बांगड़ूनामा

मैं समोसा

सितंबर 26, 2018 ओये बांगड़ू

डा.कुसुम जोशी सामन्य तौर पर ओएबांगडू पर अपनी कहानियों को लेकर चर्चित रही हैं,समोसे पर उनकी यह कहानी मैं समोसा

डाक्टर कुसुम जोशी

मैं समोसा जिसके मुख चढ़ा उसका अपना बन गया , ये मेरा नसीब था, मैंने मिडिल ईस्ट से अपनी यात्रा शुरु करी,यहां के लोग मुझे शाकाहारी मांसाहारी दोनों तरीकों से खाते रहे, और घूमते हुये मैं हिन्दुस्तान तक पहुंच गया..और भारत के लोगों की जीभ में मैं ऐसा चढ़ा कि वो मुझे अपनी मिल्कियत समझने लगे…,
गुप्ता के समोसे ,देबू के समोसे , हरिनारायण के समोसे , प्रकाश के समोसे…मैं समोसा तो न अपने जन्म स्थान का रहा ,न आलू का..,बेचने वालों के साथ ऐसा आत्मसात हुआ कि अब अपने को तलाश रहा हूं, आज देबू के समोसे की कथा सुनाता हूं,
बिन मां का बच्चा था देबू उर्फ देवकुमार ,उसके पिता पीलीभीत में समोसे का ठेला लगाते थे,सुबह शाम पिता की मदद करता ,दिन में सरकारी स्कूल में झांक आता था ,वहां उसे दोपहर का भोजन मिल जाता,पर पढ़ना कम रास आता था..दिन में भी सपने देखता धनवान होने के,
विपत्ति बता के घर में प्रविष्ट नही होती , अनायास ही एक दिन पिता उसके भविष्य की सोचे बिना ही दुनिया से विदा हो गये,बेचारा देबू अकेला सिर्फ अपने सपनों के साथ।
पिता के एक मित्र ने पांच सौ रुपये देबू को दिये और गुप्ता समोसे वाले इस नाम के ठेले को अपना बना लिया,एक उपकार ये किया कि देबू को पहाड़ जाती एक बस में यह कर बिठा दिया कि ‘वही कुछ कर लेना,वहां भूखा नही मरेगा तू’।
पहाड़ के टेड़े मेड़े रास्तों में देबू का उबकाई से जी हलकान हो गया,वो डरा सहमा सा चम्पावत स्टेशन में उतर गया , और यहीं से उसके संघर्ष की गाथा शुरु हुई, अजनबी लोगों के बीच घबराया सा देबू ‘पन्त टी स्टॉल’ में प्रश्रय पा गया।
स्टेशन में जैसे ही गाड़िया लगती ,फुदक फुदक के दुकान में आये यात्रियों को पकौड़ी, सूखे आलू ,भांग की चटनी, तली लाल मिर्च, पहाड़ी ककड़ी का राई की झांस वाला खूशबूदार रायता परोसता, बस की यात्रा से थके मांदे यात्री इस रससिक्त चटपटे नाश्ते के बाद अदरक की चाय का आनंद लेते और थकान भूल आगे बढ़ते।
देबू के आने से स्टॉल के मालिक दामोदर पन्त उर्फ दामू दा अपनी जिन्दगी में एक सकारात्मक बदलाव महसूस कर रहे थे,लक्ष्मी का आगमन अपनी जीविका के हिसाब से ठीक ठाक होने लगा था , साथ में निःसन्तान दामूदा उसमें अपना वारिश देखने लगे थे,
कभी कभी जिन्दगी के थपेड़े अपनी लहर के साथ व्यक्ति को उछाल के ऐसी गोद में डाल देते हैं कि आगे पीछे के सारे दुख साथ तिरोहित हो जाते हैं, यही हुआ वक्त के साथ साथ दामू और उनकी पत्नी राधिका मालिक मालकिन से कका और काकी हो गये और देबू पुत्र तुल्य भतीजा।
एक दिन देबू ने दुकान में समोसे भी बना के रखने का आग्रह किया , पहले तो दामूका मना करते रहे,बड़ी मेहनत का काम है..,नही बिके तो..फिर काकी की सिफारिश में कका मान गये,
पहले दिन समोसा प्रमोशन हुआ ,हर आलू, पकौड़ी,चाय के ग्राहक को फ्री समोसा खिलाया गया, कुछ ही दिनों में समोसे का स्वाद बस यात्रियों ही नही आस पास रहने वाले ,स्कूल कॉलेज के छात्रों के बीच भी प्रसिद्धी पा गया,
ऑफिस घर लौटते हुये पतियों को समोसे के रुप में अपनी नाराज पत्नियों की नाराजगी दूर करने का साधन मिल गया,
अब कुछ ठेले लिये गये जिसमें ‘पन्त टी स्टॉल वाले देबू के समोसे’ लिख कर डिमांड एण्ड सप्लाई के आधार शहर भर में ठिये बिठा दिये गये, शहर में कोई नही कहता आलू के समोसे, सब कहते हैं और जानते हैं “देबू के समोसे”।
मैं ‘समोसा’ क्या शिकायत करुं , मैं निस्पृह होकर अनगिनत इंसानों की जिन्दगी बदलने के काम आ पाया तो मेरा समोसा होना धन्य हुआ।

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प्रतीक्षा

 

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