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मुलायम कथा – भाग 1

जनवरी 2, 2017 ओये बांगड़ू

शब्दों का खेल खेलने में माहिर नेताओं से उलट ठीक से हिंदी भी न बोल पाने वाले मुलायम सिंह यादव ने सैफई गाँव में पहलवानी के साथ साथ राजनीती की उठापटक में खुद को उठाने के पैतरे भी सीखें. राजनीती में अपना दम-ख़म दिखाने से पहले मुलायम सिंह यादव ने पहलवानी से लेकर अध्यापन तक का सफ़र तय किया.

मुलायम सिंह का सियासी सफ़र उत्तर प्रदेश में 1967 में सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर सबसे कम उम्र में विधायक बनकर शुरू हुआ. उसके बाद 1977 में मुलायम सहकारिता मंत्री बन गये लेकिन यह सरकार ज्यादा दिन नही चली.  कुछ ही समय बाद मुलायम ने अपनी सियासी साईकल का पहिया घुमाते हुए उस समय के सबसे बड़े समाजवादी नेता लोकबन्धु नारायण का साथ छोड़कर चौधरी चरण सिंह का हाथ थाम लिया. साथी विरोध करते रहे लेकिन मुलायम राममनहोर लोहिया की विचारधारा को बचाने की बात कहते हुए एक जमीदार और जाति विशेष के नेता चरण सिंह से जुड़े रहे.

1989 में मुलायम सिंह पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे.  वी पी सिंह की सरकार के पतन के बाद मुलायम ने चंद्रशेखर की जनता दल (समाजवादी) के समर्थन से अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी बरकरार रखी. जब साल  1990 अयोध्या में राम मंदिर का आन्दोलन तेज़ हुआ तो मुलायम ने कार सेवकों  गोली चलाने का आदेश दिया जिसमें एक दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए थे. पर इस गोली चलवाने के फैसले के साथ ही उन्होंने खुद की मुसलमानों के हमदर्द की छवि बना ली. जिसका नतीजा आगे चलकर मुस्लिम वोट बैंक के रूप में सामने आया.

वोट बैंक मजबूत होते देख अवसर मिलते ही अवसरवादी मुलायम ने 1992 में जनता दल का साथ छोड़ दिया और अपनी एक अलग पार्टी बनाते हुए समाजवादी पार्टी की नींव रखी. 1993 में मुलायम की समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाजवादी पार्टी का साथ ले कर मुख्यमंत्री बने लेकिन जल्द ही बसपा अलग हो गयी तो मुलायम ने जनता दल और कांग्रेस का हाथ थाम लिया. 1995 तक मुलायम मुख्यमंत्री रहे उसके बाद कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया.  साल 1996 में मुलायम प्रधानमंत्री की दौड़ में सबसे आगे थे लेकिन वो समर्थन न मिलने पर फिसल गये. 11 वीं लोकसभा में  मुलायम देश के रक्षा मंत्री बने.

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