काम किया करता.कौतिको में ये रिश्तेदार आल्ड मांक का पव्वा मार कर दानवीर कर्ण मोड(स्टाईल) में घूमा करते थे. हमारे संस्कारो से प्रभावित हो कर ये अकसर हमारे हाथो में बड़े वाले गाँधी जी पकड़ा दिया करते.उनकी चैरिटी से ही कौतिक में गिम अर्जी का पिरोगराम निपटाया जाता था.
इन दिनों तीज त्यौहार भी बड़े फीके से हो गये है.यह बड़ा दुखद है कि होली भी अब बड़ा बोकस त्यौहार लगता है. उस समय होली की बड़ी रंगत हुआ करती थी.घर से हम लोग बाकायदा भूखे पेट निकलते ताकि दूसरे घरो में दबा के आलू राजमा सूत सके.

आलू के गुटके वही बढ़िया होते है जो पड़ोसी के घर में बने हो,ब्रह्मांड का यह गूढ़ रहस्य मुझे उन्ही दिनों किसी आँगन में बैठे बैठे समझ आया था. इक्के दुक्के घरों में आलू राजमा से ऊपर मटन का प्रावधान होता.उन घरों में “बदन पे सितारे लिपेटे हुए”गाने वाले लौंडो की सँख्या में भारी इजाफा देखा जाता था.होली ने मुझे या मेरे हमउम्रों को जितना सोशल बनाया. भाई साहब भाँग की फुन्तरी आज उतना सोशल ,पर्सनालिटी डेवलैपमेंट का कोई क्रैश कोर्स आदमी को बनायेगा!

जारी

पिछली मुनस्यारी के किस्सों को जानने की इच्छा है तो इस लिंक में चटकारा लगायें \

मुनस्यारी किस्से – राजा के हाथी सा था टेलीविजन

 

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