बांगड़ूनामा

मुनस्यारी- हमारे उसैन बोल्ट हो जाने के किस्से

अक्टूबर 8, 2018 ओये बांगड़ू

इस कहानी के लेखक लवराज वैसे तो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में कार्यरत लेकिन लिखने का भी शौक रखते हैं. आज यह अपनी लेखनी के जरिए उत्तराखंड के छोटे से पर बेहद खुबसूरत शहर मुनस्यारी की यादें साझा कर रहें है

मुनस्यारी बड़ा छोटा सा शहर  है साहब , इतना छोटा कि आज भी बच्चे बूढे लहराते हुऐ 15 मिनट में शहर की छोटी मोटी रैकी या तफरी सी काट आते  है ,वो अलग बात है कि मुझ जैसे “देशी तुम हुए नही , पहाड़ी तुम रहे नही ” छाप प्रजातियों का शिशु मंदिर से चौराहे तक की खड़ी चढ़ाई नापने में ही चार छः बार  फेफड़े हाथ मे आते हुए देखा जाना कोई खास बात नही है.

वैसे मेरे जानकार , पेशे से निठल्ले और तबियत से डॉक्टर दोस्त अकसर मेरी सिगरेट पीने की लत को मेरे घटते स्टेमना की वजह बताते आये है. मैं बरहराल हमेशा अपने तथाकथित डाक्टर मित्रो का प्रिस्क्रीप्शन ,”बदली हुई हवा पानी और कुर्सी तोड़ नौकरी” से झुठला देता हूँ. सिगरेट के शरीर पर पढ़ने वाले कुप्रभाव को मैं नकारता नही हूँ बस एक सच्चे तलबी की तरह सिगरेट के अलावा भी स्टेमना घटाने वाली अन्य सम्भवनाओ को झुठला नही पाता और ऐसा भी नही है कि मेरे तर्क का वास्तविकता से कोई सम्बंध ना हो ,गाँव के “उड़्यार” ,बंजर खेत और खंडहर घर गवाह है कि सिगरेट की दरिद्र बहन बीड़ी से मेरा और मेरे तथाकथित डाक्टर मित्रो का बड़ा पुराना याराना रहा है और 90 के दशक में  इन सभी ऐतिहासिक स्थलों ने हमे धुँए के गोल गोल छल्ले बनाने की ब्रह्म विद्या में पारंगत किया , हालाँकि “बड़ो के मतलब ” के इस शौक ने तब कभी हमारी शारीरिक चपलता पर कोई दुष्प्रभाव डाला हो ऐसा मुझे नही लगता. दुकानों से सोया के पैकेट , झीलों से ककड़ी तड़ी पार कर के हमारे खड़ी चढाइयों में उसेन बोल्ट हो जाने के किस्से आज भी गाँव के चचा लोग कैरम खेलते हुऐ बड़े चाव से सुनाते है.

इधर पिछले कुछ सालों से मुनस्यारी बड़ा बोझिल सा शहर हो गया है , वजह शायद यह है कि शहरी मापदण्डो के अनुसार बच्चो के अभिभावक अब जरा जागरूक हो गये है और अपने पाल्यो को हिंदी और अंग्रेजी में टयाम टुम करवाने की उनकी हसरत का नतीजा ये होता है कि कुल जमा कक्षा 1 पास करते करते ये जागरूक अभिभावक हल्द्वानी , रुद्रपुर या देहरादून में डेरा जमा लेते है . 90 के दशक में पहाड़ की बहुत सी समस्यायें रही होंगी पर बच्चो की घटती जनसँख्या उनमे से एक नही थी ऐसा मेरा पूरा विश्वास है ,उल्टा साथी इतने अधिक थे कि कई बार बमुश्किल घात लगा लगा के , घुटने छिलवा छिलवा के हिरण किये गये मुर्गो की बस तरी भर देखने को मिलती थी. एक बार बल्लेबाजी करने के लिये उन दिनों छः छः पारियों तक की गयी फील्डिंग और बल्ले को पाने के लिये किये गये मुक्का लात ने बढ़ती जनसँख्या के दुष्प्रभाव पर मेरे कांसेप्ट कम उम्र में ही क्लियर कर दिये थे.

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