बांगड़ूनामा

मौत से ठन गई- अटल बिहारी वाजपेयी

अगस्त 16, 2018 ओये बांगड़ू

भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जितने एक राजनेता के रूप में जनता के पसंदीदा रहें उतना ही लोगों ने उन्हें एक कवि के रूप में पसंद किया. अटल बिहारी वाजपेयी के जादुई शब्दों का आम लोगों से ‘अटल’ रिश्ता हैं. यह उनके शब्दों का ही जादू था कि जब भी अटल जी कुछ बोलते तो पक्ष हो या विपक्ष, नेता हो या आम जनता हर कोई बहुत ध्यान से उन्हें सुनता. आज अटल जी अबोल है लेकिन उनकें शब्दों की गूंज ज्यों की त्यों बरकरार हैं.

ठन गई

 मौत से ठन गई

जूझने का मेरा इरादा न था,

मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

 

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,

यूं लगा जिंदगी से बड़ी हो गई।

 

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,

जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

 

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,

लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?

 

तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,

सामने वार कर फिर मुझे आजमा।

 

मौत से बेखबर, जिंदगी का सफ़र,

शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

 

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,

दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

 

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,

न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

 

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किए,

आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

 

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,

नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है।

 

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,

देख तेवर तूफ़ां का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

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